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नेहरु का चरित्र समा गया था मैं अविवाहित हूं लेकिन कुवारां नहीं भारत छोडो आंदोलन और अटल वे एक अटल थे
चंचल के गांव में दो दिन

शंभूनाथ शुक्ल

रमेसुर कटियार ने पूछा है कि 'सुकुल जब तुम्हें गावैं जाए  का रहय तौ यो ससुर कानपुर का इत्ता बड़ा गांव नाहीं दिखाई पड़ो! का कमी है हमरे गांव  मां  एक बीघा गन्ने की फसल है, इत्ते मा ही मटर है. शकरकंदी, गाजर, आलू, मूली सब कुछ तो है. तब तुम काले कोसन जौनपुर काहे गयो ? सवाल वाजिब है. मैं उस जौनपुर क्यों गया जहाँ बस एक श्रमजीवी और दूसरी फरक्का एक्सप्रेस ट्रेन जाती है. इनमें से दोनों के पहुँचने का समय इतना ‘आड’ कि रात भर जौनपुर सिटी के प्लेटफ़ॉर्म पर ही समय काटना पड़े. छोटा-सा शहर और उस पर भी श्रमजीवी के पहुँचने का वक़्त रात साढ़े बारह का. लेकिन मैं गया जौनपुर! वहां गया चंचल बीएचयू  से मिलने, उसका मिजाज़ समझने. एक ऐसा आदमी जो किसी को कुछ नहीं समझता. बेबाक और बेलौस! जिसने पूरी इमरजेंसी जेल में काटी लेकिन इंदिरा गाँधी के खिलाफ कभी एक शब्द नहीं बोला. और आज वही आदमी मौजूदा हुक्मरानों की चड्ढी ही उतारे दे रहा है. जिसकी चित्रकारी अमर है और कलम बेजोड़. जो व्यक्ति गांधीवाद से इतना प्रभावित है कि जौनपुर शहर से 40 किमी दूर बदलापुर के पास वर्धा और साबरमती आश्रम की तर्ज़ पर समताघर खोला हुआ है.
इस फक्कड़ और बाहर से रफ एंड टफ दिखते चंचल के समताघर में कैसे पहुंचूंगा  यह एक सवाल मुंह बाये खड़ा था. रात कहाँ जाएंगे, कुछ पता नहीं क्योंकि जौनपुर कभी आया ही नहीं. साथ के लिए अनिल माहेश्वरी  को और ले लिया था, जो एक तो अंग्रेजी पत्रकार ऊपर से गाँव में कभी रहे नहीं. न उन्होंने कुछ पूछा न मैंने बताया और 13 जनवरी की दोपहर दो बजे हमने श्रमजीवी एक्सप्रेस गाज़ियाबाद से पकड़ी. हम चल तो दिए लेकिन अपने गंतव्य से अनजान. जब रात दस बजे ट्रेन लखनऊ पहुंची तब अनिल जी ने पूछा- जौनपुर किस वक़्त आएगा? मैंने कहा- शायद एक के आसपास. अनिल जी बोले कि आप नींद मार लो, तब तक मैं कुछ पढ़ता रहूँगा. नींद आंखों  में कहां  थी. धुकर-पुकर मची थी कि क्या होगा, कहाँ जाएंगे . हालांकि  चलने के कुछ पहले चंचल जी ने बता दिया था कि आप रात रिक्शा पकड़ कर चंद्रा होटल चले जाइयेगा. उसके मालिक राजेश सिंह को कह दिया है. करीब एक बजे गाड़ी मुसाफिरखाना ही पहुंची. एसी-टू के उस कोच में न कोई अटेंडेंट न टीटी. न आरपीएफ का सिपाही गश्त करते दिखा न जीआरपी का. पूछें तो किससे!
