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चिनार! तौबा..यह आग !

अग्निशेखर

"चिनार ...!.. चि..नाऽ...र..!माशाऽअल्ला , यह आग...!कभी सैंकडों वर्ष पहले मध्य एशिया से आए जिस भी यात्री या शासक ने कश्मीर घाटी में कदम रखते ही छायादार बून्य के पेड़ को देखकर यह शब्द कहे होंगे,तब ज़रूर पतझड़ का मौसम रहा होगा और आग की संयत, कभी कभी झूमती, वृक्षाकार विराट लपट सी दिखती बून्य के अनिर्वचनीय सौंदर्य ने उसके होश उड़ा दिए होंगे .पतझड़ में बून्य के बड़े बड़े सघन पत्ते देखते ही बनते हैं. परस्पर बतियाते पत्ते. मंद मंद मुस्कुराते पत्ते. विशाल तने के दस-बारह फीट ऊपर उसकी चारों ओर बाहर को निकली गोल मुलायम डंगालों को छोड़कर पूरे वृक्ष की कद काठी आग की विशालकाय गोलाकार लपट में बदल जाती है.
 
"अब कल्पना करें जिस किसी ने सेंट्रल एशिया से आकर इसे पहली नज़र में देखा होगा, उसके मुंह से फारसी में ये शब्द निकले होंगे... चिनार! तौबा..यह आग !" वरिष्ठ कश्मीरी कवि प्रो.रहमान राही ने एकबार मुझसे अक्तूबर 1987 में श्रीनगर के चश्माशाही में जम्मू -कश्मीर राज्य अकादमी द्वारा आयोजित सात दिवसीय लेखक-शिविर में मेरे साथ एक लंबी भेंटवार्ता के दौरान कहा था.टूरिस्ट हट के बाहर गुनगुनी धूप में मखमली घास पर कुर्सियों में बैठे दो तीन वरिष्ठों में से बुज़ुर्ग कश्मीरी कवि गुलाम रसूल नाज़की साहब ने हस्तक्षेप किया था," कहा तो यह भी जाता है कि इसे मुगल बादशाह जहाँगीर कश्मीर ले आए थे..कि.. जहाँगीर ने यह सौगात दी है कश्मीर को...आपका क्या खयाल है ?"
 
"दिलचस्प सवाल है.." प्रसिद्ध चित्रकार और कवि गुलाम रसूल संतोष ने नाज़की साहब के प्रश्न का समर्थन किया था.मुझे याद आया कल रात देर तक राही साहब और नाज़की साहब दोनों ने गुलाम रसूल संतोष को उनके शैव विचारों से प्रेरित उनकी तांत्रिक चित्रकारिता पर उन्हें घेरने की खूब मित्रवत् कोशिशें की थीं . एक से बढ़कर एक व्यंगबाण चले थे.यह मुझे इसी शिविर के दौरान पता चला था कि नाज़की साहब और राही साहब संतोष को उनकी पीठ पीछे उन्हें 'रामजू' कहकर चिढ़नाम से पुकारते थे.गुलाम रसूल संतोष को उनकी शैव और शाक्त विमर्श की ओर उनकी गंभीर दिलचस्पी तथा उनके अध्ययन के प्रति यह उनके सहधर्मी समकालीनों की मित्रवत् प्रतिक्रिया जैसी थी.मैंने देखा, इस समय प्रो. रहमान राही घिर रहे थे.राही साहब ने चालाकी से प्रश्न पलटकर संतोष की ओर मोड़ दिया," तुम्हारा क्या कहना है ?"
 
"सवाल आपसे पूछा गया है.." नाज़की साहब ने राही साहब से कहा.इससे पहले कि वह कुछ बोलते उन्होंने मेरी तरफ देखा.मैं इन वरिष्ठों की बातों को डायरी में नोट किए जा रहा था."तुम क्या लिख रहे हो भाई ? तुम भी कुछ सुनाओ..तुम क्या सोचते हो इसके मुतलिख ... " बुज़ुर्ग नाज़की साहब ने वात्सल्य भाव से मुझसे कहा.शायद जान गये थे कि राही साहब कुछ कमिट नहीं करेंग .मैंने छूटते ही उत्साहित होकर कहा, " मुझे नहीं लगता कि जहाँगीर इसे कश्मीर ले आया है.वह तो 17वीं शताब्दी की बात है. क्या चौदहवीं शताब्दी में लल्द्यद ने अपने एक वाख में बून्य का प्रयोग किया है.... ?"
 
