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तोप सौदे में अमेरिका ने दांव तो नहीं दे दिया !
हिसाम सिद्दीकी
नई दिल्ली! पहले ही टेस्ट में अमरीकी तोप हावित्जर एम-777 की नाल फट जाने के बावजूद भारत की नरेन्द्र मोदी सरकार अमरीका से इस लांग रेज अल्ट्रा लाइट तोपों को खरीदने के अपने फैसले पर डटी हुई है। सौदे के मुताबिक 35 करोड़ की इस तोप को अमरीका को भारत में ही एसेम्बल करना था, लेकिन अब कहा जा रहा है कि सभी एक सौ पैतालीस तोपें भारत को जून 2021 तक सप्लाई कर दी जाएंगी। अमरीकी डिफेंस मिनिस्टर जेम्स मेटिस ने 26 सितम्बर से अपने तीन रोजा हिन्दुस्तान दौरे के दौरान भारत के साथ बहुत बड़े पैमाने पर डिफेंस डील्स करने की बातचीत मुकम्मल कर ली है। इस डील के मुताबिक भारत अमरीका से एफ-16, एफ-18, लड़ाकू तैय्यारों के साथ ही सौ एक इंजन वाले तैय्यारे (विमान) और बड़ी तादाद में ड्रोन खरीदेगा। लम्बी दूरी तक मार करने वाली हल्की 155 एमएम की तोपें भारत को फरोख्त करने के लिए अमरीका 1980 से कोशिश कर रहा था। लेकिन स्वीडन की बोफोर्स के मुकाबले हॉवित्जर-777 कमजोर पाई गई थी इसीलिए राजीव गांधी के जमाने में बोफोर्स तोपें खरीदी गई थीं। पंडित अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में जब करगिल मेंे पाकिस्तान के साथ जंग हुई तो बोफोर्स ही कामयाब साबित हुई थी। इधर हावित्जर-777 की नाल पहले ही टेस्ट फायर में फट जाने के बावजूद हुकूमत अमरीका को खुश करने की गरज से अमरीकी तोप ही खरीद रही है। यही अमरीका की कामयाबी है। इस सौदे के पीछे दो अंदेशे जाहिर किए जा रहे हैं। एक यह कि राजीव गांधी के दौर में बोफोर्स सौदे में रिश्वत खाए जाने के प्रोपगण्डे के पीछे अमरीका का भी हाथ था। दूसरा अब हावित्जर-777 के सौदे में भी कुछ लेन-देन जरूर है तभी तो पहले ही टेस्ट में नाल फट जाने वाली तोप के सौदे पर ही मोदी सरकार डटी हुई है। अब तो इंतेहा हो गई जब अमरीकी डिफेंस मिनिस्टर के भारत दौरे से दो दिन पहले राष्ट्रभक्त मोदी सरकार ने अमरीकी तोप की खराबी को भारतीय आर्डीनेंस बोर्र्ड के गोले के सर मढते हुए कह दिया कि टेस्ट के वक्त जो गोला हावित्जर तोप में इस्तेमाल किया गया वही खराब था। इसलिए तोप की नाल फट गई। दुनिया के डिफंेस माहिरीन के गले यह बात नहीं उतर रही है कि खराब गोले की वजह से तोप की नाल फट सकती है। अगर ऐसा है भी तो अमरीका से हावित्जर का गोला मंगवा कर दूसरी तोप टेस्ट क्यों नहीं की गई? एक तोप फटने के बाद यह अमरीकी कम्पनी की जिम्मेदारी थी कि वह नए गोलों के साथ अपने एक्सपर्ट भेजकर दूसरी तोप का टेस्ट करके भारत को मुतमइन करता। ऐसी कोई कार्रवाई न होने के बावजूद मोदी सरकार अमरीकी तोप खरीद रही है। आखिर इसके पीछे अस्ल वजह क्या है?
