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माओवाद नहीं ,खतरा तो दलित एकजुटता है

अरुण कुमार त्रिपाठी

नई दिल्ली .भारत के सुप्रीम कोर्ट ने पांच प्रतिष्ठित मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी और नौ लेखकों, वकीलों और बौध्दिकों के घर हुई तलाशी के बारे में लोकतंत्र को सचेत करते हुए इंसाफ की सीटी बजा दी है.न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ की यह टिप्पणी जनतंत्र के अंतःकरण की आवाज है कि असहमति लोकतंत्र का सेफ्टीवाल्व है अगर यह नहीं रहेगा तो प्रेशर कूकर फट सकता है.भारत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र के नेतृत्व में तीन सदस्यीय पीठ ने मामले की सुनवाई के लिए 6 सितंबर को अगली तारीख दे दी है और तब तक वरवर राव, वेरनान गोनसाल्विस, अरुण परेरा सुधा भारव्दाज और गौतम नवलखा को घर में नजरबंद रहने का आदेश हुआ है और उनके घर के बाहर पुलिस निगरानी करेगी.वास्तव में यह पूरा मामला माओवादियों से ज्यादा दलित राष्ट्रीयता को हजम न कर पाने का है.दरअसल सरकार कहीं पर निगाहें और कहीं पर निशाना लगा रही है.संघ और भाजपा सरकार जानती है कि माओवादी कभी उसके लिए चुनावी खतरा नहीं बनने जा रहे हैं.लेकिन अगर संघ के हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्र के जवाब में देश में दलित राष्ट्रवाद उभरा तो आंबेडकर को प्रातः स्मरणीय बनाने की उसकी योजना धरी रह जाएगी
 
अगर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यकर्ताओं और प्रधानमंत्री के भक्तों को छोड़ दिया जाए तो सुप्रीम कोर्ट के साथ साथ यह सवाल पूरा देश पूछ रहा है कि इस साल जनवरी के पहले दिन महार रेजीमेंट के `शहीदों’ की याद में पुणे के भीमाकोरेगांव में येल्गार परिषद की ओर से आयोजित कार्यक्रम के आठ महीने बाद पुलिस को यह अहसास कैसे हुआ कि वह एक माओवादी आयोजन था और उसके पीछे शीर्षस्थ वामपंथी बौध्दिक थे जो हिंसा से सत्ता पलटना चाहते थे और प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश कर रहे थे.यही वजह है कि देश भर के मानवाधिकार कार्यकर्ता, वकील, पत्रकार और बौध्दिक उत्तेजित हैं और पुणे पुलिस की कहानी पर ही नहीं मौजूदा सरकार की नीयत पर भी सवाल उठा रहे हैं.
निश्चित तौर पर सरकार का समर्थक इलेक्ट्रानिक और भाषाई मीडिया गोनसालविस के घर से मिली चिट्ठी को ही सबूत मान कर यह प्रचारित कर रहा है कि उन लोगों ने प्रधानमंत्री की हत्या की योजना बनाई थी.पुलिस यह भी कह रही है कि ये लोग किसी शीर्षस्थ निर्णायक मंडल के सदस्य हैं और वह सरकार और नेताओं पर कार्रवाई का आदेश देता है.पुलिस ने इन लोगों की सोच को व्यक्त करते हुए कहा है कि इन लोगों का मानना था कि जिस तरह से भाजपा पंद्रह राज्यों में सरकार बना ले गई है, उस तरह से अगर उसका विस्तार होता रहा तो आने वाले दिनों में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री केपद से हटाना मुश्किल हो जाएगा.ऐसे में पुलिस के अनुसार वे लोग प्रधानमंत्री की हत्या की उसी तरह योजना बना रहे थे जैसे कि 1991 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या कर की गई थी.
