ताजा खबर
मायावती के फैसले से पस्त पड़ी भाजपा बमबम ! दशहरे के व्यंजन एक यात्रा खारपुनाथ की जीवन का हिस्सा भी है बांस
सवा चार लाख में बिका था घोड़ाखाल स्टेट

शैलेन्द्र प्रताप सिंह 

वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध के पश्चात केंद्रीय सरकार ने यह महसूस किया गया कि सैन्य सेवाओं में अधिकारी कुछ विशेष क्षेत्रों से ही आते हैं जबकि उनका अखिल भारतीय प्रतिनिधित्व आवश्यक है. उस दौरान के रक्षा मंत्री  वीके कृष्ण मेनन ने भारत के प्रत्येक राज्य में एक ऐसे स्कूल की स्थापना करने की योजना बनाई जिनका उद्देश्य आम छात्रों को सैन्य सेवाओं में अधिकारी बनने के लिए प्रेरित करना था . पब्लिक स्कूलों जैसी शिक्षा-दीक्षा होने के बावजूद इन विद्यालयों में मध्यम एवं आम वर्ग के छात्रों को कम शुल्क के साथ उच्च स्तरीय शिक्षा प्रदत्त करने का प्रावधान किया गया. इन्हें सैनिक स्कूल या सैन्य विद्यालय की संज्ञा दी गयी . तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने उत्तर प्रदेश में ऐसे सैनिक स्कूल की स्थापना के लिए घोडाखाल भवाली में स्थित रामपुर नवाब सर सैयद रजा अली खान की पूरी घोड़ाखाल स्टेट को कुल चार लाख पचीस हज़ार रूपयों में दिनांक 25 मार्च 1964 में ख़रीदा . यह स्टेट घोड़ाखाल  , श्यामखेत , कहलक्यूरा , मेहरागांव और हरिया बरियाँ गांवों की ज़मीनों को समेटे करीब पाँच सौ एकड़ क्षेत्र में फैली थी . नवाब की मुख्य हवेली को स्कूल के प्रशानिक भवन के रूप में परिवर्तित करने के मध्य उसमें आग लगने से स्कूल विधिवत शुरू होने में बिलम्ब हुआ और सैनिक स्कूल घोड़खाल की विधिवत स्थापना 21 मार्च 1967 को हुई . भवाली धोडाखाल के लिये यह बहुत बडी उपलब्धि हुई क्योकि जहाँ करीब पाँच सौ बच्चों के ख़ानपान की प्रतिदिन ब्यवस्था होनी थी , वहीं इसके तमाम स्टाफ़ के लिये भी निकटतम बाजार भवाली ही थी . बच्चो के अभिभावको के आने जाने से बाजार की रौनक़ और साथ ही सामानों की माँग भी बढ़ी . अपनी स्थापना के कुछ वर्षो बाद ही सैनिक स्कूल घोड़ाखाल भवाली देश के सिरमौर स्कूलों में गिना जाने लगा . मुझे ख़ुशी  है कि सैनिक स्कूल घोडाखाल के प्रधानाचार्य  रोहित द्विवेदी जी ( कैप्टेन नेवी ) ने स्कूल के संबंध में एक अलग से अध्याय लिखने पर सहमत हो गये है . 
इंडियन मिशनरी सोसाइटी ( क्रिश्चियन ) ने 1924 में रोजरी विला ( भवाली सेनेटोरियम के गेट के सामने की पहाडी पर ) में एक चैपल ( चर्च ) बनाकर यद्यपि मिशन का काम शुरू कर दिया था पर तेजी से बढ़ते भवाली की जनसंख्या और यहाँ के बच्चो की शिक्षा की ज़रूरतों को दृष्टिगत रखते हुये मिशन ने यहाँ कस्बे के दक्षिण रेहड पहाडी पर घोडाखाल तिराहे के पास ही मिस्टर सेरेड साहब की ज़मीन और उन पर बने आवासों को खरीद कर डि वीटो स्कूल और पास ही चर्च बनवाने का काम वर्ष 1970 के आसपास शुरू कर दिया . ग्रेड एक से लेकर दस तक के लिये डि विटो कान्वेंट और डि विटो शिशु ने 1971 -72 से और रोजरी विला में भी 1987 से शिक्षण कार्य प्रारम्भ कर दिया गया . रोजरी विला में कस्बे से दूर होने के कारण बच्चे नही पहुँच पाते है पर डि विटो स्कूल भवाली के बच्चों के लिये बहुत उपयोगी सिद्ध हो रहा है . डि विटो में बच्चो की पढाई औरअन्य तरह तरह की क्रियायों के लिये कुल 16 कमरे है , कम्प्यूटर लैब है , लडके लड़कियों के लिये अलग 
घनश्याम सिंह ( निर्माण केंद्र ) ने बताया कि सन् 47 के बाद जब भवाली से चारो तरफ को बस आने जाने लगी तो दूध डेयरी के पास ही शुरुआत में रोडवेज़ और के एम यू के बस अड्डे खुले . भवाली से भीमताल रोड पहले बनी . भीमताल से हल्द्वानी को रोड बाद में बनी जिसके बाद भवाली से भीमताल होकर हल्द्वानी को सीधे यात्रा शुरू हुई . पोस्ट आफिस पहले भवाली बाजार में भगत साहब की बिल्डिंग में था जहाँ आज कोआपरेटिव बैंक है . बाद में यह भट्ट साहब की बिल्डिंग में ट्रांसफ़र हुआ . 1964 में सरकार ने फ़ील्ड के पास करीब ७० नाली ज़मीन अधिग्रहीत किया जहाँ सेवआज भवाली की पानी ब्यवस्था सुनिश्चित की जाती है . 
