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तो अब हरियाणा की बारी है

ओम प्रकाश नमन 

नई दिल्ली .तेजी से आगे बढ़ रहे हरियाणा पर संकट के बादल मंडरा रहे है .अगर सरकार नहीं चेती तो इस राज्य का भी वही हाल होगा जो बंगाल और महाराष्ट्र का हो चुका है .साठ  के दशक में कोलकाता और बंगाल में बाहरी, विशेषकर सैकड़ों साल से कोलकाता में बसे मारवाड़ी उद्योगपतियों और उनके उद्योगों को मार्क्सवादी/मओवादिओं द्वारा निशाना बनाया गया. परिणाम यह हुआ कि वहां के उद्योगपतियों ने अपने उद्योग मुंबई और दक्षिण के राज्यों में लगाने शुरू किये जहाँ वे खुद को जादा सुरक्षित समझते थे और जहाँ कानून और व्यवस्था की हालत बेहतर थी.
परिणाम स्वरुप १९६० के दशक तक जो कोलकाता भारत की औद्योगिक राजधानी थी, उसकी जगह वहाँ की राज्य सरकारों की बेवकूफी से १९८० का दशक आते आते मुंबई भारत की औद्योगिक राजधानी बन चूका था.
१९९० के दशक में मुंबई की मजदूर यूनियनों , विशेषकर दत्ता सामंत और शिव सेना की यूनियनों ने मुंबई की कपड़ा मिलो में लम्बी हड़ताले करायी और उस पर तुर्रा यह की १९९५ में महाराष्ट्र में शिवसेना- बीजेपी गठबंधन शासन में आ गया..
 
इन हड़तालों और गुंडागिरी/ हफ्ताखोरी से तंग आकर मुंबई के उद्योगों ने गुजरात का रुख किया, जो कानून और व्यवस्था की दृष्टि से अपेक्षाकृत एक बेहतर राज्य था. गुजरात के औद्योगीकरण का सबसे बड़ा श्रेय दत्ता सामंत और शिव सेना की कामगार यूनियनों को जाता है.
मुंबई शहर में प्रोपर्टी की बेतहाशा बढती कीमतों , भीड़ और इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी को देखते हुए सन २००० के बाद धीरे- धीरे बहुत से मल्टीनेशनल कम्पनियाँ अपना आफिस गुरुग्राम, चंडीगढ़, नॉएडा आदि शहरों में शिफ्ट कर दिया. यह मुबई का बहुत बड़ा नुकसान था.
अब केंद्र सरकार की उद्योग विरोधी नीतियों एवं गुरुग्राम , चंडीगढ़ (हरियाणा) में पिछले ३-४ सालों से कभी जाट आन्दोलन तो कभी अन्य आंदोलनों से कानून व्यवस्था की बिगड़ती हालत से तंग आकर मल्टीनेशनल कंपनियों ने अपने आफिस हांगकांग और सिगापुर आदि में शिफ्ट करना शुरू कर दिया है.करनी सेना के वर्तमान आन्दोलन में जिस ढंग से स्कूली बसों को टारगेट किया गया है उसके बाद कौन सा अभिभावक गुरुग्राम में रह कर अपने बच्चों की जान को खतरे में डालने का दुस्साहस करेगा.
 
मुझे याद है की आज से लगभग ३ साल पहले वित्त मंत्री जेटली ने संसद में विपक्ष को लताड़ते हुए कहा था कि दिल्ली और राजस्थान में हो रहे सामूहिक बलात्कारों पर शोर मचाने से विदेशों में भारत की छबि ख़राब होगी और विदेशी पर्यटक भारत नहीं आयेंगे. इससे भारत को आर्थिक हानि उठानी पड़ेगी.अब पिछले कुछ सालों से करनी सेना, बजरंग दल, गौरक्षक दल, श्रीराम सेना, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना, दलितों और जाटों के आन्दोलनों से जो परिस्थितियां देश में उत्पन्न हुयी हैं , उन्हें देख कर कौन सा निवेशक भारत में उद्योग लगाना चाहेगा?
राज्य सरकारें और केंद्र सरकार मूक दर्शक बन कर भारत को एक धार्मिक अतिवाद की तरफ ढकेल रहे हैं जिसके कालांतर में अतिवाद से आतंकवाद में परिवर्तित होने में देर नहीं लगेगी.यह हमारे राजनेताओं , न्यायपालिका और कार्यपालिका की परीक्षा का समय है. अगर इस चिनगारी को आज नहीं बुझाया गया तो कल यह पूरे देश को जला कर ख़ाक कर देगी.
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