सहसा गुलाम रसूल संतोष लल्द्यद का वो वाख विशेष बुदबुदाने लगे थे :
 
"अड्यन रेन्य छै 
शिहिज बून्यी,
नेरव न्यबर न्यबर तॅ
शुहुला करव.
अड्यन रेन्य छै
बरॅ तलॅ हूनी,
नेरव नेबर तय्
ज़ंग खेयव ..
 
... कइयों की पत्नियां (धूप में) शीतल छाया देने वाली बून्य (चिनार) जैसी होती हैं और कइयों की पत्नियां दरवाज़े पर बैठी कुत्तिया जैसी होती है .
बात फिर शेख़ मुहम्मद अब्दुल्ला की आत्मकथा 'आतिशे चिनार ' की तरफ घूमी थी.
 
सब दबे दबे स्वर में एक दूसरी को यह जतलाना चाह रहे थे कि उन्हें मालूम है कि शेख़ साहब की आत्मकथा दरअसल उनके मित्र और कश्मीरी समालोचक और उन दिनों राज्य अकादमी के सचिव मुहम्मद यूसुफ टेंग ने ही लिखी है.
 
" पोज़ छुय वनान यि.." मेरी बात का अनुमोदन करते हुए नाज़की साहब ने फिर राही साहब की ओर प्रश्न दागा," यह सच कह रहा है..इसीलिए कहावत है न 'बोनि मुहुल तारुन'..न कि 'चिनारस मुहुल तारुन' " अर्थात् कठिन और दुष्कर कार्य को करने पर उसे बून्य के तने में मूसल पार घुसेडने जैसी बात कही जाती है न कि चिनार (के तने )में मूसल घुसेडना कहते हैं .
 
"हाँ ..हाँ, बून्य (स्त्रीलिंग वाची) में ही मूसल घुसेड़ने की बात कही जाती है,यह भी को समझाने वाली बात है ...." नाज़की साहब अभी कह ही रहे थे कि सहसा वहाँ तीनों बुड्डों की दमित हँसी फूटी .समझ तो अन्योक्ति को मैं भी गया था,पर उनकी हँसी में शामिल न हो पाया .झेंप गया था.
 
वास्तव में बून्य पेड़ की कुछ कश्मीरी लोकोक्तियों और मुहावरों में भी भागीदारी पायी जाती है. दुष्कर से दुष्करतम काम के लिए 'मुहलिस बून्य तारिन्य' कहा जाता है.
 
कश्मीरी भाषा में चिनार वृक्ष को 'बून्य' कहते हैं. 
यह मूल संस्कृत नाम का अपभ्रंश है. भुवन-व्यापिनी धातु वाला यह शब्द 'बून्य्' वास्तव में भवानी वृक्ष बताया जाता है. एक पूरे भुवन को अपनी शीतल छाँव के आँचल में समेटने वाली माँ.तपेदिक के रोगियों को अपनी स्वास्थ्य वर्धक जीवनदायिनी हवा से ठीक करने देने वाली माँ !
 
प्रायः एक बून्य वृक्ष तीन-चार सौ वर्ष ,कभी ज्यादा भी, तक जीता है.लोग कश्मीर में व्येजब्रोर ,अनंतनाग की राष्ट्रीय राजमार्ग पर एक बड़ी पार्क,जिसे दाराशिकोह पार्क के नाम से भी जाना जाता है, में एक उम्रदराज़ बून्य को आयु में सबसे बड़ी बून्य मानते हैं . 
इसी तरह यारीपोरा,कुलगाम के निकटवर्ती गाँव फ्रिसल में भी एक देवस्थान की विशाल बून्य को सैंकडों बरस पुरानी सबसे बड़ी बून्य के रूप में लोक मान्यता है .
 
मैंने यह दोनों विशाल तने वाले बून्य वृक्ष देखे हैं .दोनों स्थानों पर ये बून्य के पेड़ अभिभूत करते हैं . यों भी छायादार बून्य के विशाल पेड़ों की झलक ही रोमांच पैदा करती हैं . उसमें प्रकृति का अध्यात्म दिखता है.उसका लोकोत्तर वात्सल्य लुभाता है.बून्य की मृदु और सुकोमल टहनियों और शर्मीले कौमार्य से दिलहरण पत्तों की सघनता से उसकी समूची गरिमामय देहयष्टि उसे विमुग्धकारी बनाती है.
 
