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छोड़ा मद्रास था, लौटा चेन्नई
प्रभाकर मणि तिवारी 
यूं तो अपने जीवन में बचपन से ही अनेक यात्राएं की हैं. बहता पानी निर्मला की तर्ज पर यात्रा करना मुझे हमेशा अच्छा लगता था. पिता जी के रेलवे की नौकरी ने इस काम को कुछ आसान बना दिया. कुछ इस तरह की रेलवे का पास मिलने की वजह से ट्रेन का किराया बच जाता था. वही पैसे घूमने-फिरने के काम आ जाते थे. कभी पढ़ाई तो कभी कालेज में दाखिले के लिए उत्तर से दक्षिण भारत तक की कई यात्राएं हुईं. अस्सी के दशक में तो तब के मद्रास (अब चेन्नई) में कोई चार साल रहा भी. लेकिन अक्तूबर, 1986 में न जाने किस घड़ी में वह महानगर छोड़ा कि दोबारा जाने का मौका ही नहीं मिल सका था. जून, 2000 में गुवाहाटी से स्थानांतरित होकर कोलकाता पहुंचने के बाद लगा कि अब मद्रास के कुछ करीब आ गया हूं. शायद अब जाने का मौका लगे. लेकिन नौकरी और दुनियादारी के लाख झमेलों ने इन यात्राओं को सिलीगुड़ी, बनारस, सिवान और पुरी तक ही सीमित कर दिया था. उसके बाद बेटी की पढ़ाई, इंजीनियरिंग कालेज में उसके दाखिले और भारी खर्चों की वजह से चाहते हुए भी कहीं निकलना नहीं हो सका था. पिछले साल जरूर आगरा और उत्तराखंड के दो सप्ताह के सफर पर निकला था. लेकिन दक्षिण भारत हमेशा आकर्षित करता रहा. अपने मित्र अंबरीश जी (जनसत्ता के पूर्व उत्तर प्रदेश ब्यूरो प्रमुख) का यात्रा वृत्तांत पढ़ कर दक्षिण की ओर जाने की इच्छा बलवती होती रही. लेकिन संयोग नहीं बन पा रहा था.
आखिर संयोग बना इस साल सितंबर में. महीनों की प्लानिंग, ट्रेन के टिकट और बाकी तमाम औपचारिकताओं को पूरा करते हुए दिन महीने बन कर बीतते रहे और आखिर वह दिन आ ही गया जब हावड़ा से चेन्नई की ट्रेन पकड़नी थी. हावड़ा से कोरोमंडल एक्सप्रेस अपने तय समय से ही रवाना हुई. 28 साल पहले इसी ट्रेन से मद्रास से लौटा था. अब फिर उसी ट्रेन से वहीं जा रहा था. नोस्टालजिक होना लाजिमी था. बीच के तीन दशक यादों से न जाने कहां हवा हो गए और उस शहर में बिताए दिनों की याद एकदम ताजी हो गई. लग रहा था जैसे कल की ही बात हो. लंबी यात्रा होने की वजह से सामान काफी था और दक्षिण भारत में खाने-पीने की दिक्कतों को ध्यान में रखते हुए पत्नी ने खाने का काफी सामान भी बना-बांध लिया था. भुवनेश्वर में रात का खाना खा कर सब लोग सोने चले गए। एसी टू के कोच में तीन सीटें तो हमारी ही थीं. चौथी पर एक दक्षिण भारतीय युवक था जो अपने मोबाइल पर लगातार तमिल में किसी से बात किए जा रहा था.
सुबह विशाखापत्तनम में आंख खुली. घड़ी देखी तो साढ़े चार बजे थे. चाय पीने की तलब हुई. लेकिन नींद भी आ रही थी. इसलिए चाय की बजाय नींद को तरजीह देते हुए चादर तान कर फिर लंबा हो गया. लेकिन एक बार नींद उचट जाए तो फिर आती कहां हैं. अपनी बर्थ पर लेटे हुए कोई तीन दशक पहले के चेहरे आंखों के आगे नाचने लगे. पता नहीं सब लोग कहां होंगे, मुलाकात होगी भी या नहीं, लोग वैसे ही होंगे या बदल गए होंगे-----इन सवालों से जूझते हुए बाहर झांका तो देखा ट्रेन राजमहेंद्री स्टेशन पहुंच रही है. सिर झटक कर मैं दक्षिण गंगा गोदावरी को देखने के लिए उठ कर बैठ गया. बेटी को भी जगा दिया था ताकि वो गोदावरी के चौड़े पाट को निहार सके. उसे पहले से ही इस नदी के बारे में विस्तार से बता रखा था. सो, वह भी ऊपर की बर्थ से नीच उतर आई. गोदावरी का पानी कुछ घट गया था लेकिन उसके पाट पहले की तरह ही चौड़े थे. आगे दस बजे विजयवाड़ा पहुंचे. वहां नीचे उतर कर चाय पी. पत्नी और बेटी के लिए खाने-पीने का कुछ सामान खरीदा. कोरोमंडल एक्सप्रेस विजयवाड़ा से रवाना होने के बाद कोई सात घंटे बाद सीधे मद्रास ही रुकती है. दिन का यह सफर उबाऊ होता है. लेकिन पत्नी और बेटी की चूंकि यह पहली दक्षिण यात्रा थी, इसलिए उनमें भारी उत्साह था.
खैर, शाम पांच बजे चेन्नई सेंट्रल पहुंचे. वहां से टैक्सी पर सामान लाद कर सीधे होटल, जो स्टेशन से ज्यादा दूर नहीं था. लेकिन मेट्रो रेल परियोजना ने स्टेशन के आसपास के इलाके के ट्रैफिक को इतना बेतरतीब कर दिया है कि होटल पहुंचने के लिए लंबा यू-टर्न लेना पड़ा. होटल के कमरे में पहुंचने के बाद थकान हावी होने लगी. नहा-धोकर चाय पीने के बाद कल की योजना बनने लगी. डिनर जल्दी निपटा कर बिस्तर पर गए तो नींद ने तुरंत आगोश में ले लिया.
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