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झरनों के एक गांव में
अंबरीश कुमार 
उत्तर काशी में रात बिताने के बाद सुबह करीब नौ बजे हर्षिल के लिए निकले . अब वाहन  बदल चुका था मारुती की जगह अम्बेसडर और रफ़्तार भी ज्यादा नहीं . मारुती वैन की जगह अम्बेसडर लेने की ख़ास वजह थी .टिहरी से जब निकले तो मुसलाधार बरसात हो रही थी .रास्ता गंगा के ठीक ऊपर चल रहा था .तब टिहरी शहर आबाद था और टिहरी के आगे का भूगोल भी नहीं बदला था .मारुती वैन का ड्राइवर आगाह करने के बावजूद तेज रफ़्तार से ही गाडी चला रहा था .एक मोड़ पर अचानक सामने से एक मोटर साइकिल आ गई .ड्राइवर ने पूरी ताकत से ब्रेक लगाया जिससे गाड़ी एक सौ अस्सी डिग्री घूम कर सड़क के किनारे तक आ गई .एक फुट की जगह बची थी वर्ना हम सब गंगा में समां ही जाते .ड्राइवर पर बहुत गुस्सा आया .उत्तरकाशी पहुंचते ही पहला काम यह किया कि टैक्सी मालिक को फोन कर अम्बेसडर भेजने को कहा .रात में उत्तरकाशी में गंगा के किनारे रुके .करीब ढाई दशक पहले उत्तरकाशी का नजारा भी अलग था .गंगा का पानी और उसकी रफ़्तार दोनों देखने वाली थी .दुसरे दिन सुबह ही सविता एक स्थानीय मंदिर गई फिर आगे की यात्रा शुरू हुई .
        उत्तर काशी से आगे चढ़ाई बढ़ती जाती है और पहाड़ नंगे होते नजर आते है . रास्ता भी बहुत संकरा और नीचे खाई की तरफ देखते ही डर लगता है . रास्ते  में पड़े एक मंदिर में गर्म पानी के श्रोत से हाथ मुंह धोया और बाहर बैठकर चाय पी . आगे बढे सुखी टाप से आगे बढ़ते ही बर्फ से सामना हुआ पहले सड़क के किनारे किनारे फिर बीच बीच में भी . बर्फ गिराने के बाद अगर ओस पड़ जाए तो यह बर्फ काफी कड़ी हो जाती है और उसपर वाहन फिसलने लगता है . दोपहर में गंगोत्री के मुख्य रास्ते से बाई और मुड़े तो सामने जो गाँव था उसका नाम 'हर्षिल ' था . इसे देखते ही मुंह से निकला अद्भुत . वाकई गजब का नजारा था . इसका परिचय जो मिला उसमे कहा गया है - यह हिमाचल प्रदेश के बस्पा घाटी के ऊपर स्थित एक बड़े पर्वत की छाया में, भागीरथी नदी के किनारे, जलनधारी गढ़ के संगम पर एक घाटी में है. बस्पा घाटी से हर्षिल लमखागा दर्रे जैसे कई रास्तों से जुड़ा है. मातृ एवं कैलाश पर्वत के अलावा उसकी दाहिनी तरफ श्रीकंठ चोटी है, जिसके पीछे केदारनाथ तथा सबसे पीछे बदंरपूंछ आता है. यह वन्य बस्ती अपने प्राकृतिक सौंदर्य के साथ मीठे सेब के लिये मशहूर है. अंग्रेज विल्सन को यहां सेब जैसा फल लाने का श्रेय जाता है .शौकीन व्यक्ति थे ,उनका अलग इतिहास है .विल्सन काटेज भी दिखाया गया जहां वे रहते थे .इस काटेज के चारों और देवदार से घिरे पहाड़ थे तो इन पहाड़ से उतरती कई नदियां भी .ये नदियां पहाड़ से देवदार के जंगल पार करती हुई उतरती और सामने गंगा में समा जाती .वे अलग अलग रास्तों से गंगा तक पहुंचती .इन छोटी नदियों के किनारे सेब के कई बगीचे भी नजर आए .     हर्षिल में ऊंचे पर्वत, कोलाहली भागीरथी, सेबों के बागान, झरनें, और  हरे चारागाह आदि शामिल हैं.'