पुलिस की इस कहानी को सत्ताधारी वर्ग के नेता और अधिकारी भले खामोशी से समर्थन दे रहे हों लेकिन रोमिला थापर, देविका जैन, प्रभात पटनायक, सतीश देशपांडे, माजा दारूवाला और प्रशांत भूषण जैसे सामाजिक कार्यकर्ता और बौध्दिक ही नहीं लगभग सारा विपक्ष इसका विरोध कर रहा है.कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने तो कहा ही है कि अब देश में एक ही एनजीओ रहेगा और वह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ.बाकी सभी को बंद कर दिया जाएगा.जबकि प्रकाश करात, सीताराम येचुरी, डी राजा, शरद पवार और मायावती सभी ने इन गिरफ्तारियों की निंदा की है और तत्काल रिहाई की मांग की है.
स्वयं बाबा साहेब आंबेडकर के बेटे और येल्गार परिषद के आयोजक प्रकाश आंबेडकर ने इस कहानी का प्रतिकार किया है कि उस आयोजन में माओवादी शामिल थे.उनका कहना है कि वह आयोजन तो संविधान बचाने और देश बचाने के लिए हुआ था और उसमें दलित स्वाभिमान की भावना थी.वह भावना लंबे समय से व्यक्त हो रही है इस बार भीमाकोरेगांव युध्द के दो सौ साल होने पर वह विशिष्ट हो गया था.
सोशल मीडिया गिरफ्तारी की कार्रवाई और साजिश की कहानी के विरोध में लिखी गई टिप्पणियों से पटा पड़ा है.कुछ दलित युवक इसे राम जन्मभूमि बनाम भीमाकोरगांव की लड़ाई बता रहे हैं.सुधा भारव्दाज की योग्यता और उनके संघर्ष व सामाजिक योगदान की चर्चाएं सुनकर तटस्थ और निष्पक्ष युवा भी नाराज हो रहे हैं.आनंद तेलतुम्बड़े की कारुण कथा सुनकर तो कोई भी आहत होगा.वे तकनीकी योग्यता के साथ मैनेजमेंट के प्रोफेसर हैं और आंबेडकर दर्शन के बेहद तेजस्वी अध्येता.आनंद तेल तुम्बड़े गिरफ्तार नहीं हुए हैं लेकिन गोवा इंस्टीट्यूट आफ मैनेजमेंट में उनके आवास पर जिस तरह उनके आवास को जबरदस्ती खंगाला गया उससे वे बेहद आहत हैं.वे पूछ रहे हैं कि इस व्यवस्था में पढ़ना लिखना क्या पाप है और हर पढ़ा लिखा व्यक्ति क्या नक्सलवादी कह कर अपमानित किया जाएगा.
पुलिस वरवर राव की बेटी केपवाना और उनके पति प्रोफेसर केसत्यनारायण के कंप्यूटर में संग्रहित साहित्य को न सिर्फ जब्त करके ले गई बल्कि उसने उनकी किताबों, उनके अध्ययन के विषय और रहन सहन को लेकर जो सवाल किए हैं उससे लगता है कि आने वाले दिनों में अब पीएचडी का साक्षात्कार थाने के इंस्पेक्टर लिया करेंगे और शास्त्रार्थ में संघ विचारक के अलावा पुलिस वाले बैठा करेंगे.
दरअसल पुलिस की यह कार्रवाई उल्टा चोर कोतवाल को डांटने वाले अंदाज की भी लगती है.क्योंकि शिकायत तो दलित कार्यकर्ताओं ने की थी कि उन पर भीमाकोरेगांव जाते समय एक जनवरी 2018 को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के लोगों ने पथराव किया और हमला किया.जबकि पहले भी इस तरह के आयोजन होते रहे हैं और आज तक ऐसा नहीं हुआ.उसमें शंभाजी भिड़े का नाम प्रमुखता से आ रहा था.बहुत दबाव के बाद पुलिस ने उन पर मुकदमा तो दर्ज किया लेकिन थाने बुलाकर जमानत दिला दी गई.इसकी प्रतिक्रिया में पुलिस पुणे, मुंबई, औरंगाबाद, नागपुर व वर्धा में दलित कार्यकर्ताओं को ढूंढ ढूढ कर गिरफ्तार कर रही थी.
