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एक संपादक ऐसा भी
शरद गुप्ता
 
वह दिन में अखबार का संपादन करते हैं और रात को कहानियां लिखते हैं. और दोनों ही काम क्या गजब करते हैं? पचास साल के राज कमल झा अपने तेजतर्रार तेवरों के लिये प्रसिद्ध द इंडियन एक्सप्रेस समूह के मुख्य संपादक हैं और अब तक चार उपन्यास लिख चुके हैं. सन 1999 में प्रकाशित उनके पहले उपन्यास 'द ब्लू बेडस्प्रेड' को देश में सबसे ज्यादा एडवांस (अग्रिम मेहनताना) और रॉयल्टी (बिक्री में हिस्सा) मिली थी. वह दुनिया की 12 भाषाओं में प्रकाशित हुआ. यह सब तब जब वे महज 33 साल के थे.
राज कमल अपने काम में इतने मसरूफ रहते हैं कि बाहर की दुनिया से उनका संपर्क सिर्फ अपने संवाददाताओं और ख़बरों के जरिये ही होता है. पाठकों और आम आदमी की तो बात ही क्या है, अखबार की दुनिया के बमुश्किल 5 प्रतिशत लोगों ने उन्हें देखा होगा और एक प्रतिशत से भी कम से उन्होंने कभी बात की होगी. वे इंटरव्यू नहीं देते. अगर कभी किसी पत्रकार से बात करते भी हैं तो सिर्फ अपनी किताबों को प्रमोट करने के लिये. ऐसे ही एक दुर्लभ साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि संपादक का काम साक्षात्कार देना नहीं है बल्कि अखबार बेहतर तरीके से निकालना है. इस काम को वह बखूबी अंजाम देते हैं. खबरों की उनकी समझ का कोई सानी नहीं है. 
वे दूर से ही खबर सूंघ लेते हैं और फिर उसके सबसे बेहतर प्रजेंटेशन में लग जाते हैं. खबर का कोई पहलू उनकी निगाहों से बच नहीं सकता. मैंने उनके साथ छह साल काम किया है. दफ्तर में घुसते ही राज कमल अगर मिल गये तो पहला सवाल होता था, आज क्या नया है? खबर बताने पर अगला सवाल होता था,  व्हाट्स द स्पिन? यानी इसमें दूसरों से अलग एंगल क्या है? या फिर, हाउ कैन वी टेक द स्टोरी फॉरवर्ड? यानी जितना समाचार टीवी और न्यूज एजेंसी ने प्रसारित किया है, हम उससे ज्यादा क्या दे रहे हैं? 
चाहें पनामा पेपर्स हों या एचएसबीसी द्वारा स्विस बैंक खातों पर खबर, वह हर स्टोरी की गहराई में जाते हैं. हर रिपोर्ट पर सवाल उठाते हैं और तब तक छपने नहीं भेजते जब तक रिपोर्ट उन्हें संतुष्ट न कर दे. चाहे इसमें एक घंटा लगे, एक दिन या एक महीना. उन्होंने यह कार्य पद्घति अपने सहयोगियों में भी विकसित की है.
राज कमल चांदी का चम्मच लेकर पैदा नहीं हुए थे. उनके पिता कोलकाता के एक कॉलेज में संस्कृत और मगधी पढ़ाते थे. दो कमरों के मकान में छह प्राणी रहते थे. लेकिन बचपन से ही राज को रात में जल्दी नींद नहीं आती थी. लेकिन चुपचाप बिस्तर पर कोई कितनी देर पड़ा रह सकता है. इसीलिए वे सबके सोने के बाद किताब उठाकर बाथरूम में चले जाते और वहीं पढ़ते रहते. तब तक जब तक नींद नहीं आने लगती. इसी बीच 1984 में उनका आईआईटी में इंजीनियरिंग में चयन हो गया. उन्होंने आईआईटी खडग़पुर से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री ली.
 राज कमल को खडग़पुर बहुत पसंद आया क्योंकि उनकी जिंदगी में यह पहला मौका था जब उन्हें एक पूरा रूम रहने को मिला, बिना किसी के साथ साझा किये. सी-231 आजाद हॉल. ऊपर से रात में बत्ती बुझाने के समय की कोई पाबंदी भी नहीं थी. यही वह समय था जब उन्होंने खुद के अंदर कहानी कहने की विधा को तलाश किया. पहली कहानी लिखी. एक ऐसे कुत्ते के बारे में जो बरसात के पानी में खेलने के इच्छा के चलते एक गढ्ढे में कूदता है और फिर उसे मालूम चलता है कि यह तो कुआं है. यह कहानी कॉलेज की मैगजीन में छपी. बाद में तीसरे और फिर फ़ाइनल इयर के दौरान तो वे कॉलेज पत्रिका के संपादक ही बन गये. 
यही वह समय था जब राज कमल को लगा उनकी रुचि इंजीनियरिंग से ज्यादा पत्रकारिता में है और उससे भी ज्यादा लेखन में, कहानी कहने में, सुनाने में, पढ़ाने में. कॉलेज खत्म करते ही उन्होंने कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एमए किया. वहीं न्यूयॉर्क टाइम्स और लॉस एंजलिस टाइम्स जैसे अख़बारों में लिखना शुरू किया. 1992 में द स्टेट्समैन बतौर सहायक संपादक ज्वाइन किया. दो साल बाद इंडिया टुडे में बतौर सीनियर एसोसिएट एडिटर दिल्ली आये. 1995-96 में जब शेखर गुप्ता ने इंडियन एक्सप्रेस संभाला, राज बतौर डिप्टी एडिटर उनके नंबर टू थे. शेखर कहीं भी रहें, रात दस-ग्यारह बजे के करीब राज से आधे-एक घंटे बात कर लगभग पूरा अखबार डिस्कस करते थे. 
राज की ख़ूबी थी अखबार का लेआउट और पठनीय शीर्षक देना. शुरुआत के दिनों में पहले पन्ने की लगभग सारी खबरें वही संपादित करते थे, शीर्षक देते थे. एक्सप्रेस के खुलेपन को फायदा उठाते हुए उन्होंने ख़ूब प्रयोग किये. वह चाहे 9/11 की कवरेज में लगभग तीन चौथाई पेज का फ्ऱंट पेज फोटो हो या लगभग एक महीने तक चली 'भारतीय जनता पेट्रोल पंप पार्टी' वाली सीरीज़ जिसमें उन्होंने देश भर में बीजेपी सरकार द्वारा अपने कार्यकर्ताओं को बांटे पेट्रोल पंप का खुलासा किया. 
भले ही राज कमल आज मुख्य संपादक हों, लेकिन ख़बरों में उनकी रुचि बरकऱार है. वे अक्सर कहते हैं, इन्हें ख़बरों के बीच अक्सर मुझे अपनी कहानियों के पात्र, सीन और प्लॉट मिल जाते हैं. यह मेरी जरूरी खुराक है. इसके बिना मैं जीवन की कल्पना नहीं कर सकता.शुक्रवार 

 

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