खैर ,हम यहां सेना की एक शोध यूनिट के मेहमान थे .यह यूनिट तो ऊपर पहाड़ पर थी पर हमें नीचे पीडब्लूडी के एक डाक बंगले में ठहराया  गया .    सेना का एक जवान जो गाइड के रूप में था वह पीडब्लूडी के छोटे से डाक बंगले में ले गया जिसपर उत्तरकाशी के भूकंप के चलते दरार के निशान दिख रहे थे . दो कमरे थे जिसमे एक जो ज्यादा बेहतर था वह हमें दिया गया . थोड़ी देर बाद वह जवान चाय बिस्कुट के साथ आया और फिर इस जगह के बारे में बताने लगा . सुरेश नामका वह जवान फिर यह भी बोला -राजकपूर साब यही रुके थे ,राम तेरी गंगा मिली की शूटिंग के लिए ,इसी रूम में . कुछ देर बाद उसने बताया कि रात का खाना ऊपर पहाड़ पर स्थित मेस से ही आएगा और रात करीब नौ बजे तक क्योकि वह दूर है . चाय की व्यवस्था यहां  थी . कुछ देर बाद बाहर निकले तो सामने भागीरथी का चौड़ा पाट था . किनारे पर ग्लास की एक बंद झोपडी जिसे ग्लास हाउस कहा जा रहा था उसके भीतर जाकर बैठे तो बर्फीली हवा से रहत मिली . दूर तक फैली सफ़ेद बालू पर गोल हो चुके पत्थरों की चादर बिछी थी और भागीरथी इन पत्थरों को छूती हुई गुजर रही थी . पीछे की तरफ ही वह मशहूर विल्सन काटेज था  . हर्षिल में चारो ओर पहाड़ से गिरती करीब दस नदिया है जो झरने में बदल जाती है . ये झरने जब फिर नदी में बदलकर हर्षिल की जमीन पर आते है तो कई जगह टापू में बदल जाती है . पहाड़ पर देवदार के घने जंगल ,सेब के बगीचों के बगल से गुजरती एक नदी और उसके पारदर्शी पानी का जो दृश्य बन रहा था वह आर्ट्स कालेज के एक चित्रकार के कैनवास पर तो कई बार देखा पर साक्षात् पहली बार दिख रहा था . इन नदियों ,झरनों और वादियों को देखकर समझ आया राजकपूर ने क्यों इस जगह को चुना था . कुछ देर बाद गंगा के किनारे गए तो आकाश छोटे गोल पत्थरों से खेलने लगा .गंगा का इतना चौड़ा पाट पहाड़ पर पहले कभी नहीं देखा था .किसी समुद्र तट जैसा किनारा .दूर तक सफ़ेद बालू और सफ़ेद गोल पत्थरों के किनारे बहती गंगा का नीला पानी .याद है इस यात्रा पर जनसत्ता के रविवारीय में जो रपट लिखी थी उसका शीर्षक भी पहाड़ पर गंगा का समुद्र तट जैसा कुछ दिया गया था .आज भी वह तट भूलता नहीं .और गंगा का उद्गम भी तो ज्यादा दूर नहीं था .आकाश को लेकर इस गंगा तट पर कुछ देर चले कि बादल गरजने लगे .और एक झटके से बरसात शुरू हो गई .हम लोग दौड़ कर ग्लास हाउस के भीतर पहुंचे .पहाड़ की बरसात वह भी इतनी उंचाई पर ,फ़ौरन ठंढ महसूस होने लगी .हम लोगों ने वही पर चाय ली .चाय देने के साथ ही सेना के जवान ने बता दिया था कि खाना कुछ देर से मिलेगा .कमरे में आग का प्रबंध कर दिया गया था और उसकी वजह से कुछ राहत मिल गई थी .डाक बंगला की दीवार पर कुछ समय पहले आए भूकंप का असर मौजूद था .राजकपूर जैसे अभिनेता को भी इसी काम चलाऊ कमरे में ही रुकना पड़ा था क्योंकि कोई और जगह थी ही नहीं उस दौर में .अब तो बताते है कि कई गेस्ट हाउस खुल गए हैं .रात को करीब सवा नौ बजे 
 जवान टिफिन लेकर आ गया और बोला - सर ,.अपने आफिसर के डिनर से पहले खाना सर्व नहीं हो सकता था इसलिए थोडा देर हुआ . टिफिन भी काफी भारी .चार आदमी के खाने लायक खाना .फिर खाना होते होते रात के दस बज गए और एक चक्कर बाहर शोर मचा रही भागीरथी का काट सोने चले गए .सुबह उठे तो सामने हिमालय नजर आया तो सामने गंगा .हमें गंगोत्री की तरफ जाना था .रास्ते में कई जगह बर्फ की वजह से रास्ता संकरा और खतरनाक हो चुका था .रात ही चौकीदार ने बताया कि बर्फ हटाने वाला एक वाहन पहाड़ से गिरे बर्फ के सैलाब में बह कर खाई में जा चुका है .ऐसे में कुछ डर भी लग रहा था आगे की यात्रा को लेकर . 
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