अब दोनों लोग जगने लगे और बार-बार मोबाईल पर रनिंग ट्रेन स्टेटस देखने लगे. पर एक तो नेट आए-जाए, दूसरे वह आधा घंटा पहले का स्टेटस बताए. रात दो बजे आया सुल्तानपुर. वहां से एक घंटे की दूरी पर नेट जौनपुर शो कर रहा था. हम बैठ गए. जहाँ भी ट्रेन खड़ी होती हम दरवाज़ा खोलकर देखते पर कोहरे में कुछ समझ न आता. तभी सुबह चार बजे चंचल जी का फेसबुक स्टेटस पढ़ा कि हम आज मना रहे हैं कि “ट्रेन लेट आए ताकि पंडिज्जी को रात में तकलीफ न हो”. अब यह तय हो गया कि है जौनपुर इंटीरियर में ही. ठीक 5.45 पर ट्रेन एक प्लेटफॉर्म पर लगी. कोहरे में कुछ दिखा तो नहीं लेकिन दूसरे कोच से कुछ लोग उतर रहे थे. हमें लगा यह कोई आउटर का स्टेशन होगा. तभी पास आए एक आदमी से मैंने पूछा तो बोला जौनपुर. मैं भड़भड़ा कर कोच में घुसा और अनिल जी से कहा जल्दी उतरिये. हम लोग अपने सामान घसीटते हुए उतरे. प्लेटफ़ॉर्म भी ऐसा कि जिस पर ट्राली वाले हमारे बैग बार-बार अटक जाएँ. हम बाहर आए. कुछ टेम्पो, कुछ ऑटो रिक्शा खड़े थे. हमारे चंद्रा होटल बताते ही वे बोलते डेढ़ सौ. हमें लगा कि यहाँ भी दिल्ली की तरह ही ऑटो वाले ठग हैं.
एक साइकिल रिक्शा वाले ने कहा- जो आपकी इच्छा हो दे दीजियेगा. हम उसी पर बैठे. पूरा शहर सो रहा था. होटल पहुंचे तो रिक्शे वाले को सौ का नोट दिया, उसने 50 वापस कर दिए. होटल में रिशेप्शन पर बैठे युवक ने बताया कि हम आपके कारण आधी रात से जगे बैठे हैं. रूम में गए और फ्रेश होकर नीचे आया तो पाया कि राजेश सिंह जी स्वयं हमारा इंतज़ार कर रहे हैं. बोले- चंचल जी का आदेश था. सामने स्थित बेनीराम प्यारेलाल की दूकान से शुद्ध घी की पूरियां और आलू-टमाटर की रसीली सब्जी आई. साथ में इमरती भी. कुछ ही देर में चंचल जी की भेजी गाड़ी आ गई. हम वहां से चले और डेढ़ घंटे में समता घर पहुँच गए. गेहूं और सरसों के खेतों से घिरा समताघर. फिरन पहने चंचल जी खड़े थे. तेज़ चाल से करीब आए और गले मिले. यह समताघर जिसमें कुछ कमरे पक्के थे और कुछ कच्चे. मैं जब चला था तब अपने साथ अपने जॉगिंग शू के साथ बिना फीतों वाले शू भी रखे थे. मुझे डर था कि समताघर गाँव में है क्या पता वहां टॉयलेट हो या न हो. शायद दूर खेतों में जाना पड़े. तब चप्पलें ठीक नहीं रहेंगी. लेकिन यहाँ तो हर कमरे से अटैच्ड बाथरूम था और टॉयलेट शीट भी वेस्टर्न स्टाइल की. एक पक्के रूम में हमारा सामान लगाया गया. बीस बाई बीस के उस कमरे में चार-चार फीट चौड़े दो तख़्त लगे थे. जिसमे रुई के गद्दे और सेमल की रुई की रजाइयां थीं.
दोपहर को जब समताघर में पढ़ने वाले बच्चे आने शुरू हुए, तब हमने भी क्लास ली. गाँव की हर बहू पढ़ी-लिखी है. कुछ कामचलाऊ तो कुछ बीए और एमए भी. कईयों ने बीएड किया है तो कुछ टीईटी पास भी हैं. लेकिन जो सबसे खास बात यहाँ देखने को मिली, वह है यहाँ की लड़कियों का पढ़ाई के प्रति अत्यधिक रुझान. इस गैर परम्परागत स्कूल में भी पढ़ने के लिए करीब दो सौ बच्चे आते हैं, इसमें से लड़के कुल 50 और लड़कियाँ डेढ़ सौ. सारे बच्चे कक्षा छह से दसवीं क्लास तक के हैं. पर मज़े की बात यह कि जहाँ लड़कों ने अंग्रेजी और गणित से दूरी जताई वहीँ लड़कियों का रुझान गणित में सबसे अधिक फिर अंग्रेजी और साइंस में दिखा. हर लड़की ने अपनी इच्छा इंजीनियरिंग में जाने की जताई जबकि लड़कों में से ज्यादातर ने पुलिस और अर्धसैनिक बलों में जाने की इच्छा जताई और तीन लड़कों ने क्रिकेटर बनने में. किसी भी लड़के में उच्च शिक्षा के प्रति आकांक्षा नहीं दिखी.
