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राजा भैया का साथ ठीक नहीं -अमर
नई दिल्ली .हाल ही में सपा में घरवापसी करने वाले नेता अमर सिंह ने अखिलेश के नेतृत्व से लेकर उत्तर प्रदेश  विधानसभा चुनाव तक सभी मुद्दों पर बेबाकी से बात की. पेश है अमर सिंह से शरद गुप्ता की बातचीत के अंश -
पिछले पांच वर्ष में अखिलेश यादव में क्या परिवर्तन आया है?
मैंने अखिलेशजी को बचपन से देखा है. उनके बचपन या जवानी का ज़िक्र करने लायक अब मैं नहीं हूं. क्योंकि अब वह मुख्यमंत्री हैं. 
सवाल यही है कि बतौर मुख्यमंत्री,  बतौर राजनेता वे कितने परिपक्व हुए हैं?
उनके अंदर वाकपटुता है. जनता के साथ संप्रेषण की अद्भुत क्षमता है लेकिन मैं समझता हूं कि अखिलेश  और मुलायम सिंह  के बीच पूरी तरह समन्वय होना चाहिये. 
तो क्या अभी समन्वय नहीं है या कम है?
यह मैं नहीं कह रहा हूं कि कम है. मैं सिर्फ यह कह रहा हूं कि होना चाहिये. जितना है उससे ज्यादा अच्छा होना चाहिये. 
मुख्यमंत्री का विजन कैसा है?
अच्छा है. प्रदेश में बहुत काम कर रहे हैं. लेकिन उनका अनुभव मुलायम सिंह जैसा नहीं हो सकता. 
अनुभव तो समय के साथ आयेगा? 
वो तो ठीक है. समय के साथ ही आयेगा. लेकिन अभी तो जो अनुभव प्राप्त है उसका यानी  मुलायम सिंह जी के अनुभव का लाभ लेना चाहिये.
क्या पिछले तीस सालों में पहली बार उत्तर प्रदेश का चुनाव विकास के मुद्दे पर लड़ा जायेगा?
अगर विकास के मुद्दे पर चुनाव होगा तो अखिलेश सरकार के आगे मोदी जी कहीं टिकते ही नहीं हैं. उन्होंने बनारस को क्योटो बनाने का वादा किया था. लेकिन क्योटो का अभी तक दूर दूर तक पता ही नहीं है. वहां का नागरिक कह रहा है- अरे क्योटो तू छुपा है कहां, मैं तड़पता यहां. वेंकैया नायडू ने स्मार्ट सिटी योजना के तहत लखनऊ को लिया है. भले ही यह प्रदेश की राजधानी है लेकिन यहां मेट्रो लगाने का श्रेय तो अखिलेश यादव को ही मिलेगा. 
मेट्रो और लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस वे के अलावा और क्या उपलब्धियां हैं अखिलेश सरकार की? 
अपने आप में ये दोनों उपलब्धि भी कम नहीं हैं. हम समझते हैं अखिलेश भी उसी ग़लती के शिकार हैं जिसके मोदी ज़ी हैं, राजा भैया को साथ लेकर चल रहे हैं. 
लेकिन क्या क़ौमी एकता दल के साथ सपा को गठबंधन तो उन्हीं के दबाव में नहीं तोड़ना पड़ा? वे तो अपराधियों के खिलाफ हैं. हाल ही में मंच पर अचानक पहुंच गये अतीक अहमद से भी वह दूरी बनाते हुए दिखे. 
मैं शिवपालजी के बयान का पूरी तरह समर्थन करता हूं कि सभी अपराधियों को पार्टी से निकाल देना चाहिये. एक मुख़्तार अंसारी को पार्टी में आने से रोक देने से छवि साफ़ नहीं होगी. हमें एक-एक व्यक्ति को जांचना होगा और जिनके खिलाफ राजनीतिक मामले न हों बल्कि हत्या, बलात्कार, रंगदारी वसूली जैसे गंभीर अपराध हों, उन्हें पार्टी से निकाल देना चाहिये. अगले चुनाव में सभी ऐसे उम्मीदवारों को जिनके खिलाफ गंभीर अपराधों के मामले हैं, टिकट नहीं देना चाहिये. उनकी जीत की संभावनायें कितनी ही क्यों न हों. इस नीति के कुछ दुष्परिणाम होंगे लेकिन उनके लिये हमें तैयार रहना होगा. 
मुख्तार अंसारी का नाम आने के बाद मुख्यमंत्री ने जो किया वह ठीक था. राहुल गांधी की तरह बीच प्रेस कांफ्रेंस में मसौदा तो नहीं फाड़ा. उन्होंने संसदीय बोर्ड में जाकर अपनी बात रखी और राष्ट्रीय अध्यक्ष को मनाया कि वह क़ौमी एकता दल का विलय खत्म करें. अब इसके बाद अगर शिवपाल सिंह दृढ़ता से यह निर्णय लेते हैं कि कोई भी अपराधी किसी भी सूरत में पार्टी में नहीं लिया जायेगा भले ही उसकी जीत की संभावना कुछ भी क्यों न हों, तो उसके दुष्परिणाम तो होंगे लेकिन सिद्धांत बचेंगे. 
 भले ही वह पार्टी मुख्तार ने बनायी हो लेकिन विलय के समय ही स्पष्ट कर दिया गया था कि मुख्तार को सपा में नहीं लिया गया है. क़ौमी एकता दल के दो विधायक हैं - अफजाल और सिग्बतुल्लाह अंसारी. दोनों के खिलाफ कोई आपराधिक मामला नहीं है. दोनों का क़सूर था कि वे मुख़्तार अंसारी के भाई हैं. लेकिन मुख्तार के अपराधों के लिए उनके रिश्तेदार या भाई जिम्मेदार कैसे ठहराये जा सकते हैं? अमेरिकी प्रेसिडेंट बिल क्लिंटन के सगे भाई भी सजायाफ्ता मुजरिम थे जिन्हें उन्होंने अपना कार्यकाल के अंतिम दिन माफ़ी दी थी. मेरी जानकारी के अनुसार देश के उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी भी मुख़्तार के रिश्तेदार हैं. तो क्या उन्हें भी उपराष्ट्रपति पद से इसलिए हटा देंगे.
कहा जाता है सपा की सरकार बनने पर ही सबसे ज्यादा दंगे होते हैं? इस बार भी कानून व्यवस्था एक बड़ा मुद्दा बनने जा रहा है. कैराना, मुजफ्फरनगर हो, बदायूं, बनारस या मथुरा, बात क्या है? हालात काबू में क्यों नहीं आते? 
 
