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एक सैरगाह पर उग्रवादियों की नजर

गिरधारी लाल जोशी

पटना .   बिहार का बेजोड़ पर्यटक स्थल भीमबांध उग्रवाद की भेंट चढ़ा है. बीते 2005 से  भीमबांध आम जनता के लिए बंद है. और पुलिस , सीआरपीएफ के साए में है. सोमवार को भागलपुर रेंज के डीआईजी विकास वैभव ने वहां जाकर हालात की समीक्षा की. इनके मुताबिक हालात तो पहले से सुधरे है. भीमबांध भी फिर से अपनी रौनक पाने को बेताब है. मगर सरकार का ध्यान जाए तब ही यह गुलजार होगा.  यह बिहार के मुंगेर ज़िले के हवेली खड़गपुर इलाके में है. हमने डीआइजी से बात की. इससे जुड़ी अपनी यादों को उन्होंने साझा किया है. 
 
  भागलपुर रेंज के डीआईजी विकास वैभव जब आईपीएस बनकर बतौर प्रशिक्षु  भागलपुर आए तो पहले ही रोज एक वाकए ने उन्हें सन्न कर दिया था. वे अंदर से हिल गए थे. आज भी उस घटना को यादकर मर्माहित हो जाते है. यह वाकया 13 साल पुराना है. मगर पुलिस महकमा के लिए काला इतिहास.        दरअसल विकास वैभव आईपीएस बन अपने क्षेत्रीय प्रायोगिक प्रशिक्षण लेने 4 जनवरी 2005 की रात भागलपुर आए थे. और एसपी आवास में ही ठहरे थे. दूसरे रोज शाम को वे उनके साथ चाय पर बैठे बातें कर रहे थे. उसी दौरान  आए एक फोन ने सबके होश उड़ा दिए थे. सबके सब चौक गए और सन्न रह गए. खबर थी मुंगेर के तत्कालीन एसपी केसी सुरेन्द्रबाबू के नक्सली हमले में शहीद होने की. भीमबांध के जंगल में वे नक्सली दस्ते की तलाश में गए थे. उग्रवादियों ने लैंड माइंस के जरिए धमाका कर उन्हें शहीद कर दिया था. यह बात 5 जनवरी 2005 की है. इस खबर के बाद उसी रात 9 बजे अपने सीनियर अधिकारियों के साथ वे मुंगेर  के लिए कूच कर गए थे. और पूरी रात पुलिस केंद्र में जग कर गुजारी. सुबह  होते ही शहीद पुलिस अधिकारी को अंतिम सलामी दी. फिर 11 बजे वहां से भीमबांध मौके का जायजा लेने गए. 
 
        आईपीएस विकास वैभव सोमवार को भीमबांध के जंगल का मुआयना करने गए थे. यह इनकी जिंदगी का तीसरा भीमबांध दौरा था. पहली दफा ये 25 साल कबल  छात्र जीवन में वहां बने गर्म पानी के कुंड को देखने अपने दोस्तों के साथ गए थे. दूसरी दफा मुंगेर एसपी के शहीद होने के बाद बतौर प्रशिक्षु आईपीएस. सोमवार का दौरा डीआईजी की हैसियत से हुआ. ये भागलपुर रेंज के साथ साथ मुंगेर  डीआईजी के प्रभार में है. इस दफा का मकसद वहां सुरक्षा बलों द्वारा चलाए जा रहे उग्रवाद उन्मूलन अभियान की समीक्षा करना था.  भीमबांध की वादियों को देखकर ये पहले की यादों में खो गए और उन स्मृतियों ने जहां सुखद अनुभव कराया वहीं  13 साल पुरानी उग्रवादी वारदातों ने झकझोर दिया.
 
         ध्यान रहे 5 जनवरी 2005  के वाकए के बाद भीमबांध कड़े सुरक्षा पहरे में बंधा है. इसके बाद आम लोगों का आना जाना बंद है. यह बिहार का एक प्रमुख पर्यटक स्थल व बेहतरीन पिकनिक स्पॉट है. जिसे केंद्र व राज्य सरकार मिलकर और बेजोड़ बना सकती है. यहां गर्म पानी के कुंड और मान नदी के उद्गम स्थल देखने लायक है. डीआईजी विकास वैभव बताते है कि उग्रवादियों की विध्वंसक गतिविधियों ने 1993 में भव्य रहे विश्राम भवन व वॉचटावर को ध्वस्त कर दिया. लेकिन आज भीमबांध का माहौल बदला है. शांत है. इस पर्यटक स्थल की फिर से राष्ट्रीय पहचान बनाई जा सकती है. इन्होंने कुंडों से तकरीबन 500 फीट की पर्वतारोही की तरह चढ़ाई की और मोदगिरी के पर्वतों के विहंगम नजारे को देखा. वहां बने पुराने मंदिर के दर्शन किए. 
 
        इतिहास विषय पर पकड़ रखने वाले इस तेजतर्रार व ईमानदार छबि के आईपीएस विकास वैभव का मूल मकसद कानून का राज कायम करना है. ये कहते है पर्यटकों से खचाखच भरे रहने वाले कुंडों को वीरान देखकर 21 मार्च 1811 में यहां आए फ्रांसिस बुकानन के लिखे वर्णनों को बताना जरूरी है. बुकानन ने 200 साल पहले भीमबांध के झरनों को भारतदेश का सर्वश्रेष्ठ बताया था. 
 
       वैसे भी 13 सालों में बहुत कुछ बदला है. अगल बगल गांवों के घर बिजली से रौशन है. पक्की सड़कें  सुदूर गांवों को भी जोड रही है. वहां की प्राकृतिक छटाएं दिल को बाग बाग कर रही है. भीमबांध अपने संक्रमण काल से निकलने को व्याकुल है. जरूरत है सामुदायिक पुलिसिंग के तहत लोगों के मन में बैठे ख़ौफ़ के माहौल को खत्म करना. ऐसा वे खुद भी महसूस करते है और इनकी कोशिश भी .
 
फोटो  - भीमबांध की रमणिक वादियां और दौरा करते डीआइजी विकास वैभव.
 
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