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अबे इत्ते बुड्ढे थोड़ी हैं !

हिमांशु बाजपेयी

सन 2000 की बात है इसी साल के.पी. सक्सेना साहब को भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया था. एक रोज़ सुबह आठ बजे के.पी. साहब के घर का फोन बजा. उन्होने फोन उठाया तो दूसरी तरफ से आवाज़ आई- के.पी. सक्सेना साहब से बात हो सकती है, मै मुंबई से आमिर खान बात कर रहा हूं. के.पी. सक्सेना ने कहा- अमां सुबह सुबह आपको हमी मिलें तफरीह के लिए, और फोन काट दिया. बाद में आमिर खान ने परेश रावल से फोन करवाया जोकि के.पी. साहब के पुराने दोस्त हैं और ये ख्वाहिश जताई कि वे उनसे लगान के संवाद लिखवाना चाहते हैं. के.पी. मान गए लेकिन एक शर्त पर कि पूरी फिल्म वे लखनऊ में अपने घर पर बैठकर ही लिखेंगें, मुंबई में नहीं. ये थे केपी सक्सेना. पक्के लखनउआ.
 
अपनी शर्त के मुताबिक केपी ने लगान लखनऊ में बैठकर ही लिखी. लेकिन जब ये फिल्म परदे पर उतरी तो पूरी दुनिया इसकी इसकी जुबान की दीवानी हो गई. दिलचस्प है कि आधी सदी से ज्यादा समय तक केपी उनके गुदगुदाते हुए व्यंग्य में मौजूद लखनऊ के शहरी मध्यवर्ग के लिए पहचाने जाते रहे हैं लेकिन लगान में उनके लिखे संवाद हमें इतनी सहजता से अवध के किसी गांव में लेकर लिए जाते हैं जैसे कोई पिता अपने छोटे बच्चे को उंगली पकड़कर किसी नई दुनिया की सैर पर ले जाता है.इस रहस्य को उजागर करते हुए केपी लखनवी चुहल के अंदाज़ में जो बात कहते थे वो गौर करने लायक है- ‘ये अंग्रेज़ी (खड़ी बोली) तो अब पोंकी जाने लगी है घरों में. एक पीढ़ी पहले तक तो लखनऊ शहर में आम घरों की अपनी जुबान अवधी ही थी. फिर मैं घोंचू थोड़े था कि अवधी न जानूं !’
 
लगान के संवाद गांव के देसीपन का अहसास तो करवाते ही हैं लेकिन उससे कहीं ज्यादा अहम बात ये है कि वे हमें साहित्य की उस जनवादी परंपरा के पास ले जाती हैं जिसके केंद्र में हमेशा आम आदमी रहा. ‘चूल्हा म से रोटी निकारै के लिए, चिमटा का अपन मुंह जलाए का पड़ी’ क्या ये संवाद हमें प्रेमचंद की अमर कहानी ईदगाह की याद नहीं दिलाता. या ‘जूते का तल्ला चाहें कितना भी मोटा क्यों न हो साहेब, एक न एक दिन घिसत जरूर है, फिर कीलें चुभै लगती हैं.’ ये संवाद नज़ीर अकबराबादी के ‘सब ठाठ पड़ा रह जाएगा जब लाद चलेगा बंजारा’ जैसा नहीं लगता ?
 
