अलविदा राहत

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अलविदा राहत

दया सागर 

दुबई के उस शानदार आडिटोरियम में मुशायरे की सारी तैयारी पूरी हो चुकी थी. लेकिन इस बार ऐन मौके पर राहत इंदौरी नहीं आए. राहत साहब की शायरी पढ़ने के अंदाज पर मैं गजब फिदा था. वो एक अदद ऐसा लुटेरा था जो गजल पढ़ने से पहले ही मुशायरा लूट लेता था. शेर पढ़ने का उनका नाटकीय ढंग समां बांध देता था-‘किसने दस्तक दी ये दिल पे, कौन है? फिर राहत भाई इस लाइन को अपने खास अंदाज में एक-एक लफ्ज पर जोर देकर तीन बार दोहराते थे. फिर मुशायरे में थोड़ा समां बांधेंगे-‘मैं शेर पढ़ कर बताता हूं मुन्नवर भाई आप सुन कर बताइएगा.’ फिर अगली लाइन में हाथ हिलाते हुए आपको चौकाएंगे-‘आप तो अंदर हैं, बाहर कौन है?’ इस तरह पब्लिक को किसी हुनरमंद मदारी की तरह खुश करके राहत भाई खूब तालियां बटोरते और मुशायरा लूट लेते थे. लेकिन उस बार वह दुबई नहीं आए. मैं बहुत मायूस हुआ था. मेरे दुबई के दोस्त रेहान भाई ने बताया कि उनके जिस्म में शक्कर की गिनती अचानक इतनी बढ़ गई है कि डाक्टर ने घर से निकलने से मना कर दिया. ये अफवाह नहीं पक्की खबर थी, क्योंकि इस मामले में राहत भाई अक्सर ये कह कर सब पर इलजाम लगाते हैं कि ‘अफवाह थी कि मेरी तबियत खराब है/ लोगों ने पूछ पूछ कर बीमार कर दिया।’ अरे भाई लोगों ने पूछ पूछ कर बीमार कर दिया कि आप खुद बे-परहेजी के शिकार हो गए. पर मैं जानता हूं शायरों की दुकान ऐसे ही चलती है.
आज शाम दफ्तर में ही था कि खबर आई कि राहत भाई नहीं रहे. ये मेरे लिए एक सदमे जैसा था. मैंने मुम्बई में अपने दोस्त आफताब भाई से पूछा- यूं अचानक कैसे? उन्होंने बताया कल रात में बात हुई. तो एकदम ठीक थे. लेकिन अभी खबर आई कि शाम दिल ने धोखा दे दिया. फेफड़े पहले से कमजोर हो चुके थे. ऊपर से चीनी वायरस का हमला. अक्सर मुशायरों में वह शेर की एक लाइन पढ़ते फिर सुनने वालों से बोलते- इसे संभाल लीजिएगा, अगर इसे संभाल लिया तो राहत इंदौरी संभल जाएगा. जब वह कोरोना के इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती हुए तो मुझे लगा उन्होंने डाक्टर से भी जरूर कहा होगा- इसे संभाल लीजिएगा डाक्टर साहब अगर इसे संभाल लिया तो राहत इंदौरी संभल जाएगा. 
लखनऊ में उनसे एक दो बार की मुलाकात है. बहुत पहले अखबार के लिए उनका ए​क इंटरव्यू भी लिया था. जो तेवर उनकी शायरी में थे वही तेवर उनकी बातचीत के लहजे में थे. 'सब की पगड़ी को हवाओं में उछाला जाए. सोचता हूं कोई अखबार निकाला जाए.' मैंने उनके इस शेर के हवाले से पूछा कि अखबारों और सहाफियों (पत्रकारों) के बारे में आपके ख्यालात अच्छे नहीं हैं? तो खूब जोर से हंसे. बोले- 'सच कहूं तो सागर भाई अखबार के बिना मेरी सुबह नहीं होती.' फिर उन्होंने अपना एक और शेर सुनाया-"बनके एक हादसा बाजार में आ जाएगा, जो नहीं होगा वह अखबार में आ जाएगा." मैंने भी मुस्कुरा कर कहा- "ये तो अखबार में जरूर आ जाएगा."  अब तक कोई बड़ा अवार्ड ने मिलने के सवाल पर उन्होंने कहा था-सारी सरकारें कम्बखत एक-सी तसीर होती हैं. अपने खिलाफ कुछ नहीं सुनना चाहतीं. एक बार तो सरकार के खिलाफ कोई शेर लिखने पर उन्हें थाने में बैठा लिया गया था. राहत भाई ने कहा-अरे दारोगा साहब इस शेर में मैंने कहां कहा कि भारत की सरकार चोर मक्कार है. दरोगा हंसे और बोले-जैसे हमें नहीं पता कि कहां कि सरकार चोर मक्कार है. ये किस्सा वे अक्सर मुशयरों में सुनाया करते थे. जितनी अच्छी शायरी वो सियासत पर करते थे उतनी ही अच्छी शायरी वे इश्को-मुहब्बत पर कहते थे. वे कहते कि मेरा शहर अगर जल रहा है और मैं कोई रोमांटिक ग़ज़ल गा रहा हूं तो अपने फ़न, देश, वक़्त सभी से दगा कर रहा हूं. मुसलमानों को पाकिस्तान चले जाने की नसीहत देने वालों को राहत ने बेहद माकूल जवाब दिया- जो आज साहिबे-मसनद है कल नहीं होंगे/किराएदार है जाती मकान थोड़ी है/सभी का खून है शामिल यहाँ की मिटटी में/किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है. अब अतिवादियों को ये शेर भी बुरा लग गया. लेकिन उन्हें किसी के बुरा लगाने की परवाह कहां थी. वो तो बस शायरी करते थे जिसमें तल्खी के साथ कोई गंभीर इशारा होता था जो सोचने पर मजबूर कर देता था.. लेकिन इसमें तो शक नहीं कि राहत को हिन्दुस्तान से इश्क था जो उन्होंने लिखा- 'मैं मर जाऊं, तो मेरी एक अलग पहचान लिख देना, लहू से मेरी पेशानी पे हिन्दुस्तान लिख देना'    
जब दिमाग पर पर्दा पड़ा हो तो किसी को समझाना मुश्किल है. शायर बहुत से हैं और होंगे लेकिन अब राहत जैसा शायर फिर कभी नहीं होगा. खैर आज देर रात इंदौर के खजरान कब्रिस्तान में उनको दफ्न कर दिया गया. जहां वह एक बार फिर कह सकते हैं- "दो गज सही ये मेरी मिलकियत तो है, ऐ मौत तूने मुझे जमींदार कर दिया." अब ये जमींदार हिन्दुस्तान की जमीन में खाक हो गया. निकाल सको तो निकाल दो उन्हें इस मिट्टी से.

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