ओली के बाद प्रचंड की भी राह आसान नही

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ओली के बाद प्रचंड की भी राह आसान नही

यशोदा श्रीवास्तव

काठमांडू. नेपाल की राजनीति में पिछले एक सप्ताह से गजब की हलचल है. एक ओर राजनीतिक विश्लेषक किसी चौंकाने वाली खबर को लेकर सतर्क हैं, वहीं देर रात अखबार छोड़ने के बाद भी काठमांडू का मीडीया संसार इस बातको लेकर निश्चिंत नहीं रह पाता कि ओली सरकार को लेकर कुछ नया न हो जाए.

बता दें कि नेपाल में सत्ता की जंग रोमांचक दौर में है.सत्ता दल के ही तीन वरिष्ठ नेता पूर्व पीएम माधव नेपाल,बामदेव गौतम तथा पूर्व अध्यक्ष झलनाथ खनाल के भी पीएम ओली के खिलाफ खुलकर आ जाने से सरकार की स्थिति मझधार जैसी हो गई है. पूर्व पीएम प्रचंड ओली को पहले ही अक्षम बताते हुए स्तीफा मांग चुके हैं.पिछले दिनों स्टैंडिंग कमीटी की बैठक गहमागहमी भरी रही.बैठक में उनपर स्तीफे का भारी दबाव दिखा.ओली दुबारा बैठक में नहीं आए लेकिन चौंकाने वाली बात यह रही कि इसके तुरंत बाद उन्होंने सरकारी आवास पर कैविनेट की बैठक ली जिसम़े चालू बजट सत्र समाप्त करने का अव्यवहारिक किंतु बड़ा फैसला लिया.इसके बाद ओली राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी से मिले और सत्ता के खींच तान को लेकर ताजा जानकारी दी.जानकारों की मानें तो अविश्वास प्रस्ताव से बचने के लिए ओली ने यह कदम उठाया.स्टैंडिंग कमेटी  की बैठक को लेकर चर्चा तेज थी कि ओली बैठक को संबोधित कर देश की ताजा हालात से सबको अवगत कराते हुए त्याग पत्र की घोषणा कर सकते हैं.ऐसा नहीं हुआ. 

नेपाल के राजनीतिक विशेषज्ञ मान रहे हैं कि नेपाल की राजनीति में मची हलचल का पटाक्षेप अगले दो दिनों में हो सकता है.अपने और विपक्षी दलों के दबाव से घिरे पीएम ओली अपनी सरकार बचाने की हर कोशिश में जुटे हुए हैं. इसमें अपने समर्थक सांसदों को लेकर अलग पार्टी का गठन भी शामिल है. निर्वाचन सदन में उन्होंने नए दल के पंजियन संबंधी आवेदन कर रखा है.165 सदस्यीय प्रतिनिधि सभा में 80 सांसद एमाले के हैं. यह देखना होगा कि इनमें से कितने ओली के साथ आते हैं.

इधर ओली की सरकार यदि जाती हैं तो नई सरकार का मुखिया कौन होगा,इस पर भी संशय है. आम चुनाव के वक्त ओली और प्रचंड फिफ्टी फिफ्टी के शर्त पर साथ आए थे.सीटों के समझौते के तहत दोनों अपने अपने दल और चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़े थे.प्रचंड को 36 सीटों पर सफलता मिली थी.बाद में प्रचंड ने अपनी पार्टी का विलय भी ओली की पार्टी एमाले में कर लिया था.अभी वे सत्ता दल के कार्यकारी अध्यक्ष हैं.

जैसा की संभावना है, यदि सत्ता दल विभाजित होता है तो प्रचंड गुट संसद में बड़ा दल ही रहेगा लेकिन सरकार बनाने के लिए उनके साथ और कौन आएगा इसपर राजनीतिक विश्लेषकों की नजर है. जानकारों का कहना है कि आज ओली से स्तीफा मांगने वाले एमाले के ही लोग प्रचंड के साथ आएं,यह जरूरी नहीं है. जहांतक नेपाली कांग्रेस की बात है, वह शायद ही यह भूल पाया हो जब प्रचंड चुनाव के एनवक्त उसका साथ छोड़कर ओली के साथ जा मिले थे.मधेशी दल भी भरोसे लायक नहीं हैं. इनका तो इतिहास बनता जा रहा है, जिससे ये लड़ते हैं,पद की लालच में उसीकी सरकार में साथ हो लेते हैं. ओली भी मधेशी दलों और नेपाली कांग्रेस के संपर्क में लगातार बने हुए हैं.

मालूम हो कि लिपुलेख, लिंपियाधुरा तथा कालापानी को लेकर भारत से पंगा लेने के बाद से ही ओली सरकार पर संकट के बादल छा गए.अपनी सरकार बचाने के लिए उन्होंने राष्ट्रवाद का लबादा ओढ़ते हुए भारत पर सरकार गिराने तकका तोहमत मढ़ दिया. उनका हर दांव उलटा पड़ता गया.ओली का विवाह नागरिकता विल का दांव भी उल्टा पड़ गया. इसे लेकर  90 लाख की आवादी वाले क्षेत्र तराई में  सारे मधेशी दल सरकार के विरोध में उतर आए हैं. नेपाल में ओली सरकार को लेकर एक भी स्थिति ऐसी नहीं है जिसे इनके पक्ष में कहा जाए. ऐसी स्थिति में ओली सरकार के चौंकाने वाली किसी खबर को लेकर नेपाल की मीडिया से लेकर विश्लेषक तक सभी चौकन्ने है.

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