केपी को फिल्मी दुनिया में शोहरत भले ही लगान से मिली (कम ही लोग जानते हैं कि उनकी लिखी पहली फिल्म 1972 की ‘दो गज़ ज़मीन के नीचे’ थी) लेकिन बकौल केपी उन्हे सबसे ज्यादा मज़ा जोधा-अकबर लिखने में आया. क्योंकि इस फिल्म के ज़रिए उन्हे पहली बार फिल्मी परदे पर अपनी उर्दू के जौहर दिखाने का मौका मिला. लखनऊ के कायस्थ वैसे भी उर्दू के मामले में अपनी मिसाल आप हैं. फिल्म जोधा-अकबर से जुड़ी अपनी एक याद केपी तफरीहबाज़ी के साथ सबसे बांटा करते थे. हुआ ये कि जोधा-अकबर की शूटिंग हो रही थी. एक संवाद था खालिस उर्दू में जो रितिक रोशन को बोलना था लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद उनसे नहीं हो पा रहा था. थक हार कर आशुतोष गोवारिकर ने लखनऊ में केपी के लैण्डलाइन नंबर पर फोन लगाकर संवाद में मामूली हेरफेर करने को कहा. केपी ने कहा अभी किए देते हैं, ज़रा रितिक से बात कराइए. रितिक फोन पर आए तो केपी ने उनसे अपने अंदाज़ में कहा- ‘का लल्ला ? कायस्थन के नाक कटाय देहौ का.’इसके बाद केपी ने रितिक को फोन पर ही वो संवाद अपने साथ-साथ कहने को कहा. थोड़ी देर बाद रितिक ने फोन रखा और वो संवाद बिना कोई तब्दीली करवाए जैसे का तैसा बोल दिया. ऐसे थे केपी. मज़ाक मज़ाक में उर्दू ही नहीं बहुत कुछ सिखा जाने वाले. 
 
केपी और उर्दू के सिलसिले से ये बताना भी ज़रूरी हो जाता है कि केपी ने अपनी शुरूआत उर्दू में कहानीकार के बतौर की और उऩ्हे सबसे पहले पढ़ा उनके मित्र और उर्दू के वरिष्ठ पत्रकार आबिद सुहैल ने. इसके बाद केपी की कहानियां पाकिस्तान की पत्रिकाओं में भी छपीं. लेकिन बाद में अपने गुरू अमृतलाल नागर के आदेश पर वे व्यंग्य के क्षेत्र में चले आए जो कि तब तक एक खाली मैदान था जिसमें सबसे ज्यादा छक्के चौके लगाए जा सकते थे. केपी ने किया भी ऐसा ही. दुनिया को अलविदा कहने से पहले वे 17000 से ज्यादा व्यंग्य लिख चुके थे जो अपने आप में एक कीर्तिमान है. अमृतलाल नागर ने ही बरेली के कालिका प्रसाद को लखनऊ का केपी बनाया वो नाम जो बाद में व्यंग्य का सबसे बड़ा स्थानीय ब्रांड बन गया. वे संभवत: देश के अकेले गद्यकार थे जिन्हे कवि सम्मेलनों में हास्य के धुरंधर कवियों से ज्यादा सम्मान के साथ बुलाया जाता था और जो गद्य सुनाकर भी कवि सम्मेलन लूट लेने का माद्दा रखते थे के.पी.  की शैली हरिशंकर परसाई और मुजतबा हुसैन की तरह के तीखे व्यंग्य की नहीं थी. वे शरद जोशी की तरह व्यंग्य को हास्य में लपेटकर पेश करने में ज्यादा सहज थे. उनकी लखनवी शैली की उनकी मौलिकता और देशजता उन्हे अनूठा बना देती है. ‘खलीफा तरबूजी’ से लेकर ‘मिर्जा साहब’ तक उनके चरित्र कभी नहीं भुलाए जा सकते, न ही ‘बीबी नातियों वाली’ की बेगमाती जुबान का जादू कम हो सकता है. 
 