वास्तव में यह पूरा मामला माओवादियों से ज्यादा दलित राष्ट्रीयता को हजम न कर पाने का है.दरअसल सरकार कहीं पर निगाहें और कहीं पर निशाना लगा रही है.संघ और भाजपा सरकार जानती है कि माओवादी कभी उसके लिए चुनावी खतरा नहीं बनने जा रहे हैं.लेकिन अगर संघ के हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्र के जवाब में देश में दलित राष्ट्रवाद उभरा तो आंबेडकर को प्रातः स्मरणीय बनाने की उसकी योजना धरी रह जाएगी और रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति बनाने का कोई लाभ नहीं होगा.जिस तरह से रोहित बेमुला की आत्महत्या, ऊना में दलितों की पिटाई और चंद्रशेखर रावण को गिरफ्तार करने और एससीएसटी कानून के नरम किए जाने के बाद दलित आक्रोश उभरा है वह कानून में संशोधन और तरक्की में आरक्षण से ही शांत नहीं होने वाला है.इस देश का दलित नया राष्ट्रीय आख्यान रच रहा है और वह हिंदुत्व से गंभीर रूप से असहमत है.इसलिए सरकार ने माओवादियों के बहाने दरअसल दलित आक्रामकता पर निशाना साधा है और एक प्रकार से उन गांधीवादियों, समाजवादियों और उदार लोगों को धमकाने का प्रयास किया है जो मौजूदा सरकार से असहमत हैं और जो येल्गार परिषद के साथ भीमाकोरेगांव के आयोजन में शामिल थे.न्यायमूर्ति पीवी सावंत, न्यायमूर्ति कोल्से पाटिल का माओवाद से क्या लेना देना लेकिन वे भी इस कार्यक्रम के आयोजक थे.इसी तरह भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश आरएम लोढ़ा ने गिरफ्तारी पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि गिरफ्तारी से लोकतंत्र की अवमानना होती है.
निश्चित तौर पर लोकतंत्र में हिंसा और विशेष कर माओवादी हिंसा का कोई स्थान नहीं है.महात्मा गांधी के देश में माओ कभी सफल नहीं हो सकते.लेकिन राज्य को भी हिंसा की योजना बनाने और उसके बहाने से लोगों का दमन करने का हक नहीं है.मार्क्स और माओ अमेरिका में बहुत पढ़े और पढ़ाए जाते हैं लेकिन उनका उद्देश्य उनका खंडन करना होता है.वहां नोम चोमस्की हैं जो सरकार की विदेश नीति से लेकर हर नीति की आलोचना करते हैं.उनसे पहले एडवर्ड सईद रहे हैं जो खुलकर फिलस्तीन के सवाल पर बोलते रहे हैं और इजराइल की निंदा करते रहे हैं.पर उससे अमेरिका कमजोर नहीं होता बल्कि उसका लोकतंत्र मजबूत होता है.शास्त्रार्थ और ज्ञान की लंबी परंपरा का देश भारत अगर विश्व गुरु बनने का सपना देख रहा है तो वह बौध्दिकों को महत्त्व देने से होगा न कि उनका दमन करने से.लेकिन लगता है कि हमारा लोकतांत्रिक आंदोलन आज असहमति व्यक्त करने के तरीके और जनमत निर्माण के लिए सत्य और अहिंसा के उस मार्ग को भूल गया है जिसे महात्मा गांधी ने अंग्रेजी साम्राज्य के विरुध्द अपनाया था.आज उनकी डेढ़ सौवीं जयंती पर उनसे बहुत कुछ सीखने की जरूरत है. 
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