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बारिश नहीं मिली फिर भी, घाटशिला ..
सतीश जायसवाल
बारिश के कितने मौसमों से झारखण्ड का पूर्वी सिंगभूम अंचल अपनी हरियाली में बुला रहा था। उसके बुलाने की अनदेखी अब और नहीं। छत्तीसगढ़ के कुछ कवि मित्र इधर से जायेंगे और बंगाल के कुछ कवि मित्र उधर से आ जायेंगे। हम सब घाटशिला में मिलेंगे। और सुवर्णरेखा नदी को बारिश में नहाते देखेंगे। यह एक रूमान भरा विचार है।  
अब यह तय करना मेरे लिए मुश्किल हो रहा है कि यह मेरे सहज-बोध में है या काव्य चेतना में है ? पता नहीं कब, इस रास्ते से गुजरते में मैंने उसका बुलाना सुन लिया होगा और मन बना लिया होगा। लेकिन यह छोटा सा रेलवे स्टेशन तो हर बार रात में ही गुजरा होगा, नींद के समय में ! तो फिर मैंने उसका बुलाना कब, कैसे सुन लिया होगा ? सिंहभूम संथाल बहुल आदिवासी अंचल है। और घाटशिला का रेलवे स्टेशन तो इस आदिवासी अंचल से थोड़ा सा बाहर निकल कर झांकता हुआ सा ही मिलता है। इधर से गुजरने वाली मुख्य ट्रेनें दक्षिण-पूर्व रेल लाइन के इस छोटे से स्टेशन पर नहीं रुकतीं। दो जनों के प्रेम के लिए इस छोटे से स्टेशन को शान्त और निरापद छोड़ते हुए निकल जाती हैं। वैसे ही, जैसे दक्षिण-पूर्व-मध्य रेल का वह छोटा सा स्टेशन -- रसमड़ा। रस से भरा-भरा या प्रेम के रस से भरता हुआ कि कविता बन जाये --
 
मालूम नहीं कब की  / दबी-छिपी इच्छा में दाखिल हुआ होगा  /यह छोटा सा मैदानी रेलवे स्टेशन ,
 
उतरती बारिश के /  उमस भरे किसी एक दिन /  यहाँ तुम्हारा होना /  जब हरी-भरी धूप से लबालब / मुरुमी भांठा वाले मैदान में / हरहरा कर फूल रहे होंगे /  अनगिनत रंगों वाले सपने की तरह /  तिरैय्या के जंगली फूल ,
 
घोर आसक्तियों की स्वर-लिपि में बंध कर / तरंगित हो रही होगी कोई जादुई धुन  / तुम्हारे कैनवास पर उतर रहा होगा / किसी अलौकिक सुख सा / वह संधि - काल का स्पंदन,  
 
कहीं दूर से / सीटी बजाती हुयी आती  / कोई एक्सप्रेस ट्रेन / बिना रुके निकल जायेगी / छोड़ते हुए / एकांत और निरापद / इस छोटे से मैदानी रेलवे स्टेशन को / हमारे-तुम्हारे लिये... 
 
लेकिन घाटशिला में कोई कविता नहीं बनी। जब हम उस छोटे से स्टेशन पर उतरे तब वह बेहद उमस भरी दोपहरी का समय था। मौसम की यह बेरुखी हरे-भरे सावन की हमारी तैयारियों से बिलकुल अलग और अप्रत्याशित थी। फिर भी हम घाटशिला में थे। बांग्ला उपन्यासकार बिभूतिभूषण बंद्योपाध्याय यहां रहते थे।    यहाँ उनका घर है। और इस अंचल का सौंदर्य उनके उपन्यासों में बसा है। उसमें सुवर्णरेखा नदी है। एक नदी   अनेक रूप धरकर उपन्यास में उतराती है,उफनाती है। उपन्यास के उन दिनों में इस पर से अपनी नावें लेकर निकलने वाले मछुआरे इसके दोनों किनारों को भटियाली की धुनों से बांधते रहे होंगे। जो उपन्यास के विधान       में नहीं समा पाया, बाद में वह फिल्मों में आया। बँगला फिल्मों में, और हिंदी फिल्मों में भी।  
 
