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वायनाड के वर्षा वन में
अंबरीश कुमार
 अभी अभी अख़बार में सोनल मान सिंह का एक लेख पढ़ा तो उनसे हुई पुरानी मुलाक़ात याद आ गई .कालीकट भी याद आया और उमेश सिंह चौहान साहब भी .यही वह शहर है जहां पुर्तगाल से आकर वास्को डी गामा उतरा था .देश में पुर्तगालियों का प्रवेश द्वार .फोटो में वह समुद्र तट भी है तो वास्को का स्मारक भी . नब्बे के दशक की बात है .कालीकट महोत्सव देखने के लिए चेन्नई से कालीकट पहुंचे थे ट्रेन से .सुबह के पांच बजे थे .विश्विद्यालय के पुराने साथी और कालीकट के कलेक्टर चौहान साहब स्टेशन आए थे .नई जगह थी इसलिए उनके आने से सुविधा हो गई .बताया कि वे घंटे भर भर पहले आए थे फिल्म अभिनेत्री मीनाक्षी शेषाद्रि को लेने .वे ही आयोजक थे इसलिए दौड़ धूप भी कर रहे थे .शहर के बीच का होटल था नाम संभवतः मालाबार पैलेस था .लाबी में प्रवेश करते ही पानी के पुराने जहाज का बड़ा सा माडल रखा हुआ था .
आकाश के लिए यह अजूबा सा था इसलिए वहां से हटा तो विशाल एक्युरियम में शार्क मछली देखने लगा .हम लोग ऊपर की दूसरी मंजिल पर रुके हुए थे .बगल में नौशाद ,नृत्यांगना सोनल मानसिंह और मीनाक्षी शेषाद्रि भी .नौशाद से यही शाम को मुलाकात हुई .लखनऊ से लेकर मुंबई के किस्से सुनाने लगे .अच्छा लगा उनसे मिल कर .फिल्म ,साहित्य और संगीत नृत्य के क्षेत्र में अपनी कोई खास जानकारी नहीं रही है .आम दर्शक की तरह ऐसे मशहूर लोगों से मिलकर अच्छा लगता है . रात को बताया गया कि डिनर सोनल मान सिंह के साथ नीचे रेस्तरां में है .हम कुछ मिनट पहले पहुंच गए थे .कुछ देर में सोनल मानसिंह भी आई .परिचय पहले ही हो चुका था .उन्होंने सरसों में बनी मछली और चावल मंगाया .बताया कि कई घंटे की मेहनत के बाद उनका प्रिय भोजन यही होता है .सविता उनसे नृत्य की शुरुआत के बारे में देर तक बात करती रही .कई घंटे तक रियाज करना फिर कार्यक्रम .यह कार्यक्रम समुद्र तट पर था जिसकी रिपोर्ट भी जनसत्ता मे दी थी हालांकि नृत्य संगीत के कार्यक्रम के बारे में पहले कभी लिखा नहीं था .इस दौरे में ही वह समद्र तट देखा जहां पुर्तगाल से आकर वास्को उतरा था .वह अकेले नहीं आया एक संस्कृति के साथ आया जिसने तटीय इलाकों में बहुत कुछ बदल दिया .खानपान ,वास्तुशिल्प से लेकर रीति रिवाज तक . गोवा उदाहरण है . 
जंगल में घूमते हुए कई क्षण ऐसे आए है जो कभी भूलते नहीं .ऐसा ही एक यात्रा केरल के वायनाड जिला के जंगलों की है .जाना था वायनाड के जंगल के बीच बने वैथ्री रिसार्ट में .इससे पहले पुकोट झील में कुछ देर रुके और बोटिंग भी की .कालीकट से करीब सौ किलोमीटर दूर वायनाड के जंगलों में आगे बढे तो मौसम भी बदल चुका था और नहाया हुए जंगल में पक्षियों की आवाज गूंज रही थी .जंगल का रास्ता भी काफी उबड़ खाबड़ था और कई जगह लगता गाड़ी फंस जाएगी .इससे पहले ड्राइवर चाय बागान घुमाने के साथ काली मिर्च की बेल के दर्शन करा चुका था .यह कालीमिर्च का इलाका है जिसके चलते सदियों से विदेशी व्यापारियों की नजर इस अंचल पर रही .कालीकट के पास ही वह समुन्द्र तट है जहाँ पुर्तगाल से चला वास्को डी गामा २० मई १४९८ को अपने जहाज से उतरा था .कपड में उस जगह एक उपेक्षित स्मारक आज भी उसकी याद दिलाता है .यहाँ फ्रांसीसी ,डच और अरब के सौदागर भी आये और हर किस्म का दखल भी दिया .यहाँ की संस्कृती और खानपान पर भी इसका असर पड़ा .काली मिर्च और अन्य मसालों के चलते यह बड़ा व्यापारिक केंद्र भी रहा है .
खैर जंगल में वैथ्री रिसार्ट के रास्ते पर जाते हुए रास्ता भी भटक गए पर कुछ देर बाद सही रास्ता मिल गया .यह जंगल कई मशहूर जगहों से घिरा हुआ है जिसमे एक तरफ ऊटी मैसूर है तो दूसरी तरफ वायनाड के खुबसूरत इलाके और कालीकट का समुंद्र तट भी .वैथ्री रिसार्ट बहुत ही अद्भुत जगह है जो जंगल के बीच में इस तरह बनाया गया है कि सारी सुवधाओं के बावजूद जंगल में रहने का अहसास करता है .पास में ही झरनों की आवाज आती है तो पेड़ पर बने हट आपको आसमान के पास ले जाते है ..तरह तरह के पक्षी और जानवर रास्ते में नजर आए जो रिसार्ट के आसपास भी मंडरा रहे थे .बारिश के बाद जंगल बहुत ही खूबसूरत नजर आता है खासकर जब धुंध छाई हो . ओस की तरह गिरती बूंदों के बीच कुछ देर बैठे रहे ,भीगने के बावजूद उठने का मन नहीं हो रहा था ..यह जंगल का सम्मोहन था जो इस जगह से बांधे हुए था .जंगल बहुत घुमा है और हर जगह की अलग अलग विशेषता भी है .चाहे उतर पूर्व के जंगल हो या फिर गुजरात में गीर के जंगल .बस्तर का जंगल तो अफ्रीका का मुकाबला करता है .पर केरल में वायनाड का यह वर्षावन जल्दी वापस नहीं लौटने देता .हालाँकि यह रिसार्ट कुछ महंगा जरूत है पर दो तीन दिन यहां  रुकने वाला है .
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