 याद रहे कि मोदी सरकार ने अमरीका के साथ पांच हजार करोड़ में 145 हावित्जर-777 तोपों का सौदा किया है। सौदे के मुताबिक 25 तोपें पूरी तरह अमरीका से बन कर आएंगी बाकी 120 तोेपें अमरीकी कम्पनी बीएई सिस्टम हिन्दुस्तान में महिन्द्रा डिफेंस के साथ मिलकर हिन्दुस्तान में ही असम्बल करेगी इसी सौदे के तहत दो तोपें अगस्त में अमरीका से आई थीं उन दो में से एक का ट्रायल दो सितम्बर को पोखरण मे किया गया तो उसकी नाल ही फट गई। तोपों की यह कौन सी डील है जिसमें तोप सप्लाई करने वाली कम्पनी ने गोला बारूद भेजा ही नहीं और भारत सरकार के मुताबिक ट्रायल करते वक्त हिन्दुस्तानी गोले का इस्तेमाल किया गया। ऐसा हरगिज नहीं होता और अगर गोले की खराबी की वजह से ट्रायल के दौरान पहली तोप की नाल फट गई तो दूसरी तोप का ट्रायल भी होना चाहिए था। इस सौदे को उस वक्त तक मुल्तवी कर दिया जाना चाहिए था जब तक तोप बनाने वाली अमरीकी कम्पनी बीएई सिस्टम अपनी तोप का ट्रायल देकर हिन्दुस्तान को तोप की क्वालिटी के बारे में पूरी तरह मुतमइन (संतुष्ट) न कर देती तब तक इसपर आगे नहीं बढा जाना चाहिए। अगर इतनी घटिया और खराब क्वालिटी की तोपें फौज में होगी तो उनसे कभी भी धोका हो सकता है। अगर कभी जंग हो गई और हावित्जर जंग के दौरान भी इसी तरह नाकाम साबित हुई तो इसकी जिम्मेदारी किस के सर होगी? इसमें सबसे बड़ा सवाल फिर वही है कि आखिर मोदी सरकार इस नाकाम साबित हो चुकी तोप का ही सौदा क्यों कर रही है? बजाहिर तो यही लगता है कि शायद अमरीकी लाबिस्ट ने मोदी के किसी करीबी को मोटा कमीशन देकर यह सौदा किया है। क्या यह मान लिया जाना चाहिए कि बोफोर्स सौदे मे कमीशन खाए जाने का शोर मचाने वालों ने हावित्जर-777 की खरीद में सैकड़ों करोड़ खाकर मुल्क के तहफ्फुज (सुरक्षा) को भी खतरे में डाला है।
खुद को प्रधान सेवक कहने वाले नरेन्द्र मोदी ने डोनाल्ड ट्रम्प के सदर बनने के बाद पहला अमरीकी दौरा किया तो बहुत खुश थे क्योंकि ट्रम्प ने उन्हें अपना गहरा दोस्त कहकर मुखातिब किया था। मोदी को तो यह भी पता नहीं है कि अगर कोई मुल्क अमरीका से लाखों करोड़ का डिफेंस सौदा करे तो वहां का सदर खरीदने वाले मुल्क के सरबराह को अपना बाप तक कहने में गुरेज नहीं करेगा। ट्रम्प एक शातिर किस्म के व्यापारी हैं उन्होने मोदी को अपने जादू में फंसा लिया। जल्द ही अमरीका के साथ मुल्क की तारीख का सबसे बड़ा डिफेंस सौदा होने वाला है। सौदा भी ऐसा कि अमरीका महंगी कीमत लेकर हावित्जर-777 तोप जैसा अपना सारा कू़़ड़ा करकट भारत के सर मढ देगा। इनमें एफ-15 और एफ-18 लड़ाकू तैय्यारे भी शामिल हैं। अमरीका की चालाकी ही है कि वह कह रहा है कि भारत उससे एक इंजन वाले कम से कम सौ जंगी जहाज खरीदे तभी सौदा पक्का होगा।
वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी ने ‘मेक इन इंडिया’ का नारा जोर शोर से देते हुए डिफेंस शोबे (क्षेत्र) में भी सद फीसद एफडीआई की इजाजत दी थी। महिन्द्रा, अनिल अंबानी और गौतम अडानी समेत मुल्क के कई कारपोरेट घरानों ने डिफेंस प्रोडक्शन यूनिटें लगाने का एलान भी कर दिया था। हावित्जर-777 तोपों की असेम्बलिंग का काम अमरीकी कम्पनी के साथ महिन्द्रा को करना था अब जब अमरीका ने देख लिया कि डोनाल्ड ट्रम्प ने नरेन्द्र मोदी को पूरी तरह से अपने जाल में फंसा लिया है तो अमरीकी डिफेंस प्रोडक्शन कम्पनियों ने नई-नई शराएत थोप कर ‘मेक इन इंडिया’ को भी मुश्किल में डाल दिया है। अमरीकी बिजनेस लाबी ने हिन्दुस्तानी डिफेंस मिनिस्टर को खत लिखकर इस बात की पुख्ता गांरटी मांगी है कि भारत में सबसिडियरी कायम करने में उनकी तकनीकी लीक नहीं की जाएगी और उस तकनीकी पर अमरीकी कम्पनियों का ही कंट्रोल और मुकम्मल अख्तियार (अधिकार) रहेगा। अरबों खरबों डालर के डिफेंस सौदे करने वाली अमरीकी कम्पनियां अपनी तकनीकी भारत के साथ साझा करने के लिए किसी भी कीमत पर तैयार नहीं हैं। अमरीकी कम्पनियां अब यह शर्त भी थोप रही हैं कि भारत की कम्पनियों के साथ कोलिब्रेशन में अगर मकामी कम्पनियों  में तैयार किए गए सामान में कोई खामी रह जाती है तो अमरीकी कम्पनियां उसके लिए जिम्मेदार नहीं होगी। एफ-15, 16 और 18 जंगी तैय्यारे बनाने वाली लाकहीड मार्टिन और बोइंग कम्पनियां भारत में असेम्बलिंग के लिए तैयार तो हैं लेकिन फिर जहाजों में कोई कमी रहने की सूरत में उसकी गारण्टी लेने के लिए तैयार नहीं हैं 
जहां तक अमरीकी कम्पनी लाकहीड मार्टिन के एफ सीरीज के जंगी जहाजों का सवाल है तो वह पाकिस्तान को एफ-16 पहले से दे रही है अब सऊदी अरब भी एफ-16 लेने लगा है लेकिन 15 के खरीदारों की कमी है। गुजिश्ता साल अमरीका ने कई एफ-15 जंगी तैय्यारे यूनाइटेड अरब अमीरात को यह कह कर मुफ्त में दे दिए थे कि यूएई उन्हें उड़ा कर देख ले अगर वह इन तैय्यारों को अपनी डिफेंस के लिए मुनासिब (उपयुक्त) समझे तो बाद में उसकी कीमत अदा कर दे वर्ना जहाज वापस कर दे। उस सौदे का क्या हश्र हुआ कुछ पता नहीं है। अब वही एफ-15 और एफ-18 तैय्यारे अमरीका भारत के सर मढने की कोशिशों में लगा हुआ है। उम्मीद है कि मोदी सरकार इन तैय्यारों की खरीद में फंसेगी जरूर। रूस से खरीदे गए मिग जंगी तैय्यारों के एयर फोर्स की फलीट से बाहर हो जाने के बाद से अब भारत को सौ से ज्यादा जंगी तैय्यारों (युद्धक विमानों) की जरूरत है अमरीका ने किसी भी कीमत पर एफ सीरीज के अपने जहाज भारत के गले मढने के लिए मोदी को तकरीबन फंसा ही लिया है।जदीद मरकज 
 
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