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दिग्विजय की यात्रा धार्मिक या सियासी?

पूजा सिंह

भोपाल. दिग्गज कांग्रेसी राजनेता दिग्विजय सिंह यूं तो सपत्नीक नर्मदा परिक्रमा यात्रा पर निकले हुए हैं लेकिन ऐसे कम ही लोग हैं जो उनकी इस यात्रा को पूरी तरह से धार्मिक मानते हों. हाथ में लंबा डंडा थामे तेज कदमों से दिग्विजय कई दूरियां नाम पर रहे हैं. एकतरफ जहां उनका समर्पण इसे धार्मिक बनाता है तो वहीं साथ चल रहा कांग्रेस कार्यकर्ताओं का हुजूम इस यात्रा की सीरत बदल देता है. उनके साथ यात्रा में चल रहे युवा कार्यकर्ता उत्साह के साथ बताते हैं कि इस यात्रा के दौरान उनके पास मुद्दों की भरमार सी हो गयी है जो अन्यथा राजधानी में बैठे नेताओं के पास नहीं है. हर जगह लोग आते हैं और उनसे आत्मीयता से अपनी दिक्कतें साझा करते हैं.
यात्रा निजी है लेकिन उनके साथ कांग्रेस नेताओं पूरा जत्था सुबह से शाम तक चलता रहता है. हालांकि खुद सिंह कहते हैं कि ये लोग राजनैतिक नहीं बल्कि मां नर्मदा के प्रति श्रद्घा की वजह से आते हैं. 30 सितंबर को शुरू हुई यह यात्रा होली के पश्चात समाप्त हो जायेगी. उस वक्त तक दिग्विजय सिंह प्रदेश की 120 विधानसभा सीटों से गुजर चुके होंगे. प्रदेश में इस साल विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और माना जा रहा है कि ये चुनाव मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के लिए आसान नहीं होने वाले हैं. ऐसे में इस यात्रा का महत्त्व और अधिक बढ़ जाता है. गौरतलब है कि इससे पहले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी नर्मदा यात्रा का आयोजन कर चुके हैं. विश्लेषकों ने उसे भी पूरी तरह चुनावी यात्रा करार दिया था. लेकिन दिग्विजय की यात्रा इन मायनों में खास है कि इसमें कोई सरकारी तामझाम नहीं है. वह स्वयं हाथ में लकड़ी और सर पर गमछा बांधे पूरा दिन पैदल परिक्रमा करते हैं. 
नर्मदा परिक्रमा समाप्त होते ही वह एकता यात्रा पर निकलेंगे. एकता यात्रा में उनके साथ कांगे्रस के वे तमाम नेता होंगे जो चुनाव नहीं लडऩे वाले लेकिन पार्टी की जीत की आकांक्षा रखते हैं. इस यात्रा को प्रदेश कांग्रेस में गुटबाजी समाप्त करने और एकता कायम करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है.
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