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राफेल डील ने तो लूट का रिकार्ड तोड़ दिया

विवेक सक्सेना 

नई दिल्ली .कई बार लगता है यह देश सोने की नहीं हीरे की चिड़िया है .पिछले दो हजार सालों से लगातार लुटता हुआ .शक ,हूण आए .फिर मुग़ल आए .फिर अंग्रेजों ने इसे लूटा .आजादी के बाद अनपढ़ नेताओं ने इसे लूटने में कोई कसर नही छोड़ी .बोफोर्स डील में तो महज चौसठ करोड़ की दलाली के आरोप में राजीव गांधी की सत्ता चली गई थी .पर राफेल युद्ध विमान की खरीद ने तो पुराने सारे रिकार्ड तोड़ दिए हैं .इस खरीद को लेकर आरोप प्रत्यारोप तो चल ही रहे थे पर भाजपा सरकार के दो कद्दावर पूर्व मंत्रियों ने जब एकसाथ आकर इस मुद्दे को उठाया तो देश की राजनीति गरमा गई .यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी तो अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के कद्दावर मंत्री रहे हैं ,जिनकी टिपण्णी बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है .तीसरे प्रशांत भूषण की योग्यता और नैतिकता पर कोई सवाल नहीं उठा सकता .इन तीनो ने राफेल डील को ऐसा घोटाला बताया है जो देश की सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है .
यह मामला बेहद सनसनीखेज है .देश की वायु सेना जिन मिग 21 और मिग 22 विमानों का इस्तेमाल करती है वे बहुत पुराने हो चुके हैं .ऐसे में इनका इस्तेमाल बहुत जोखमभरा है .लगातार ये विमान दुर्घटनाग्रस्त हो रहे हैं .यूपीए सरकार के समय में इनकी जगह अत्याधुनिक विमान खरीदने का फैसला किया गया .जिसके टेंडर के जवाब में दुनिया की छह कंपनियों ने आवेदन किया . अमेरिका एफ-18 व एफ-16, रुसी मिग-35, योरोपीय यूरोफाइटर, स्वीडन की साब ग्रिमेन सरीखी कंपनियों ने निविदाएं भेजीं. इन तमाम कंपनियों में से फा्रंस की डसाल्ट व उसकी भागीदार कंपनी थेल्स एंड सैफरान को चुना गया. यह तय किया गया कि इस कंपनी से भारतीय वायुसेना 126 विमान खरीदेगी इनमें से 108 विमान भारत में हिंदुस्तान एयरोनाटिक्स के साथ संयुक्त उपक्रम में बनाए जाएंगे व डसाल्ट कंपनी भारत को उनके निर्माण संबंधी तकनीकी जानकारियों व प्रौद्योगिकी उपलब्ध करवाएगी. इन 126 विमानों की कीमत 42000 करोड़ रुपए तय हुई .बाद में प्रधानमंत्री इस सौदे के अनुबंध पर हस्ताक्षर करने फ़्रांस गए .उनके साथ उद्योगपति अडानी और अंबानी भी गए थे .वही राफेल डील पर हस्ताक्षर हुए .बाद में सरकार ने इस अनुबंध की शर्तों को यह कहकर सार्वजनिक करने से मना कर दिया कि यह दोनों देशों के बीच हुए गोपनीयता की शर्त का उल्लंघन होगा .पर पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर परिक्कर यह कहा कि यह डील 90000 करोड़ रुपए की है .मतलब एक विमान  715 करोड़ रुपए का पड़ा .यह कीमत 42000 करोड़ से बढ़कर कैसे 90000 करोड़ रुपए हो गई .यह सवाल तो है ही .साथ ही हथियारों के क्षेत्र में आईं नई कंपनी पर सरकार क्यों मेहरबान हुई यह सवाल और महत्वपूर्ण है . यह विमान कितने मंहगे हैं इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि देश में जो रुस एसयू-30 एम के आई विमान वायुसेना में इस्तेमाल किए जा रहा है उनकी तुलना में राफेल दुगने मंहगे हैं. इन विमानों में वायु से जमीन पर मार करने वाली जो मिसाइलें फिट की जाएंगी उस प्रणाली की कीमत अलग से देनी होगी.फिलहाल राफेल डील सरकार के गले की हड्डी बनती जा रही है .
 
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