लड़कियों में पढ़ाई के प्रति यह दिलचस्पी देखकर मुझे रमई काका की वह कविता याद आ गई, जिसमें वे लिखते हैं- लरकउनू बीए पास किहिन, बहुरेवा बैर ककहरा ते! यानी बेटे ने तो बीए पास किया हुआ है लेकिन बहू को अक्षरज्ञान तक नहीं है. मुझे लगा कि आज अगर रमई काका जिंदा होते तो लिखते- बहुरेवा एमए पास किहिस, लरकउनू बैर ककहरा ते! गांव  में दिन भर में करीब 18 घंटे बिजली आती है इसलिए इस  गांव में फ्रिज, एसी, कूलर, टीवी आदि की कमी नहीं है. और इस वज़ह से  गांव  को इन उपकरणों की देखभाल के लिए इलेक्ट्रिशियन चाहिए और ये सब समताघर से मिल जाते हैं. अपने सहारे गाँव यानी स्वावलंबन की पक्की बानगी है यह गाँव! और पूरालाल ढेमा नामक इस गाँव की कायापलट की है उस शख्स ने जिसका नाम तो है चंचल लेकिन मिजाज़ और चिंतन है एकदम कड़क. जो नारियल की तरह रफ-टफ है लेकिन अंदर से कोमल और कांत!
जब 17 को हम वहां से विदा हुए तो अपने जॉगिंग शू जान-बूझ कर वहीँ   छोड़ आया. हमारे बदलापुर पहुंचते  ही चंचल जी का फोन आया कि पंडिज्जी गाड़ी वही रुकवा लीजिए, मैं किसी को बाइक से भेज रहा हूँ, आप अपने जूते यहीं भूल गए हैं. मैंने जवाब दिया- नहीं चंचल जी भूल नहीं आया बल्कि छोड़ आया हूँ ताकि जल्द ही फिर आऊँ.
 
14 की दोपहर एक बजे हम समताघर पहुंचे. जौनपुर से बदलापुर तक तो हाई वे है, लेकिन उसके बाद जिला पंचायत की सड़कें. ये इतनी सकरी हैं कि अक्सर हमारी बलेरो गाड़ी का एक पहिया किनारे की नाली की तरफ उतर जाता. करीब पाँच किमी का यह पैच पारकर हमारी गाड़ी एक दुमंजिले मकान के गेट पर रुकी. ड्राइवर ने कहा फोन लगा लें कि चंचल जी यहाँ हैं या आधे किमी दूर दिख रहे अपने घर में. फिर बोला- चलिए यहीं अंदर चलते हैं. हम दोनों लोग ऊंची सरियों वाला पारदर्शी गेट खोल कर भीतर घुसे. थोडा-सा मैदान और सामने था दो मंजिला एक पक्का मकान, जिसके दूसरी मंजिल का सहन मेहराबदार था. मैं उसकी तरफ बढ़ा तभी दाईं ओर बने कमरे के आगे के सहन की सीढ़ियाँ उतर कर फिरन पहने एक शख्स आगे आया और गले मिला. यही चंचल जी थे. इस सहन के नीचे एक अंडरग्राउंड हाल है, जिसमें बैठकर चंचल चित्रकारी करते हैं.