कालिदास ने 'अभिज्ञान शाकुंतलम्' में शकुंतला के सौंदर्य के बारे में ' स्त्रीरत्न सृष्टिपरा प्रतिभति सा मे' इन शब्दों में शकुंतला को स्त्री विषयक सौंदर्य की प्रथम सृष्टि कहा.मुझे लगता है कालिदास का यह कथन बून्य वृक्ष पर भी लागू किया जा सकता है.बून्य भी वृक्ष विषयक सौंदर्य की प्रथम सृष्टि है.
 
यहाँ प्रसंगवश शादीपुर के प्रयाग तीर्थ की बून्य के बारे में बताता चलूँ कि सिन्धु नदी और वितस्ता के संगम पर एक छोटे से टापू पर सैंकडों वर्ष पुरानी बून्य ने एक लोकप्रिय मुहावरे का रूप लिया है.ऐसा कोई अत्यंत 
वयोवृद्ध व्यक्ति जिसे देखकर या जिसके अभी भी जीवित होने की खबर सुनकर हैरानी हो तो उसे 'प्रयागिच बून्य' यानी प्रयाग की बून्य कहते हैं जो अजर और अमर समझी जाती है.
 
यहाँ कश्मीर के प्रयाग के संदर्भ में मुझे बाबा नागार्जुन याद हो आए. सन् 1982 में कश्मीर प्रवास के दौरान वह क्षमा कौल के घर महीना भर ठहरे थे.एक दिन क्षमा की छोटी बहन गुड्डी जिसका नाम उन्होंने बदलकर हिमा रख दिया था, बाबा को घुमाने प्रयाग ले गयी थी.बाबा प्रयाग तीर्थ के परिसर में सघन और विशाल चिनारों को देखकर दंग रह गये थे. नागार्जुन को नौका में बिठाकर हिमा संगम स्थल पर सदियों से खड़ी प्रयाग की प्रसिद्ध बून्य को निकट से देखने भी ले गयी थी.
बाबा अभिभूत थे.
सहसा नदी पार कुछ बड़े बड़े बून्य वृक्षों की ओर संकेत करके हिमा से पूछ बैठे, ''इन चिनार पेड़ों की आयु क्या होगी हिमा ?"
"बाबा,ये कोई डेढ़ दो सौ बरस के बच्चे चिनार हैं " हिमा ने बाबा नागार्जुन को जानकारी दी जो उनके लिए आश्चर्यजनक थी.
 
" हिमा,ये चिनार वृक्ष के बच्चे मुझसे इतने बड़े हैं, मैं इन्हें आशीर्वाद भी नहीं दे सकता." बाबा नागार्जुन ने अजब बेबसी दिखाई थी.
 
बाबा नागार्जुन ने इसी कश्मीर प्रवास के दौरान चिनार श्रृंखला कविताएँ रची थीं जिनमें 'बच्चा चिनार' भी थी.उन्होंने इस दौरान संस्कृत में भी कई कविताएँ रची थीं .
 
क्षमा बताती हैं कि बाबा के साथ पत्राचार में कश्मीर आकर उनके घर ठहरने की नागार्जुन ने जो तीन शर्तें रखी थीं उनमें वितस्ता की आचमन करने ,कवि दीनानाथ नादिम से मिलने और चिनार का पत्ता चूमने की भी एक अनोखी शर्त थी.
इसपर मैंने कश्मीर में नागार्जुन विषय पर एक कविता भी लिखी थी.
कश्मीरी जन-मानस चिनार को अपने मूल नाम स्त्रीलिंगवाची नाम बून्य् से ही संबोधित करता है .कश्मीरी समाज जीवन में 'बून्य' की मान्यता एक माँ के रूप में है.
 
यह उनके कई सामाजिक ,सांस्कृतिक और धार्मिक क्रिया -कलापों का किसी न किसी रूप में हिस्सादारी करती है.
 
मेरे बचपन तक कश्मीरी स्त्रियों के नाम भी 'बून्य' द्योतक होते थे,जैसे 'बून्यद्यद'( दादी बून्य/ चिनार ),'बोन्यमाल'( बून्यमाला/ चिनार माला )आदि.यह तो आम कश्मीरियों का पेड़ -पौधों और फूलों से पारंपरिक अनन्य प्रेम ही रहा है कि कश्मीरी मुसलमान स्त्रियों के नाम कुछ इस तरह होते थे- संगॅर (पहाडी), ज़ून द्यद ( दादी ज्योत्सना),कअतिज द्यद (दादी कोयल) और कश्मीरी बटनियों(भट्टिनियों/ पंडितानियों) के नाम यंबरज्वली ( इरा पुष्प /नरगिस),कुंगी (केसर पुष्पा),पोषकुज (पुष्प लता),पूषी (पुष्पी),संगॅर (पहाड़ी ) हारमाली (पुष्प हार),हीमाल (जूही की माला,कश्मीरी लोककथा की नायिका भी )आदि होना कभी आम चलन था.
 
