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फिर गाली और गोली के निशाने पर कश्मीर

अरुण कुमार त्रिपाठी

नई दिल्ली .प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने व्याख्यानों में कहते थे कि कश्मीर को गाली और गोली से नहीं प्यार की मीठी बोली से जीता जाएगा. हालांकि इस बीच सैनिक कार्रवाइयां चालू थीं और रमजान के महीने में जो युध्दविराम घोषित किया गया वह विफल रहा. उसके बाद भाजपा ने महबूबा सरकार से समर्थन वापस लेकर पीडीपी को जरूर चौंकाया लेकिन देश और दुनिया के सामने यह संदेश दे दिया कि भारत सरकार कश्मीर में किसी तरह की ढिलाई नहीं करने जा रही है. अब वह सिर्फ कड़ाई और कड़ाई करेगी. देश और दुनिया तो भारतीय जनता पार्टी की नीति से पहले से परिचित थी लेकिन अगर तीन साल तक नरेंद्र मोदी ने पीडीपी जैसी विपरीत ध्रुव की पार्टी से मिलकर सरकार चलाई तो यह सदाशयता सिर्फ भाजपा की ही नहीं इस लोकतंत्र की भी थी. 
भारतीय लोकतंत्र यह अवसर देता है कि कट्टर से कट्टर विचार वाली ताकतें अपने को उदार बनाएं और अमन और मेल मिलाप की एक असंभव संभावना पैदा करें. संभव है कि प्रधानमंत्री मोदी भी इस तालमेल के पीछे रहे हों. लेकिन अब जो स्थिति उभर कर आ रही है उसका यही मतलब है कि कश्मीर के बहाने राष्ट्रवाद, आतंकवाद और पाकिस्तान का मुद्दा उठाकर मौजूदा सरकार 2019 के चुनाव में उतरना चाहती है और कश्मीर नीति की भयानक विफलता को आम चुनाव की सफलता में परिवर्तित करना चाहती है. 
दरअसल भारतीय लोकतंत्र के ढांचे में देश की एकता और अखंडता बनाए रखने के लिए राष्ट्रपति और राज्यपाल शासन नाम की एक तानाशाही व्यवस्था है. केंद्र सरकार कश्मीर में उसका आठवीं बार प्रयोग कर रही है. लेकिन भाजपा जैसे दल के साथ तानाशाही और सैन्यवाद केंद्रीय विचारधारा के तत्व के रूप में जुड़े हैं. वह लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हिस्सा लेकर भी उससे मुक्त नहीं हो पाई है. उसकी प्रतिध्वनि उन टिप्पणीकारों के लेखों में सुनाई पड़ती है जो कहते हैं कि कश्मीर में बात और लात दोनों चलना चाहिए. या उन लोगों के वक्तव्यों में देखा जाना चाहिए जो कहते हैं कि याचना नहीं अब रण होगा. यह उन लोगों की बातों में भी प्रकट होती है जो चौबीस घंटे गली मोहल्लों में तर्क देते रहते हैं कि गांधी और नेहरू ने मिलकर देश को तबाह कर दिया. अगर पटेल प्रधानमंत्री बने होते तो कश्मीर की समस्या होती ही ना.
भाजपा की यह विचारधारा उन चैनलों पर भी परिलक्षित होती है जो दिन रात कश्मीर के भटके और उग्र युवाओं को दुश्मन की तरह पेश करते हैं और हर समय सेना के जवानों और अधिकारियों को शहीद का दर्जा देते रहते हैं. चैनलों की यह मानसिकता हिंदी भाषी लोगों को तो विशेष तौर पर आकर्षित करती है और उसी के माध्यम से चुनावों के जनमत का निर्माण होता है. स्पष्ट तौर पर यह देश की एकता और अखंडता से ज्यादा अगले चुनाव में विजय हासिल करने का मसला है. यही वजह है कि महबूबा मुफ्ती को इस्तीफा देने के बाद कहना पड़ा कि सरकार कश्मीर से दुश्मन की जमीन जैसा वर्ताव न करे. 
भाजपा के कट्टर समर्थकों के लिए देश को चलाने के लिए दो संगठनों की प्रमुख भूमिका होनी चाहिए. एक राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और दूसरी सेना. वे चाहते हैं कि लोकतंत्र और समाज दूसरी संस्थाएं इनके आगे नतमस्तक रहें. इसीलिए यह तर्क तेजी से फैलाया जा रहा है कि अगर संघ न हो हिंदू समाज और भारतीय राष्ट्र की भावना मर जाएगी और अगर सेना न हो इस देश के नागरिकों का जीवन मुश्किल है. यही कारण है कि कश्मीर का समाधान बातचीत और वैकल्पिक योजनाओं की बजाय सेना और संघ के माध्यम से ही करने का प्रयास किया जा रहा था और आखिरकार राज्य फिर सेना के हाथों में है. इस विचार की सीमाएं यूरोप में तो प्रकट हो गई हैं लेकिन भारत जैसे एशियाई देश में उसे उघाड़ होने समय लगेगा.
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