सामने बनी दुमंजली इमारत की बाईं तरफ सरसों के खेत थे. मैं उधर बढ़ा तो देखा पीछे मड हॉउस बना है. यानी तीन कमरे कच्चे, जिनकी छत खपरैल की है. माटी से लिपे इन कमरों की फर्श गोबर से लिपि थी. लेकिन बाथरूम सब में अटैच्ड और वह भी इटैलियन टाइल्स वाले. सब में कमोड. यह सब देखकर अच्छा लगा. इन कमरों के बाहर एक सबमर्सिबल हैंडपंप लगा था. जब चलाओ गरम पानी. इन कमरों के पीछे डेढ़ सौ बाई सौ फीट का एक पोखर था, जिसमें पानी भरने के लिए ट्यूबवेल के दो छह-छह इंची पाइप धकाधक पानी उड़ेल रहे थे. एक बार तो मेरी इच्छा हुई कि दस फिट गहरे इस पोखर में छलांग लगा ही दी जाए लेकिन अपनी इस उत्कंठा का शमन किया. इस पोखर के तीनों तरफ मीलों तक फैले खेत थे. सरसों, गेहूं, मूली, टमाटर, आलू तथा शकरकंदी लगा हुआ था. हमें एक पक्का कमरा दिया गया. चंचल जी ने कह दिया भोजन करिए और अपने आप जाकर घूमिये,  गांव  वालों से मिलिए, बतियाइए और उन्हें समझिए. यही आपका टारगेट है. भोजन उनकी मंझली बहू श्वेता ने बनाया. क्या खाएँगे, पूछने पर मैंने और अनिल जी दोनों ने एक साथ कहा- खिचड़ी. लेकिन मेज़बान को यह उचित नहीं लगा कि मेहमान खिचड़ी खाए इसलिए तहरी बनी, ढेर सारे देसी घी के साथ. भोजन के बाद पहले तो हमने समताघर के बच्चों की क्लास ली फिर हम घूमने निकल गए और लौटे तब सांझ ढलने लगी थी.
शाम को महफ़िल जमी. बातों का सिलसिला शुरू हुआ. चंचल जी ने कहा- यह मुल्क कांग्रेस ही चला सकती है. कैसे और इसका जवाब था उनके पास. यह मुल्क किसी भी अतिवाद की तरफ जा नहीं सकता. इसीलिए इसे चलाने का अकेला रास्ता है बीच का रास्ता. हम भले समाजवादी आन्दोलन से जुड़े रहे हों लेकिन मन कांग्रेस का परिमार्जन ही चाहता रहा. कांग्रेस जितना परिमार्जित होती रही, उतनी ही निखरती रही. अपने ही पोखर की फिश बनी. और वह भी लाजवाब! बाकी दोनों दिन भी यही हुआ. हम आसपास के गाँव जाते और वहीँ जम जाते. कहीं ताज़ी तोड़ी मूली खा रहे हैं तो कहीं भुनी शकरकंदी व आलू. लोग चाय को पूछते, हम कहते नहीं, हमें अपने गौशाले से निकाल कर ताज़ा दूध पिलाइए. बिना गरम किये. और फिर शाम को जमती महफ़िल.
एक बात जो सबसे अधिक हमने महसूस की वह थी गाँव में पढ़ी-लिखी औरतों द्वारा लोटापार्टी का बहिष्कार.  गांव  की बहुएं पढ़ी-लिखी हैं, उन्होंने कह दिया है कि हम गाँव में रहेंगी पर पहले टॉयलेट बनवाओ. इन बहुओं का ही कौशल है कि इस पूरे गाँव में कोई लड़की ऐसी नहीं मिली जो स्कूल न जाती हो. और कोई घर ऐसा नहीं मिला जहाँ औरतें  लोटा पार्टी जमात की हों. यानी सुबह अँधियारे में ही लोटा लेकर उन्हें खेतों की तरफ जाना पड़ता हो. हर दूसरे-तीसरे घर में टॉयलेट्स बनी हैं. पक्की और दरवाज़े वाली. कुछ ने घर के भीतर बनवा रखी है तो कुछ ने घर के बाहर कोने पर. कुछ घर तो ऐसे भी दिखे, जहाँ टॉयलेट्स और बाथरूम कमरे से अटैच्ड हैं. और उनकी इस मांग को हवा दी चंचल ने. नतीजा है यहाँ गाँव के बाहर लोटा लिए तड़के और सांझ ढले औरतों की टोली नहीं मिलती. इन औरतों के इस अभियान को हवा दी है चंचल ने.