देखिये, वो कत्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता, हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम. कोई मध्य प्रदेश की बात नहीं करता जहां व्यापम के चलते सैकड़ों लोग मारे जा चुके हैं. इनमें सीबीआई के अधिकारी भी हैं. मथुरा में जिस तरह से अखिलेशजी ने हालात पर काबू पाया वह क़ाबिले तारीफ़ है. उन लोगों ने वहां पर मानव श्रंखला बना ली थी. अगर ज्यादा फ़ोर्स लगाते तो बहुत लोग मारे जाते. बदायूं में मीडिया में इतना हल्ला मचा कि यादवों ने दलितों का बलात्कार करने के बाद लाशें पेड़ पर टांग दी हैं. लेकिन जब सीबीआई ने, मोदीजी की सीबीआई ने हमारी सरकार को क्लीन चिट दी तो उसकी कहीं चर्चा तक नहीं हुई. 
 
आगामी विधानसभा चुनाव में समाजवादी की मुख्य लड़ाई किससे होगी?
 
भाजपा के पास कोई चेहरा नहीं है. मोदी जी के शब्दों की लड़ी जो जादू की छड़ी बन गयी थी और लोकसभा चुनाव में इस छड़ी का जादू चला. ऐसा चला कि पश्चिम बंगाल में बीजेपी का कोई आधार नहीं था, वहां से लड़े बाबुल सुप्रियो कोई राजनीतिक व्यक्ति नहीं थे, वे भी इस छड़ी के जादू से चुनाव जीत गये और केंद्र में मंत्री बन गये. वहीं, बंगाल में एक चैनल ने स्टिंग कर सभी तृणमूल नेताओं को धन लेते हुए दिखाया. एक मंत्री को सीबीआई ने सारदा चिटफंड स्कैम में जेल भी भेज दिया. उसके बाद भी उनकी पार्टी न सिर्फ चुनाव जीती बल्कि प्रचंड बहुमत से जीती. तो जाहिर है कि अब ये स्टिंग या भ्रष्टाचार के आरोपों या सीबीआई से राजनीति का निर्णय नहीं होता.
 
मोदी जी अकेले हैं जो कटिबद्ध, प्रतिबद्ध, संकल्पित दिख रहे हैं जो सुनियोजित तरीके से काम करना चाहते हैं लेकिन प्रधानमंत्री सचिवालय के मुट्ठी भर गुजरात काडर के आईएएस लोगों के बल पर वे देश को नहीं चला सकते. भारत गुजरात नहीं है. 
 
 तो फिर क्या लड़ाई बसपा से होगी? 
 
निश्चित रूप से. लेकिन अगर मोदी जी ने बिहार की तरह खुद को ही चेहरा बनाया, प्रधानमंत्री होते हुए भी खुद को लालूजी के स्तर पर उतारा तो तो मोदी बनाम अखिलेश हो जाये, योगी बनाम अमर सिंह हो जाये या मोदी बनाम मुलायम हो जाये, मोदी बनाम रामगोपाल हो जाये या मोदी बनाम शिवपाल हो जाये इसका लाभ सपा को ही मिलेगा. विनय कटियार, लालजी टंडन, कलराज मिश्र, दिनेश शर्मा क्या कोई भी व्यक्ति मुलायम सिंह का मुक़ाबला कर सकता है?
अगर कांग्रेस गठबंधन करना चाहेगी तो सपा क्या करेगी? 
किसके साथ गठबंधन होगा? पीके (प्रशांत किशोर) के साथ? पीके कभी मोदी के साथ हैं, कभी नीतीश के साथ हैं तो कभी राहुल के साथ हैं. कहते हैं ना, मानो तो शंकर नहीं तो कंकड़. जो हर जगह घूमता फिरता है वह कंकड़ रहता है और जो एक जगह स्थापित हो जाता है वह शंकर बन जाता है. पीके को कंकड़ नहीं कह रहा हूँ बल्कि यह कह रहा हूं कि आमिर खान की पीके इस पीके से ज्यादा प्रसिद्ध है. 
लेकिन भाजपा सरकार कांग्रेस नेतृत्व पर जो केस कर रही है, उससे क्या उसका कांग्रेस मुक्त भारत बनाने का सपना पूरा हो पाएगा? 
देखिए, सोनिया गांधी जी के ऊपर जितने मुकदमे होंगे, प्रियंका और राहुल पर जितने आरोप लगेंगे, भले ही वे गलत न हों लेकिन उनके साथ जनता की हमदर्दी बढ़ती जायेगी. जैसे जो इंदिरा गांधी 1977 में खलनायिका दिख रही थीं वही 1980 आते आते नायिका बन गयीं. वही स्थिति हमें अभी दिख रही है.शुक्रवार 
 
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