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मायावती के फैसले से पस्त पड़ी भाजपा बमबम ! दशहरे के व्यंजन एक यात्रा खारपुनाथ की जीवन का हिस्सा भी है बांस
ऐसे थे राजनारायण

चंचल 

एक बहुचर्चित , बहुश्रुत और अतिविवादित सांसद हुए हैं राजनारायण . कुल डेढ़ चुनाव जीते हैं और तीन प्रधानमंत्रियों को गद्दी से धकेलने का रिकार्ड भी है . उनके नजदीकी लोग उन्हें नेता जी बोलते रहे हैं . राज्य सभा और लोक सभा मिला कर वो दिल्ली के स्थायी निवासी बन चुके थे , हारने के बाद भी किसी सहयोगी के सरकारी आवास पर उनका कब्जा ब हक कायम रहता . राजनारायण जी राज्यसभा में थे . 73/ 74 का वाकया है काशी विश्व विद्यालय छात्र संघ चुनाव में भाई मोहनप्रकाश अध्यक्ष और अंजना प्रकाश जी उपाध्यक्ष चुनी गई थी लेकिन कुलपति डॉ श्रीमाली शपथ नही दिला रहे थे . तय हुआ कि एक डेलिगेशन शिक्षा मंत्री से मिलने दिल्ली जाय . उस डेलिगेशन में जो लोग जा रहे थे उनका नाम सुन लीजिए यह नाम विशेष कर उनको सुना रहा हूँ जो उसकाल में विश्वविद्यालय को देखे होंगे या वहां के छात्र रहे होंगे . मोहन प्रकाश , अंजना प्रकाश , रामवचन पांडे , दीन दयाल सिंह , शतरुद्र प्रकाश और यह खादिम . संतों का सडसा नेता जी के घर गिरा . शुक्र है उस समय वे थे नही . उनके सचिव के कुमार को इस तरह का पहुचना अखरा तो लेकिन मजबूरी थी ,मामला बनारस का था . उनदिनों भाई विनय कुमार वहीं एक कमरे को कब्जे में लिया हुआ था . बहरहाल हर एक नए पहले अपने सोने का बंदोबस्त किया . दरवाजे और खिड़की से पर्दे उतारे गए . नेता जी के खुद के विस्तर पर पड़ी रजाई को रामवचन पांडे ने कब्जा किया . के कुमार ने एतराज दाखिल किया
- नेता जी क्या ओढ़ेंगे ? 
- उस पर एक कंबल भी है 
- कम्बल से हो जाएगा ? 
- नेता जी ऊंट है क्या ? ठंढा रो अपना काम देखो . 
इतने में नेता जी आये . पहले तो अपने आवास का निरीक्षण किया - हम गलत जगह तो नही आये ? बहरहाल नेता जी कम नही थे , समझ तो गए लेकिन एक एक कर सबको बकुली से खोदते रहे 
- तुम कौन तुम कौन करते रहे और एक एक कार सब उठते रहे क्यों कि उसमे से अभी कोई सोया ही नही था . आखीर में उनकी निगाह अपनी रजाई पर गयी वहां रामवचन पांडे मिले . नेता जी कार्पेट पर बैठ गए . और जोर से चीखे 
बहरहाल नेता जी यानी राजनारायण जी की एक खूबी अलग की रही, कि वे अपने कार्यकर्ताओं से कभी दूरी बना कर नही चले , बिल्कुल बगल चलो ,साथ साथ चलो अगर कोई थोड़ा संकोच करता तो, नेता जी तुरत घुडकते - संघी हो का जी ?मतलब खुलो . 
तो उस दिन कथा यूँ चली . पता चला कि नेता जी के दरवाजे , खिड़की आलीन कालीन अरदा परदा सब इन आगंतुकों के कब्जे में है . तो इसे देख कर नेता जी उखड़े ( यह उनकी आदत रही ) 
- निहायत उजबक हो , तमीज नही ?किसके घर जा रहे है ? यह धर्मशाला है ? इस समय नेता की बकुली जिसके सहारे वे चलते थे उसका एक शिरा रामवचन पांडे जी के मुह के पास सटटा जा रहा था . 
पांडे जी संजीदा हुए और जवाब दे रहे हैं - दिल्ली में जो सांसद बनके आते हैं अपने घर से बंगला , पर्दा , फर्नीचर लेकर आते हैं . नेता जी फिर उखड़े - यह है बात करने की तमीज ? किसी भले आदमी से बात करने की तमीज ? 
