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तो अयोध्या पर भारी पड़ेगा कोरेगांव

प्रेमकुमार मणि  

यह अकारण नहीं है कि पिछले 28 अगस्त को गिरफ्तार किये गए पांच विशिष्ट भारतीयों को कोरेगांव मामले से जोड़ा गया है . भीमा- कोरेगांव मामला जोर पकड़ता जा रहा है . संघ इस बात को बखूब जानता है कि इस मामले को लेकर यदि भय नहीं पैदा किया गया ,तब उसके द्विज सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बुनियाद खतरे में पड़ जाएगी ,जिसे उसने परिश्रमपूर्वक रामजन्मभूमि -मंदिर की आधारशिला पर खड़ा किया है . मेरा अनुरोध होगा ,इस विषय पर स्थिरचित्त होकर विचार किया जाना चाहिए . 
 
  अयोध्या में रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद प्रकरण एक लम्बे समय से विवाद का विषय रहा है.पिछली सदी के आखिरी दो दशकों की राजनीति तो इसी के इर्द-गिर्द नाचती रही.मैं नहीं समझता कि इसके विस्तार में जाने की कोई ज़रूरत है.लेकिन इस आलेख के लिए संक्षेप में चर्चा आवश्यक जान पड़ती है.अयोध्या का रामजन्मभूमि प्रकरण द्विज  हिन्दुओं तक सीमित था.इसके नेता और कर्ता-धर्ता सब द्विज हिन्दू थे; ज्यादातर अयोध्या के अखाड़ों से जुड़े लोग.हिन्दुओं में दो तरह के राम हैं.एक सगुन राम हैं ; दूसरे निर्गुण राम.सगुन राम अयोध्या के राजा दशरथ और कौशल्या के पुत्र थे.उनकी एक जीवन गाथा है, जिसे लेकर अनेक लोक कथाएं हैं.इन कथाओं को लेकर भारतीय साहित्य में जाने कितनी काव्य-कथाएं रची गईं.लेकिन दूसरे राम निर्गुण हैं.जन्मने और मरने वाले  राम नहीं हैं.इस राम को कबीर-रैदास जैसे संत-कवियों ने अपनाया था.इसी राम को केंद्र में रख कर उन्होंने अपनी आध्यात्मिकता विकसित की.जो लोग दोनों रामों के अंतर को नहीं जानते वे भारत की सांस्कृतिक अस्मिता भी नहीं जानते. 
 
हमने यह देखा कि रामजन्मभूमि आंदोलन किस तरह धीरे -धीरे  दक्षिणपंथी राजनीति का केंद्र बनता चला गया.रामजन्मभूमि केंद्रित राजनीति जैसे-जैसे विकसित हुई दक्षिणपंथी राजनीति के आधार समुदाय की राजनीतिक भागीदारी भी मजबूत होती गयी.दक्षिणपंथी राजनीति के आधार थे पूंजीपति और अमीर लोग.ग्रामीण स्तर पर जमींदार-पुरोहित तबका. सामाजिक रूप से  यह तबका हिन्दू द्विज तबका है.ऊँची जातियों का प्रभावशाली तबका.सांस्कृतिक-आर्थिक  स्तर पर द्विजों का विपन्न तबका भी अपने अग्रगामी तबके का समर्थन करता है.क्योंकि इसमें उन्हें अपनी मुक्ति का किंचित  अहसास होता है.
 