इस दौर में जब लखनऊ में ‘बुज़ुर्गों का लखनऊ’ बहुत कम बचा है केपी के जाने के बाद वो थोड़ा और घट गया है. जिस दौर में बाज़ार की तरफ से सारे शहरों को एक जैसा कर देने की साज़िशें जोर-शोर से चल रही हैं, उसके बीच केपी जैसे लेखक का होना जैसे एक प्रतिरोध का होना था, जिनके हर एक लफ्ज़ में लखनऊ की गलियों की रंगीनी का अहसास होता है. उनका लखनऊ आम आदमी का लखनऊ था. वो आम आदमी जो नवाबी के जलवों को देखकर चकाचौंध नहीं होता था बल्कि उनमें दम-ब-दम अपना हक़ तलाशने की जुगत में रहता था. ये वो दृष्टि थी जिसको नागर जी ने उजाला दिया था और जो उनके बाद केपी और योगेश प्रवीन तक विस्तार पाती गई. खुद योगेश प्रवीन जिन्होने भारतीय टेलीविज़न के पहले सोप ओपेरा बीवी नातियों वाली में केपी के साथ काम किया था कहते हैं- ‘मैं तो लखनऊ में ही पैदा हुआ पला बढ़ा इसलिए मेरे अंदर लखनऊ होना कोई कमाल नहीं लेकिन केपी बरेली से लखनऊ आए और लखनऊ ने उन्हे लखनउआ बना लिया. यही लखनऊ की रिवायत रही है, लोगों को दूर-दूर से बुलाकर अपना बना लेना. लखनवियत में डूबे जैसे जुमले उनकी जुबान से निकलते थे और किसी को मयस्सर नहीं.’ हालांकि इस बयान में योगेश प्रवीन का अपना बड़प्पन भी छिपा है लेकिन ये सच है कि अमृतलाल नागर के बाद लखनऊ के जन में बसे जुमलों को व्यंग्य के साथ जितना खूबसूरती से केपी ने इस्तेमाल किया उतना दूसरा कोई नहीं कर पाया. खर्च हो जाना, छोटी लाइन का मुसाफिर होना, अमां वाssह, जीते रहिए, जैसे तमाम लखनवी जुमले हैं जो उनके अंदाज़ के साथ मिलकर जादुई हो जाते थे. स्वदेस के लिए लिखे गए उनके संवाद‘अपने ही पानी में पिघलना बर्फ का मुकद्दर होता है' और 'भइए कब तक चारपार्इ के दोनों तरफ से उठते रहोगे’ उनके सोचने की धार का पता देता है. 
 
असल में ये निजी ज़िंदगी की ही तफरी थी जो केपी की रचनाओं में उतरती थी. एक दफे वे मुंबई गए किसी कवि सम्मेलन में तो पता चला कि लखनऊ विश्वविद्यालय में उनके सहपाठी रहे मशहूर गायक तलत महमूद बीमार हैं. हालांकि कई सालों से वे तलत साहब के सम्पर्क में नहीं थे लेकिन फिर भी उनका हालचाल पूछने उनके घर पहुंच गए. तलत साहब को जब पता चला कि लखनऊ से उनके दोस्त केपी सक्सेना आए हैं तो उन्होने हैरत से पूछा- केपी ! तुम बंबई में ? इस पर केपी ने जवाब दिया- ‘अमां हमने सोचा तुम बोर हो जाते होगे अकेले पड़े पड़े. दोनो बुड्ढे मिल कर तफरी करेंगें !’ पचास साल से ज्यादा समय तक अखबारी व्यंग्य के शिखर पर रहे केपी में व्यंग्य को सूंघ निकालने की क्षमता बुढ़ापे में भी कम नहीं हुई थी. इन दिनों वे आत्मव्यंग्यात्मक शैली में अपनी आत्मकथा लिख रहे थे. दुनिया छोड़ने से कुछ ही दिन पहले उन्होने अपने एक व्यंग्य में मौत पर निशाना साधते हुए लिखा था- ‘इधर मैं काफी समय से महसूस कर रहा हूं कि लोगों में मरने का सलीका नहीं रह गया है. अभी हैं, बोल बतिया रहे हैं और तड़ से खिसक लिए. मरने के मामले में ये धोखा-धड़ी टॉलरेबल नहीं है. कोई किसी को रोकता नहीं. जब वक्त आए अपनी फाइल क्लोज़ करो, मगर इस नेक काम में लत्त-भत्त नहीं होनी चाहिए. एक सलीका, एक कोड ऑफ कन्डेक्ट होना चाहिए दम तोड़ने का…’
 
आखिरी बार उनके अस्सीवें जन्मदिन के ठीक बाद उनसे मिलना हुआ तो अपने कैमरे से उनकी एक तस्वीर खींची थी. तस्वीर खिंचने के बाद बच्चों की तरह कैमरे पर लपकते हुए उन्होने मुझसे वो तस्वीर दिखाने को कहा था. शायद तस्वीर उन्हे पसंद नहीं आई थी इसलिए देखते ही बोले थे- ‘अबे इत्ते बुड्ढे थोड़ी हैं !’ 
 
रास्तों, क्या हुए वो लोग जो आते-जाते
मेरे आदाब पे कहते थे के 'जीते रहिए' !
 
(लेखक रिसर्च स्कॉलर और स्वतंत्र पत्रकार हैं.)
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