पांडे जी ने फिर जवाब दिया - और यह किसी भले आदमी का व्यवहार है , ? कि न कोई हाल न चाल बस डंडा मुह में घुसेड़े जा रहे हैं , यह भले आदमी का काम है ? वो भी जिसे हमने अपने कंधे पर बैठ कर यहां तक पहुंचाया.- तुम्हारे कंधे पर ? 
- नही , बिड़ला के कंधे पर ! 
लोग हंस  दिए उसमे नेता जी भी शामिल . अब बताओ कैसे चले ?  ये मोहन प्रकाश हैं , ये है अंजना जी . दोनो लोग छात्र संघ चुनाव जीत कर आ रहे हैं , ये नही कि आशीर्वाद ढें मिठाई खिलाएं , बस आते ही आते चढ़ गए .  तो ऐसे बोलो न , और जोर से आवाज दिए . के कुमार , के कुमार . जब कोई उत्तर नही मिला तो के कुमार के असल नाम पर आ गए - खेलू ! खेलुआ !! .खेलू बाहर निकले - क्या हल्ला मचाये हैं , चाय बना रहा हूँ . 
- चाय बाद में पहले दौड़ कर लड्डू लाओ और सब की तरह देखने लगे अचानक दीन दयाल सिंह पर जा कर रुक गए . ( दीन दयाल जी एक आंख से गायब थे , यही उनकी पहचान थी ) - तुम क्या जीत कर आये हो ? दीन दयाल ने दूसरी तरफ गर्दन घुमा कर कहा - उपर हाउस , अपर हाउस ज्जि , वहीं से आता हूँ ' . यह कटाक्ष नेता जी पर था . नेता जी भी अपर हाउस से थे . लोग हँस दिए . नेता जी ने दीन दयाल के लिए एक बनारसी शब्द लुढ़का के उठ खड़े हुए , नेता जी को मालूम था यह पांडे से भी दो हाथ आगे है . इतने में के कुमार लड्डू का डिब्बा लेकर आ गए . नेता जी ने डिब्बा ले लिया - लाओ , हम बांटते हैं . और एक लड्डू खुद अपने लिए लेकर बाकी पांडे जी की तरफ बढ़ा दिए . इस लड्डू पर नेता जी और के कुमार के बीच फौजदारी होते होते बची . के कुमार अड़ा रहा कि इन्हें देखिए , डॉक्टर ने मना किया है ये सुगर के मरीज हैं और किसी न किसी बहानेमिठाई खाएंगे जरूर . नेता जी का तर्क रहा - चुतिया हो का बे ! यह मिठाई थोड़े ही यह तो लड्डू है . और चना से बना है . बहर हाल तीन दिन का वह प्रवास आज के हालात पर जूता मारता दिखता हैं , जब जब वो बाते जेहन में उभरती हैं . यह कथा सुनाने का मकसद महज इतना भर रहा कि हम अब दूसरी तमीज में आकर खड़े हो गए हैं जहां आप अपने नेता के सामने सवाल जवाब तो छोड़ दीजिए घुटना छोड़ कर किसी अन्य तरीकेसे नमस्कार भी किये तो बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा . 
और यह आपके उस सवाल का जवाब भी है , जब आप की जिज्ञासा होती है कि कल तक आप इतने चमकदार नेता थे ,आज बुझ क्यों गए ? समाजवादी आंदोलन ने जिस तमीज में समाजवादियों को ढाल दिया है ये इस तमीज में मिसफिट हैं .
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  • सावधान ,एलआईसी भी डूब रही है
  • एक यात्रा खारपुनाथ की
  • जीवन का हिस्सा भी है बांस
  • मायावती के फैसले से पस्त पड़ी भाजपा बमबम !
  • जरा अंबानी की इस कंपनी पर भी नजर डालें
  • जोगी कमजोर पड़े ,भाजपा की नींद उड़ी
  • भाजपा को अब शिवपाल का सहारा !
  • पीएम के लिए मायावती का समर्थन करेगी सपा !
  • पप्पू यादव को पीट कर मंडल दौर का बदला लिया
  • पांचवी अनुसूची का मुद्दा बना गले की फांस!
  • सवर्ण विद्रोह से हिल गई मोदी सरकार !
  • ओपी के सिर पर भाजपा की टोपी
  • माओवाद नहीं ,खतरा तो दलित एकजुटता है
  • संसदीय समिति को ऐसे पलीता लगाया
  • वे राजा भी थे तो फकीर भी !
  • वे एक अटल थे
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