एक उपन्यासकार के गांव में कवि मित्रों का साथ हो, उनके साथ उनकी कवितायेँ हों  और बाहर बारिश हो रही      हो ! फिर इस मौसम में और क्या चाहिए होता ! लेकिन घाटशिला में बारिश नहीं मिली। यहां से पहले सुवर्णरेखा के साथ मेरी मुलाकात बस, एक रास्ते की है। भरी दोपहरी की।  कभी रांची से वापस    होते हुए, बीच रास्ते की मुलाकात। पलाश के खिले हुए मौसम में। लेकिन उस समय पलाश वनों में आंच दहक रही थी और सुवर्णरेखा उसमें घिरी हुयी थी। फिर भी उपन्यास की नदी को बारिश में नहाते हुए देखने का विचार मेरे मन में बिलकुल अपनी नदी की तरह आया ! मैंने अपनी नदी को बारिश में नहाते हुए देखा है। अरपा को। घाटशिला में सुवर्णरेखा को भी वैसे ही नहाते हुए देखने की आकांक्षा मेरे मन में अपनी अपनी नदी की तरह ही आयी। भरोसे के साथ। शायद नदी के साथ मेरे रिश्ते ही भरोसे के होते हैं। या मैं भरोसा जोड़ लेता हूँ।               हम देर तक नदी के तट पर रहे। ऐसे, जैसे कोई आह्वान करते हुए। बारिश होती तो नदी नहाती हुयी मिलती। बारिश नहीं थी फिर भी नदी थी। लेकिन नदी सिमट रही थी। नदी बाहरी लोगों के सामने सिमट जाती है। उसे    सिमटना और सिकुड़ना ही था। क्योंकि ठीक सामने की तरफ ताम्बे का कारखाना है। रात-दिन टकटकी लगाए  देखता रहता है।     
 
घाटशिला में बारिश नहीं मिली। आदिम हरियाली भी नहीं मिली। संथालों का वह आदिवासी अंचल भी नहीं मिला। अब सब घाटशिला से दूर हैं। कभी यहीं रहे होंगे। बिलकुल यहीं, जब बिभूतिभूषण बद्योपाध्याय यहाँ    रहते थे। और लिखते थे। अब घाटशिला का यह, वह सब उनके लिखे गए में है।और उसका विवरण अब उस      घर में है, जो उनका बताया जाता है। लेकिन उनका वह घर भी अब वहाँ नहीं है। वह घर अब इस घर की एक   दीवार पर लटकी तस्वीर में दीवार पर टंगा हुआ है।वहाँ, उस परिसर में देर तक रहकर भी मैं उन अनुभूतियों का स्पन्दन अपने भीतर नहीं जगा पाया,जिनके लिए हम सब वहाँ आये हुए थे। उस परिसर में एक तुलसी चौरा भी है। लेकिन उदास। और तुलसी पर कोई द्युति भी नहीं। जिस घर में कोई नहीं बसता,वहाँ तुलसी का विषाद व्यापता है।
 
हमारी कल्पनाओं की उस,आदिम हरियाली वाला अंचल अब दूर जा चुका है। फिर भी सिंघभूम कहते ही एक अनुभूति होती है। वह हमारे साथ थी। हमारे लिए वहाँ जो था, हमने उसका संधान किया। यहां से कोई १५-२० किलोमीटर की दूरी पर बुरूडीह झील है। एक कृत्रिम झील। और रास्ता हरियाली के बीच से होकर गुजरता है।   हमें वह रास्ता मिला, हरियाली मिली, पानी मिला, पानी में उतराते हुए पर्वतों की छायाएं मिलीं।घाटशिला के स्थानीय कॉलेज में हिन्दी के अध्यापक हैं प्रोफेसर रवि रंजन। उन्होंने यहां रामकृष्ण मिशन मठ के अतिथिगृह में हमारे ठहरने की व्यवस्था कर दी थी। वहां ठहरने का एक सुखद अनुभव अपने साथ लेकर हम वहां से लौटे हैं।  मठ के परिसर में एक पुनीत सा भाव व्याप रहा था। और मठ के महन्तों-स्वामियों के व्यवहार में हमारे लिए आत्मीयता थी। प्रमुख महन्त स्वामी विद्युतानन्द और उनके सहयोगी अन्य स्वामी हमसे पहले, हमारे पहुँचने  की प्रतीक्षा में थे। एक साथ इतने और इतनी दूरियों से कवि मित्रों के अपने यहां आने को वे लोग किसी समारोह   की तरह देख रहे थे। और उत्सुक थे। 
 