इस पृष्ठभूमि में स्त्रियों के नाम बून्य संबंधी होना कश्मीरियों के चिनार प्रेम का ही द्योतक है.
 
इतना ही नहीं बून्य वृक्ष आँगन में होने से जिस घर की यह पहले पहचान बनी ,फिर उसी घर के लोगों की चिढ़ या छेड़(निकनेम) बनी.आज बूनी एक सरनेम है उस परिवार के सदस्यों की.
 
जिन लोगों ने कश्मीर में डल झील देखी होगी, वे नौका में बैठकर अवश्य इस झील के बीच स्थित टापू पर गये ही होंगे जो 'चार चिनार' के नाम से जाना जाता है. कभी कश्मीर विश्वविद्यालय में आयोजित साहित्य अकादमी के एक लेखक सम्मेलन में आई स्व. मंजुल भगत ने मुझसे पूछा था,''अग्निशेखर,तुम एक कवि के रूप में 'चार-चिनार' को कैसे देखते हो ?"
मैंने मंजुल भगत को बताया था," डल झील की गोद में ये चार चिनार चार प्रसिद्ध कश्मीरी कवयित्रियाँ हैं .."
मंजुल भगत लगभग चौंक सी गयी थीं," अरे वाह ! कौन कौन ...?"
"लल्द्यद ,रूपभवानी,हब्बा खातून और चौथी अरनिमाल..!"
" अद्भुत! " वह अभिभूत थीं मेरी बात सुनकर .
"मेरा बस चलता ,मैं वहाँ प्रत्येक चिनार का नाम इन पर रखता..संक्षिप्त परिचय के साथ एक एक नाम पट्टी भी होती.." 
मुझे याद है कि मंजुल भगत ने पूछा था ," चिनार कश्मीरी लोक काव्य में भी आया होगा.."
मुझे तत्काल तो कोई काव्यांश याद नहीं आया था.हाँ,सन् 1948 में प्रकाशित देवेन्द्र सत्यार्थी की पुस्तक 'बेला फूले आधी रात' मैंने चिनार कोई लेकर एक लोकगीत का अंश पढ़ रखा था जो याद करने पर भी उस समय कौंध नहीं रहा था.
मैंने घर जाकर देवेन्द्र सत्यार्थी की पुस्तक से कागज़ पर प्रेम के चिन्ह स्वरूप चिनार के पत्ते से संबंधित कश्मीरी लोकगीत के उक्त अंश को लिखा. दूसरे दिन मंजुल भगत को युनिवर्सिटी जाकर सुनाया :
 
"यारॅ सुंद सूज़मुत बोनि पन्नों मदनो
लगयो पाऽर्य हा मदनो.
हुसनुक शाहज़ादॅ बोनि पन मदनो
लगयो पाऽर्य हाल मदनो."
 
अर्थात् रे,मेरे प्रेमी के भेजे हुए चिनार पत्र ! रे,कामदेव !मैं तुम पर वारि जाऊँ .
 
चिनार के पत्ते की तुलना मदन से किये जाने की पृष्ठभूमि मैं मैंने प्रसंगवश मंजुल भगत को यह भी बताया था कि कश्मीरी लोल- कविता (प्रेम काव्य ) में प्रियतम के लिए मदन शब्द खूब प्रयोग में लाया जाता है. यहाँ प्राचीन काल में मदन त्रयोदशी मनाने की परंपरा रही है.यहाँ तक कि कहते हैं कभी प्राचीन काल में महाराजा प्रवरसेन ने मदन के निकेतन का निर्माण किया था जिसे आज हम मूल संस्कृत नाम शालीमार (बाग) के नाम से जानते है
 
मंजुल भगत निःशब्द थीं ,"मैं आज दोपहर बाद तूम्हारी चार कवयित्री चिनारों से मिलने जा रही हूँ."
 
यह मंजुल भगत से मेरी पिछले दो दिनों के दौरान दूसरी मुलाकात थी जो फिर अंतिम साबित हुई.
 