सारांश यह कि रामजन्मभूमि आंदोलन द्विज हिन्दुओं का एक ऐसा सांस्कृतिक आंदोलन बना, जो अंततः उनकी राजनीति को भी मजबूत करता चला गया और उनके सामूहिक सामाजिक -आर्थिक  स्वार्थ राजनीति के केंद्र में आते  गए.इसके साथ ही  तमाम  समाजवादी आर्थिक अजेंडे धीरे-धीरे राजनीतिक कार्य- सूची से खिसकते चले गए.
भीमा कोरेगांव मामले को पहले देखें कि यह है क्या.दरअसल इसी वर्ष जनवरी में यह मामला राष्ट्रीय चर्चा में आया.पुणे में कोरगांव  विजय को याद करने जा रहे दलितों के जत्थे पर बर्बर हमला किया गया , जिसमें एक की मौत हो गई, और अनेक घायल हुए.इसकी प्रतिक्रिया में मुंबई समेत महाराष्ट्र के अनेक शहरों-कस्बों में विरोध प्रदर्शन हुए.देखते -देखते यह विमर्श का अखिल भारतीय मामला बन गया.  कोरेगांव का  इतिहास तो जाने 
प्रेम कुमार मणि 
कोरेगांव का  इतिहास भी जानना चाहिए .कोरेगांव में 1818 में बाजीराव पेशवा की सेना और ईस्ट इंडिया कम्पनी की सेना के बीच युद्ध हुआ था.इस में पेशवा सेना की पराजय हुई थी .कम्पनी सेना जीत गई.यह ऐतिहासिक और दिलचस्प लड़ाई थी.पेशवा सेना में 28000 सैनिक थे.बीस हज़ार घुड़सवार और आठ हज़ार पैदल.कम्पनी सेना में कुल जमा 834 लोग थे.पेशवा सेना में अरब ,गोसाईं और मराठा जाति के लोग थे, जबकि कम्पनी सेना में मुख्य रूप से बॉम्बे इन्फैंट्री रेजिमेंट के सैनिक शामिल थे, जो जाति से महार थे.834 सैनिकों में कम से कम 500  सैनिक महार बतलाये गए हैं.पेशवा सेना का नेतृत्व बापू गोखले , अप्पा देसाई और त्रिम्बकजी कर रहे थे, जबकि कम्पनी सेना का नेतृत्व फ्रांसिस स्टैंटन के जिम्मे था.31  दिसम्बर 1817 को लड़ाई आरम्भ हुई थी, जो अगले रोज तक चलती रही.कोरेगांव, भीमा नदी के उत्तरपूर्व में अवस्थित है.कम्पनी सैनिकों ने पेशवा सैनिकों के छक्के छुड़ा दिए.पेशवा सेना  के पांव उखड गए और अंततः बाजीराव पेशवा को जून 1818 में आत्मसमर्पण करना पड़ा.यह अंग्रेजों की बड़ी जीत थी.इसकी याद में अंग्रेजों ने कोरेगांव में एक विजय स्मारक बनवाया, जिसपर, कम्पनी सेना के हत कुल 275 सैनिकों में से , चुने हुए 49 सैनिकों के नाम उत्कीर्ण हैं.इनमें 22 महार सैनिकों के नाम हैं.निश्चित ही अंग्रेज सैनिकों को तरजीह दी गई होगी, लेकिन यह सबको पता था कि यह जीत महार सैनिकों की जीत थी.
 
हमारे स्वतंत्रता आंदोलन में इस स्मारक को हमने राष्ट्रीय हार के स्मारक के रूप में देखा.हमने राष्ट्रीय आंदोलन का ऐसा ही स्वरूप निर्धारित किया था.लेकिन आंबेडकर ने कोरेगांव की घटना को दलितों, खास कर महारों के शौर्य-प्रदर्शन के रूप में देखा.यह इतिहास की अभिनव व्याख्या थी ,वैज्ञानिक भी.तब से कोरेगांव के विजय को दलित-विजय दिवस के रूप में बहुत से लोग याद करते हैं.और इन्हें याद करने का उन्हें अधिकार होना चाहिए.कोरेगांव के बहाने हम अपने देश के इतिहास का पुनरावलोकन कर सकते हैं.क्या कारण रहा कि हमने अपनी पराजयों के कारणों की खोज में दिलचस्पी नहीं दिखाई.हम तुर्कों, अफगानों, मुगलों, अंग्रेजों और चीनियों से लगातार हारते  रहे.ये तमाम पराजय इसलिए हुई कि हमने अपने समाज के बड़े हिस्से को बीमार और कमजोर बना दिया था.उसका शोषण करते रहे.उन्ही लोगों को जब अवसर मिला, तब उन्होंने बेहतर प्रदर्शन किया.
 