कवि-कला समीक्षक राकेश श्रीमाल और  उनके एक छात्र रजनीश कोलकता से। रजनीश एक अच्छे फोटोग्राफर हैं। कोलकता से ही युवा कवि राहुल राजेश। बर्दवान से श्यामाश्री और उनके पति तृप्तिमय सरकार। इधर, चक्रधरपुर से उमरचंद जायसवाल और  रायगढ़ से रामावतार अग्रवाल। बिलासपुर से मैं और मेरे साथ तनवीर हसन। और तनवीर के मित्र डॉ० धीरेन्द्र बहादुर सिंह, जो दिल्ली के एक कॉलेज में प्राध्यापक हैं। मुझे और प्रोफ़ेसर रविरंजन  को छोड़कर सभी ने अपनी अपनी कविताओं के पाठ किये। राकेश ने, लिखे जा रहे अपने उपन्यास के कुछ अंशों का भी वाचन किया। राहुल राजेश का दूसरा काव्य संकलन अभी हाल ही में प्रकाशित होकर आया है --क्या हुआ जो...।'                 राहुल ने इस संकलन में से कुछ कविताओं का पाठ किया। हम सब इस नए काव्य संकलन में शामिल उन कविताओं के पहले श्रोता बने।
कोलकता से वरिष्ठ कवि नवल जी को भी आना था। लेकिन वह अस्वस्थ हो गए थे और नहीं आ पाए। रायपुर से कवि-चित्रकार कुंवर रविन्द्र को भी आना था। लेकिन उनके साथ भी कुछ कारण हो गया। और वह भी नहीं आ पाए। लेकिन श्यामाश्री आयी। उसका आना मुझे बहुत अच्छा लगा। वह मुझे प्रिय है। उसने मेरी कुछ कविताओं का बांग्ला में अनुवाद भी किया है। यहां उसने मेरी एक कविता --प्रार्थना-- के बांग्ला अनुवाद का पाठ किया।
 
श्यामाश्री मेरी एक कविता में रहती है --शान्तिनिकेतन- में। इस कविता के साथ एक कहानी जुडी हुयी है। वह   एक घटना है। नवल जी उस घटना के एक पात्र भी हैं और उस घटना के साक्षी भी रहे हैं। वह साथ आये होते तो    मैं इस कविता -- शांतिनिकेतन -- का पाठ करता।श्यामाश्री मुझे शान्तिनिकेतन में ही मिली थी। अब वह बर्दवान में है। विवाह के बाद वह मुझे पहली बार मिली। अपने पति के साथ। दोनों को साथ-साथ देखना अच्छा लगा। तृप्तिमय कविह्रदय और एक अच्छे फोटोग्राफर हैं। पत्नी की सोहबत में कवि बने जा रहे हैं। तृप्तिमय ने अपनी एक छोटी सी कविता भी सुनाई। और श्यामाश्री ? वह भी तो तृप्तिमय के साथ फोटोग्राफर बनती जा रही है।इस प्रवास की रुपरेखा भी कुछ इसी तरह बनी थी कि साहित्य के अतिरिक्त भी अन्य कलाओं, विवध रचना अभिव्यक्तियों और सांस्कृतिक धाराओं से जुड़े हुए मित्र एक साथ जुड़ें और आपस में घुलें-मिलें। वहाँ के लोगों से    मिलें-जुलें। एक-दूसरे को जानें-पहिचानें,, उस जगह को जानें-समझें।
 
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