 
मैंने घर (गाज़ियाबाद) से निकलते वक़्त लिए शुद्ध अफगानी हींग के कुछ पैकेट और लिक्विड रख लिए थे. क्योंकि चंचल जी ने अपनी एक पोस्ट में लिखा था कि पहले जब बदरी-केदारनाथ के पंडे आते थे तब वे अपने साथ शुद्ध हींग लाते थे, जिसकी महक पूरी रसोई को गुलज़ार कर देती थी. मैंने उन्हें जवाब दिया कि “मैं पंडा भले न सही पैदा तो बाँभन कुल में हुआ सो हींग जरूर ले आऊंगा”. तत्काल अपने अलीगढ़ निवासी मित्र विनय ओसवाल को फोन किया. वे हाथरस से शुद्ध हींग ले आए. अब हींग के लिए मैंने दूसरा बैग लिया वर्ना पूरी अटैची में हींग की खुशबू भर जाती. उस बैग से सारा अन्य सामान निकाल लिया, जिसमें मेरे वे डायजेस्टिव बिस्किट्स भी थे, जिन्हें खाने के बाद ही मैं मोर्निंग वाक के लिए निकलता हूँ. फिर उन बिस्किट्स को अटैची में रखना भूल गया. नतीजा यह हुआ कि जब 15 की सुबह समताघर से वाक के लिए निकला तो बिस्किट तो थे ही नहीं. मैं बेझिझक समताघर की रसोई में गया और सारे मर्तबान टटोल डाले मगर बिस्किट कोई नहीं. एक कांच के मर्तबान में मुझे कुछ बिस्किट जैसा दिखा तो मैंने उसे निकाल कर चखा, वह बर्फी थी जिसमें तिल मिले थे. उम्दा खोये की बर्फी. मैं तीन-चार पीस खा गया. इसके बाद जब उनकी बहू आई और तब उसने चाय के साथ फिर वही बर्फी भेजी. चाय में चीनी तो मेरी डायबिटीज को जान कर नहीं डाली गई थी, उसे अलग से रखा गया था, अनिल जी के लिए. किन्तु बर्फी भेजी गई थी. मैंने एक पीस फिर खाया और हम दोनों टहलने को निकल गए.
समताघर से करीब ढाई किमी दूर हम गजाधरपुर के रजबाहे तक पहुंचे. ठंड कड़ाके की थी और कोहरा जबरदस्त. फिर वापस लौटे. रास्ते में एक बड़ा-सा मकान दिखा. हम उसमें घुस गए. उस मकान के गैराज में फॉरच्युनर और सफारी खड़ी थीं. गौशाले में जर्सी गायें. हम उस मकान के अंदर घुस गए. कुछ लोग अलाव ताप रहे थे. हमने अपना परिचय दिया. हम चंचल जी के मेहमान हैं, यह जानते ही उन्होंने हमें कुर्सी आफर की. और चाय मंगवाई पर हमने चाय सधन्यवाद वापस कर दूध पिलाने को कहा. उसके बाद हम वापस आए. घर की बनी कचौड़ियों और हरे लहशुन की चटनी का नाश्ता किया. इसके बाद तिल के लड्डू खाने पड़े, क्योंकि उस दिन मकर संक्रांति थी. नहाने के दो विकल्प थे. एक तो गरम पानी की बाल्टी लेकर बाथरूम में जाकर नहाओ, दूसरा था सीधे सबमर्सिबल की धार के नीचे बैठ जाओ और खुले में स्नान करो. अब भले मैं एक कारखाना-मजदूर का बेटा हूँ, लेकिन मेरा इतना प्रोलेतेरियताइजेशन नहीं हुआ है कि खुले में नहाता लेकिन अनिल जी तो पटरे का नेकर पहन कर सीधे नल की धार के नीचे बैठ गए.