घोडाखाल में लेक व्यू रेस्ट्रोरेंट के मालिक जोशी बंधुओं में सबसे बडे़ तारा दत्त जी ने बताया कि उनका पैतृक गांव मनाड़ अल्मोडा में है . घोड़ा खाल में पहले मेरे नाना जी स्व महानंद जोशी जी आये थे जो रामपुर नवाब के यहाँ माली का काम करते थे . उनके एक साथी इंद्रदेव जी थे , जो तीनमोड मंदिर के पहले पुजारी थे . इंद्रदेव जी के पौत्र दयालु बाबा आजकल गंगनाथ मंदिर घोडाखाल के पुजारी है . जोशी जी ने बताया कि मेरे ६ मामा और उनके दो बहने थी . छोटी वाली बहन मेरी माँ है . मामा लोगों के मकान हमारे घर के ही ऊपरी तरफ स्कूल की सीमा के पास है . हम पाँच भाई , मैं , पूरन चंद्र ( पप्पू ) दीपचंद्र ( दिप्पू ) प्रेम चंद्र और रोशन चंद्र है . जोशी जी ने बताया कि आजकल के सैनिक स्कूल घोडाखाल में नवाब रामपुर के समय आज के स्टाफ़ क्वार्टर्स के पास काकू गैर ( काकू की बाग ) थी . आज के आडीटोरिरम रे पीछे खुटानी की बाग थी , सेब की बाग प्रधानाचार्य के घर के नीचे स्टेडियम की ओर थी और तालाबों के नीचे के खेतों में खूब सब्ज़ी होती थी . 
 राकेश बेलवाल जी के अनुसार वर्ष १९६८ के दरमियाँ भवाली में एक अच्छा पिक्चर हाल भी था. यह वर्तमान टी आर सी की जगह पर था. टीआरसी के अतिथि गृह वाली बिल्डिग पर लोग श्यामखेत की तरफ को मुह करके बैठते थे और टीआरसी मैनेजर आवास वाली जगह पर प्रोजेक्टर का चबूतरा व परदा था. ये पिक्चर हौल नैनीताल के डिप्पे सरदार जी का था जो पंजाब होटल वाले थे. भवाली ने इस पिक्चर हौल ने लगभग एक दशक तक धूम मचाई. सन १९७८ के आसपास यह बंद हो गया . जब हम डी वी टो स्कूल में पढते थे तो हम सब शाम को आईस्पाई (छुप्पन छिपाई) इस खंडहर में खेला करते थे. खण्डहर में केवल ईट की चार दिवारी थी और एक चबूतरा रह गया था . इटें यदा कदा गिरती रहती थी और हममें अपना नाम लिखने की होड़ लगी रहती थी. ईटों से हम सब अपना नाम लिखते थे और दूसरे दिन डी वीटो स्कूल से लडको को दिखाते थे.
