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खेत बचाने में जुटी हजारों विधवाएं

अंबरीश कुमार
अकोला, सितम्बर। विदर्भ की हजारों विधवाएं अब अपने खेत बचाने की कवायद में जुटी हैं। वर्ष 2००1 से जनवरी 2००9 तक विदर्भ के 11 जिलों में 48०6 किसान खुदकुशी कर चुके हैं। विदर्भ जन आंदोलन समिति के किशोर तिवारी का दावा है कि अभी भी औसतन दो किसान रोज खुदकुशी कर रहे हैं। जवान किसान खुदकुशी कर ले तो उसकी पत्नी किस त्रासदी से गुजरती है, वह यहां के गांव में देखा जा सकता है। खेत से लेकर अस्मत बचाने तक की चुनौती झेल रही इन महिलाओं की कहानी कमोवेश एक जैसी है।
अकोला के तिलहारा ताल्लुक की शांति देवी ने कहा, 'आदमी तो चला गया, अब खेत कैसे बचाएं। खेत गिरवी है। साहूकार रोज तकाजा करता है। एक बेटा गोद में तो दूसरी बच्ची का स्कूल छूट चुका है। पच्चीस हजार रूपए कर्जा लिया था और साहूकार पचास हजार मांग रहा है। नहीं तो खेत अपने नाम कराने की धमकी देता है। फसल से जो मिलेगा, वह फिर कर्जा चुकाने में जाएगा। क्या खाएंगे और कैसे बच्चों को पालेंगे? सरकार कहती कुछ है पर होता कुछ नहीं है।’
साहूकारों के कर्ज में विदर्भ के ज्यादातर किसान परिवार डूबे हैं। इनकी मुख्य वजह वित्तीय संस्थानों और बैंकों का यहां के किसानों की उपेक्षा किया जाना है। 65-7० फीसदी कर्जा गांव और आसपास के साहूकारों का होता है। वह भी 6० से लेकर 1०० फीसदी ब्याज पर। पर वह भी नकद नहीं मिलता। गांव में साहूकारों के कृषि केन्द्ग खुले हुए हैं। इन्हीं से किसानों को कर्ज के रूप में बीज, खाद और कीटनाशक मिलता है। साहूकारी का धंधा भी चलता है और खाद-बीज की दुकान भी। कर्जा बढ़ता है तो किसान इन्हीं साहूकारों से मिले कीटनाशक से अपना जीवन खत्म कर लेता है।
इससे पहले जंगल और पहाड़ों से घिरे अमरावती जिले के एक छोटे से हिवरा गांव में हमें केन्द्ग की कर्जमाफी योजना का कड़वा सच भी देखने को मिला। इस गांव की रेखा सामरे जब अपनी आपबीती बताती हैं तो उनकी आंखों में आंसू भरे नजर आते हैं। तीस साल के पति दिलीप ने बीते चार सितम्बर को कीटनाशक पीकर खुदकुशी कर ली थी। रेखा सामरे ने कहा, 'हमारे आदमी ने सहकारी बैंक से 15 हजार रूपए कर्ज लिया था लेकिन इससे काम नहीं बना तो साहूकार से 25 हजार रूपया और कर्ज लिया। लेकिन फसल बर्बाद हो गई और उसी चिंता में आदमी साहूकार के दबाब में रोज परेशान रहता था। खुद तो मुक्ति पा ली पर हमें छोड़ गया। बड़ी बेटी शुभांगी आठ साल की है और छह साल की छोटी वैशाली। दोनों स्कूल नहीं जा पा रही हैं। सरकार ने आत्महत्या करने वाले किसानों के लिए कर्जा माफी की घोषणा की थी पर यहां कोई नहीं आया।’
गौरतलब है कि केन्द्ग सरकार ने किसानों की कर्जमाफी के लिए 71००० करोड़ रूपए देने का एलान किया था लेकिन जमीनी स्तर पर यह योजना धराशायी होती नजर आ रही है। वर्धा, अमरावती और अकोला के कई गांवों में किसानों से बातचीत करने पर यह बात सामने आई। कर्जमाफी योजना के बाद से 28० किसान खुदकुशी कर चुके हैं। पैसा तो आता है लेकिन ज्यादा मलाईदार तबके की जेब में है। कांग्रेस के पूर्व सांसद उत्तम राव पाटिल के परिवार वालों को भी इस कर्जमाफी योजना का फायदा मिल चुका है। सरकारी योजना के नाम पर साले-साली तक को गाय-भ्ौसें मिल चुकी हैं। एक दर्जन से ज्यादा कांग्रेसी विधायक इन योजनाओं का पैसा ले चुके हैं। पर गरीब किसान को कोई भी फायदा नहीं मिलता। विदर्भ के किसानों पर पिछले एक दशक से काम करने वाले वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप मैत्रा न कहा-अब नया संकट तो विधवा महिलाओं के सामने अस्मत बचाने का भी है। कुछ समय पहले यवतमाल जिले के सरकारी अस्पताल में एक विधवा महिला की गर्भपात की वजह से मृत्यु हो गई। उसके पति ने दो वर्ष पूर्व खुदकुशी कर ली थी। इसके बाद एक साहूकार ने सरकारी मदद दिलाने के नाम पर उसका शोषण करना शुरू किया। यह एक नया खतरा है। क्योंकि खुदकुशी करने वाले ज्यादातर जवान किसान अपने पीछे कर्ज का बोझ छोड़ जाते हैं जिसकी भरपाई उनकी पत्नी और बच्चों को करनी होती है। यदि सरकार ने जल्द ही इस दिशा में गंभीरता से कोई पहल नहीं की तो विदर्भ में हजारों परिवार बिखर जाएंगे। जनसत्ता

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