शाम को हम पहले तो पूरालाल के एक टोला कौशिकनपुरा गए. जो राजपूतों का टोला है. कुछ मकान कच्चे और कुछ पक्के. लेकिन पक्के माकन वही थे जिस घर के लोग मुंबई, अहमदाबाद या दुबई में नौकरी करते हैं. चूँकि खेती का साइज़ लगातार छोटा होता जा रहा है इसलिए बाकी के घर कच्चे और फूसवाले थे, उन राजपूतों के जिनके कपडे और जिनके घर उनकी गरीबी का इज़हार कर रहे थे लेकिन मूंछ की नोक आसमान की तरफ. सामन्तवाद की यह आवश्यक परिणति है. पर वे इसे समझ नहीं रहे थे. गाँव में सबसे समृद्ध परिवार के घर की महिलाओं को भी शौच के लिए अंधियारे में जाना पड़ता है. यहाँ चूँकि पानी का लेबल ऊपर है लेकिन गंदगी बहुत इसलिए सतह की गंदगी भी इस पानी में मिल जाती है. पेट के रोगी सबसे ज्यादा इसी टोले में मिले. लगभग हर घर में एक आदमी. अब गाँव के कुछ संपन्न लोगों ने कहा कि वे घर के आसपास टॉयलेट्स बनवाना चाहते हैं. ताकि बहुओं को सुविधा मिले.
शाम को हम चंचल जी के घर गए, जहाँ ‘माई’ रहती हैं. माई यानी चंचल जी की माँ. नब्बे साल की हैं और स्वस्थ भी. हमने उनके पैर छुये तो हमारे सिरों को चूमा और ढेर सारा आशीर्वाद दिया. उनकी सेवा के लिए उनकी बहू (चंचल जी की पत्नी) और तीन पतोहुएँ भी. पोते और पड़पोते भी. भरा-पूरा परिवार है. मकान खूब विशालकाय और पक्का. साथ में सोने के कमरों के साथ बाथरूम अटैच्ड. यहीं साझा रसोई है. ‘एल’ शेप में बने इस मकान का जो दूसरा हिस्सा है, वह ककई ईंटों का बना है, ऊपर खपड़ा है. इसका दरवाज़ा मेहराबदार और इतना मज़बूत कि एक हाथी का वार झेलने में सक्षम. इसे कोर्ट कहते हैं. चंचल जी के पुरखों ने पूरालाल नाम का यह गाँव बसाया था. गाँव के लोगों के लिए यह कोर्ट था. यहाँ सिर्फ यही दो मकान थे. बाकी चारो तरफ खेत, सरसों, गेहूं, चना, मटर और अरहर के. इन दो मकानों के सबसे करीब का टोला है बिंद लोगों का. वहां अधिकतर किसानों ने सब्जी उगाई थी. कुछ मछली मारने का व्यवसाय भी करते हैं. सई नदी करीब है और वह बरसाती नदी भी. गाय, भैंस और बकरी भी पालते हैं. लेकिन ये बिंद लोग भी सरसब्ज़ लगे. पक्के किसान हैं. यहाँ से हम पास की बरसाती नदी भी गए और गाँव के लोगों द्वारा बनाया बाँध देखा. नीलगाय और जंगली सूअर भी भिटाये.
शाम को माई ने हमें फिर बुलाया और गाय का ताज़ा दूध पिलाया, साथ में बर्फी, लड्डू और तिलकुट खिलाये. हम जब वापस समताघर को लौटे तो अँधेरा काफी हो गया था. रास्ता ठीक से दिख नहीं रहा था. जमीन के प्रति किसान इतना लालची हो गया है कि ग्राम समाज की जमीन भी कब्ज़ा ली है. अब बैलगाड़ी तो रही नहीं इसलिए कच्ची सड़कें लगातार सिकुड़ रही हैं. पगडंडी मेड़ में बदल गई हैं इसलिए चलने में परेशानी हो रही थी. खैर, हम कूदते-फाँदते आ ही गए. शाम को चंचल जी की महफ़िल में आज बंगाली डाक्टर साहब थे तो हरऊ, सलीम, रहमान और मटरू भी. चूँकि पंडितों ने इस बार 15 को मकर संक्रांति डिक्लेयर की थी इसलिए शाम को सामिष भोज्य कहीं मिला नहीं और अरहर की दाल, रोटी और चावल से संतोष करना पड़ा.
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