 
मास्टर चिंतामणि जी के चचेरे भाई और ठेकेदार राधेलाल जी के पुत्र श्री दयानंद आर्य जी ने बताया कि मैं नेहरू युवा केंद्र के निदेशक पद से सेवानिवृत हो यही ल्यूसाल गांव में रह रहा हूँ . मेरे पिता जी स्व श्री राधेँलाल जी मेहरगांव के प्रधान २६ साल तक रहे . आज मेहरगांव के तीन गांव मेहरागांव , ल्यूसाल और भक्तुड़ा हो गये है . पिता जी ने एक पन चक्की भी जोशी से काली पुलिया के पास ख़रीद कर चलायी थी . पिता जी सरकारी बडे ठेकेदार थे और उन्होने ही के सी पंत जी की बिल्डिंग भी बनवाई थी . ६३ साल की उम्र में वह वर्ष ९१ में मरे . दयानंद जी अपने बचपन को याद करते हुये बताते है कि पहले बहुत ठंड पढ़ती थी . बागेश्वर , कौसानी , गरूण और अल्मोडा तक के लोग अपने घरों को छोडकर नीचे जाड़ों में हल्द्वानी चले जाते थे और मार्च में वापस घरों को आते थे . यह यात्रायें बैलगाड़ी से होती थी . रास्ते में ठहरने की चट्टिया बनी थी . ज्यादातर खाने पीने का सामान आदि भी हल्द्वानी से खच्चरों में आता था . भवाली से भीमताल करीब चार मील और भीमताल से हल्द्वानी ६ मील है . भीमताल से सुबह घोड़े खच्चर हल्द्वानी जाते थे और शाम तक सामान लेकर आराम से आ जाते थे . काठगोदाम से श्याम खेत १० मील है और इसका एक बोर्ड श्यामखेत में लगा है . बरसात के दिनों में भवाली की शिप्रा नदी पर पानी ठीक ठाक रहता था . बच्चे उसमें कूदते थे , नहाते थे , तैरते थे और तीन पन चक्कियाँ भी चलती थी जिसमें एक गवर्नमेंट गर्ल्स कालेज के पास , दूसरी आजकल के रामगढ़ तिराहे के पास और तीसरी बाजार में मंदिर के पास थी . बाजार वाली ही मेरे पिता जी की थी . गर्मियों में नदी में पानी पर्याप्त न होने के कारण हम लोग अपने कंधो पर गेहूँ या मडुआ आदि ले जाकर भीमताल डाँट पर लगी पनचक्की से आटा पिसवाते थे . 
सैनिक स्कूल घोडाखाल के शुरुआती दिनो के बुज़ुर्ग अध्यापक श्री नूर साहब बताते है कि सन ६६ में जब वह सैनिक स्कूल घोडाखाल आये तो भवाली से घोडाखाल स्कूल पहुँचने का कच्चा रास्ता था . खूब धूल उड़ती थी . घोडाखाल भवाली तिराहे पर समरहिल्स पहली बिल्डिंग थी . जहाँ आज आन सिंह मार्केट है वहाँ जानवरों का कांजीहाउस होता था . डाक्टर आन सिंह साहब अच्छे डाक्टर और भले इंसान थे . घोडाखाल स्कूल भी बच्चो को देखने आते थे . उनका बेटा मोहन भी स्कूल में विद्यार्थी था .लेखक पूर्व आईजी हैं और घोडाखाल में रहते हैं .
फोटो -नबाब रामपुर की हवेली का मुख्य भवन जो अब सैनिक स्कूल का प्रशासनिक भवन बन गया है 
email ईमेल करें Print प्रिंट संस्करण
  • तो अयोध्या पर भारी पड़ेगा कोरेगांव
  • दम है कितना दमन में तेरे देख लिया और देखेंगे
  • विध्वंसकों ने रघुकुल की रीत पर कालिख पोत दी
  • चिनार! तौबा..यह आग !
  • कांग्रेस के आकंठ पाप में डूब गई भाजपा !
  • अंडमान जेल से सावरकर की याचिका
  • हिमालय का चंदन ,हेमवती नंदन
  • कुशीनगर में लोकरंग का रंग
  • अवध का किसान विद्रोह
  • साझी नदी , साझी भाषा !
  • चंचल के गांव में दो दिन
  • मैकलुस्की गंज का एक दिन
  • दो रोटी और एक गिलास पानी !
  • मंत्री की पत्नी ने जंगल की जमीन पर बनाया रिसार्ट !
  • आधी आबादी ,आधी आजादी?
  • घर की देहरी लांघ स्टार प्रचारक बन गई डिंपल
  • मायावती का बहुत कुछ दांव पर
  • लो फिर बसंत आई
  • जिसका यूपी उसका देश ....
  • यनम : इतना निस्पंद !
  • Post your comments
    Copyright @ 2016 All Right Reserved By Janadesh
    Designed and Maintened by eMag Technologies Pvt. Ltd.