'चार-चिनार' एक पर्यटन स्थल है लेकिन कवियों के लिए अलंकारिक महत्त्व रखता है.एक लोकप्रिय कश्मीरी लीला काव्य-रचना में डल झील के एक तट पर हारी पर्वत स्थित श्रीनगर की अधिष्ठात्री देवी शारिका की स्तुति में लीला-कवि लिखता है :
''छिय चार चिनार
पादन तलय्.
वलय् माऽजै यूर्य .."
अर्थात् हे माँ, तेरे चरणों में यानी डल झील में चार चिनार शोभायमान हैं . कृपया मेरे यहाँ आओ हे माँ !
 
रीगलचौक, श्रीनगर में काॅफी हाॅउस के सामने उदासीन सम्प्रदाय के एक मंदिर परिसर का नाम 'श्रीचंद चिनार' है.यह स्थान गुरूनानक देव के सुपुत्र और उदासीन सम्प्रदाय के संस्थापक श्रीचंद द्वारा लगाए चिनार के बूटे के कारण आज 'श्रीचंद चिनार ' कहलाता है.
 
किंवदंती है कि श्रीनगर स्थित वर्तमान जगह पर एकबार धूनी रमाए बैठे श्रीचंद महाराज से तत्कालीन किसी मुस्लिम शासक ने कोई चमत्कार दिखाने का बहुत आग्रह किया .कहते हैं श्रीचंद महाराज ने धूनी की राख में बून्य की एक अधजली टहनी उल्टी रोप दी थी जो कुछ दिनों में अंकुरित हुई और कालांतर में 'श्रीचंद चिनार' कहलाई.
 
इसी तरह कश्मीर घाटी में अलग अलग जगहों पर देवी देवताओं, अनेक कश्मीरी संतों, पीरों -फकीरों से संबंद्ध बून्य के पेड़ हैं .जैसे मनिगाम (नुनर) में संत कश्काक की बून्य,सफापोर और चश्मा साहिबी तथा मनिगाम में संत कवयित्री रूपभावानी की बून्य ,सोपोर में वितस्ता किनारे संत ऋषिपीर की बून्य,सुंबल ,सीर जागीर सोपोर और गोशबुग में नन्दिकेश्वर भैरव की बून्य, कैयमू (अनंतनाग ) में नुंदऋषि उर्फ शेख़ नूरूद्दीन वली की बून्य आदि. अनंतनाग -श्रीनगर के राष्ट्रीय राजमार्ग पर संगम के पास एक बस स्टाॅप का नाम 'रमज़ान मामिन्य बून्य' ( रमज़ान मामा की बून्य) सन् 1990 तक हुआ कतरा था. यानी वो बून्य जिसके नीचे कभी कोई रमज़ान मामा बैठता होगा. इस रूट पर चलने वाली सरकारी बसों के ड्राइवर यहाँ नियमित रूप से वाहन रोकते और सवारियाँ चढ़ाते.
 
इसी तरह अनेक जगहों पर कश्मीर घाटी में हमें 'बोनि-बाग और 'चिनार -बाग' मिलते हैं . एकाध नयी बस्तियों के 'चिनार काॅलोनी' नाम भी रखे मिलते हैं .
श्रीनगर के हज़ार साल से अधिक पुराने पाँद्रेठन मंदिर के परिसर में एक बड़ी बून्य हैं जहाँ मैं अक्सर जाया करता था और अपने मित्रों को भी ले जाता था. कविमित्र अरुण कमल और प्रयाग शुक्ल को भी मैं वहाँ ले गया हूँ .प्रयाग जी उस बून्य के नीचे बैठ कर दत्तजित्त हो पाँद्रेठन मंदिर को देख रहे थे.सहसा उन्होंने अपने झोले से अपनी 'सामग्री' (विह्सकी की बोतल) निकल ली और दो एक ढक्कन पी लिए.इसी तरह अरुण कमल भी इस परिसर की बून्य देखकर अवाक् रह ये थे.
 
इतिहास् में जाएं तो कश्मीर के बागों की प्रसिद्धि दूर दूर तक फैली हुई थी .कभी दुर्भिक्ष के कारण सन् 1832 में पुंछ से लाहौर लौटे महाराजा रणजीत ने कश्मीर में अपने गवर्नर कर्नल मियाँसिंह को पत्र लिखा -"काश कि मैं अपने जीवन में एकबार ही कश्मीर के बागों की, जो बादाम के फूलों से महके हुए हैं ,सैर कर सकता तथा हर ओर हरी भरी मखमली घास पर बैठने का आनंद ले सकता "
 
क्या कश्मीर के इन बागों की कल्पना गरिमामयी बून्य पेड़ों के बिना की जा सकती है .साभार 
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