इस तरह भीमा-कोरेगांव हमें अयोध्या के मुकाबले बड़ा सांस्कृतिक सन्देश देता है ; यदि भाजपा दलितों व अन्य पिछड़े वर्गों को भी हिन्दू समझती  है ,तो कोरेगांव बहुजन हिन्दुओं की अस्मिता और शौर्य का राष्ट्रीय स्मारक है  .इससे केवल दलित ही नहीं, पूरा देश सबक ले सकता है,यदि वह चाहे.लेकिन, महाराष्ट्र की भाजपा-शिवसेना सरकार नागपुर संघ परिवार के निदेश पर इस चेतना को कुचल देना चाहती है.भीमा-कोरेगांव के ऐतिहासिक सांस्कृतिक महत्त्व को न तो वह समझी है, न समझना चाहती है.उन्हें वह अपनी पराजय का स्मारक - स्तम्भ मानते हैं.लेकिन दलितों ने तो अपने प्राण न्योछावर कर वह विजय हासिल की थी.यह क्यों होता है कि पेशवाओं की हार दलितों की जीत बन जाती है.सच्चाई यह है कि  पेशवाओं और दलितों के राष्ट्र एक नहीं थे.या कम से कम  पेशवाओं के राष्ट्र में दलित नहीं थे.यह सही है कि महार अपने राष्ट्र के लिए नहीं लड़ रहे थे.प्रश्न यह भी है कि उनका कोई राष्ट्र था भी क्या ? वे जिधर से भी लड़ते अन्य के लिए लड़ते.पेशवा और अंग्रेज दोनों उनके लिए अन्य थे.लेकिन पेशवा उनके वर्ग शत्रु थे, जो अंग्रेज नहीं थे.एक अन्य राष्ट्र ने उन्हें अपनी तरफ से लड़वाया और वे जीते.इससे इतना तो स्पष्ट हुआ कि उनकी योग्यता में कोई कमी नहीं थी.इस आज़ाद भारत में उन्हें विशेष अवसर के सिद्धांत  के अंतर्गत जो आरक्षण की थोड़ी व्यवस्था की गई है, उसे भीख समझा जाता है.कुछ लोग खुद को दाता और शेष को याचक समझते हैं.आरक्षण की व्यवस्था इसलिए है कि हमने योग्यता के गलत मानदंड निर्धारित किये हुए हैं.योग्यता के वास्तविक मानदंड ज्योंही निर्धारित होंगे आरक्षण की कोई ज़रूरत नहीं रहेगी.
 
भीमा-कोरेगांव को लेकर संघ-भाजपा इस हद तक परेशान क्यों है? इसे लेकर  देश के कई  नगरों में छापे मारे गए.आंध्र के मशहूर कवि वरवरा राव, छत्तीसगढ़ की मानवाधिकार कार्यकर्त्ता सुधा भारद्वाज, इकनोमिक एंड पोलिटिकल वीकली के गौतम नवलखा और अन्य नामचीन हस्तियों को इस मामले में क्यों गिरफ्तार किया गया? उनपर आईपीसी की  धारा 153 (ए) के तहत मुकदमा चलाये जाने की बात है.यह तो दो सामाजिक तबकों के बीच विद्वेष फ़ैलाने के जुर्म के लिए इस्तेमाल किया जाता है.तो क्या वरवरा राव, सुधा भारद्वाज और गौतम जैसे लोग विद्वेष फैला रहे थे? यह तो हद है.
 
   लेकिन शायद नहीं.संघ-भाजपा बेहद चिंतित है.उसे बतलाया गया है कि भीमा-कोरेगांव का उत्सव आंदोलन समान्तर राष्ट्रीयता विकसित कर रहा है.यदि यह हुआ तब राममंदिर मामले से कोरेगांव मामले की टक्कर  की सम्भावना होगी.मेरा मानना है इन दोनों के बीच एक सांस्कृतिक संघर्ष तय है.मेरा यह भी मानना है कि यदि सब कुछ ठीक रहा तो तीन वर्षों में भीमा-कोरेगांव की घटना रामजन्मभूमि मामले पर चढ़ बैठेगी.आने वाले समय में राममंदिर को केंद्र में रख कर कोई राष्ट्र विकसित नहीं होगा, भीमा-कोरेगांव को केंद्र में रखकर होगा.साभार 
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