पुर्तगाल ,गोवा और आजादी

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पुर्तगाल ,गोवा और आजादी

अंबरीश कुमार 

यह मापूसा में लोहिया पार्क है .फोटो मैंने ही ली .गोवा की आजादी की लड़ाई पर एक पुस्तक की योजना पर काम कर रहा हूं.इस सिलसिले में मित्रों से मदद की उम्मीद कर रहा हूं .गोवा के और कोंकण अंचल के हमें ऐसे लोगों से बात करनी है जो अभी जीवित हैं और गोवा की लड़ाई में किसी भी तरह हिस्सा लिया था ,देखा था या किसी और ढंग से शामिल थे .लोहिया मधुलिमये से जुड़ा अगर कोई संगठन परिवार हो तो उनसे भी मुलाक़ात अगर संभव हो तो .गोवा का भूगोल ही नहीं इतिहास भी दिलचस्प है .

गोवा 1498 में वास्कोडिगामा के आने के बाद पुर्तगालियों की दृष्टि में आया। 17वीं शताब्दी के पूर्वाद्ध तक यहाँ पुर्तगालियों का कब्जा हो गया। भारत के आजाद होने के बाद भी गोवा गुलाम रहा और 19 दिसम्बर 1961 को मुक्त हुआ. गोवा की आजादी का सिंहनाद डा लोहिया ने किया था। यहां के लोकगीतों में डा लोहिया का वर्णन पौराणिक नायकों की तरह होता है. 11 अप्रैल 1946 को 20 मई 1944 से गिरफ्तार लोहिया को रिहा किया गया. वे 9 अगस्त 1942 को भूमिगत हुए थे तब से लेकर 11 अप्रैल 1946 तक झंझावातों में रहे, लगभग 4 साल की असहनीय पीड़ा से शरीर का अस्वस्थ होना स्वाभाविक था, ऐसे में उनके गोवा निवासी मित्र जूलियो मैनेजिस ने गोवा आराम करने के लिए बुलाया. मैनेजिस आसोलना में रहते थे. जैसे गोवावासियों को पता चला कि बयालिस के नायक लोहिया आए हैं, हलचल मच गई. प्रसिद्ध नेता पुरुषोत्तम काकोड़कर अपने साथियों के साथ मिलने आए. 15 जून 1946 को पंजिम में डा लोहिया की सभा हुई जिसमें तय हुआ 18 जून से 'सविनय अवज्ञा' प्रारम्भ होगा। पुलिस ने टैक्सी वालों को मना कर दिया था, डा लोहिया मडगांव सभा स्थल घोड़ागाड़ी से पहुंचे . घनघोर बारिश, 20 हजार की जनता और मशीनगन लिए हुए पुर्तगाली फौज. गगनचुम्बी नारों के बीच डा लोहिया के ऊपर प्रशासक मिरांडा ने पिस्तौल तान दिया, लेकिन लोहिया के आत्मबल के आगे उसे झुकना पड़ा. पाँच सौ वर्ष के इतिहास में गोवा में पहली बार आजादी का सिंहनाद हुआ. लोहिया और मैनेजिस गिरफ्तार कर लिए गए. पूरा गोवा युद्ध-स्थल बन गया. पंजिम थाने पर जनता ने धावा बोल कर लोहिया को छुड़ाने का प्रयास किया, एक छोटी लड़की को जयहिन्द कहने पर पुलिस ने काफी पीटा. 21 जून को गवर्नर का आदेश निर्गत हुआ कि आम-सभा व भाषण के लिए सरकारी आदेश लेने की आवश्यकता नहीं. 

लोहिया चौक पर झण्डा फहराया गया। गोवा को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा पुर्तगाल को तीन माह की नोटिस देकर लोहिया लौट आए। 26 जून 1946 के अंक में महात्मा गांधी ने लेख लिख कर लोहिया की गिरफ्तारी का पुरजोर विरोध किया। तीन महीने पश्चात डा0 लोहिया दोबारा गोवा के मडगांव के लिए चले. उन्हें कोलेम में ही गिरफ्तार कर लिया गया. 29 सितम्बर से 8 अक्टूबर तक उन्हें आग्वाद के किले में कैदी बनाकर रखा गया, बाद में अनमाड़ के पास लाकर छोड़ा गया. 2 अक्टूबर को अपने जन्मदिन के दिन 'बापू' ने 'लार्ड बेवेल' से लोहिया की रिहाई के लिए बात की। लोहिया पर गोवा-प्रवेश के लिए मनाही हो गई.

यह एक उदाहरण हैं .ऐसी बहुत सी घटनाएं हैं जिनका ब्यौरा इकठ्ठा किया जा रहा है .कुछ किया भी है .मित्रों से इसी सिलसिले में मदद की उम्मीद है .डा सुनीलम ने भरोसा दिया है .गोवा की आजादी के एक नायक मधुलिमये के वे भी करीब रहे .कई बार स्कूटर से उन्हें संसद लेकर जाते वर्ना राजकुमार जैन का स्कूटर होता .अब सुनीलम ऐसे मित्रों से इस सिलसिले में बात करेंगे जिन्हें गोवा की आजादी की लड़ाई की अच्छी जानकारी है .उनके साथ ही अपने और मित्रों से भी उम्मीद है वे इस काम में मदद करेंगे .


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