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भाजपा के पल्ले व्यंग नही पड़ता

के विक्रम राव 

यूं भी राजनीति से व्यंग और विनोद अब दूर होते जा रहें हैं. भाजपा सरकार ने इस दूरी को गहरा दिया है. अरूण जेटली  की शक्ल देखकर लगता है कि अंरडी का तेल पीकर आये है. नरेन्द्र मोदी  भी मुस्कराने की अदा में केवल ओंठ भर हिला देते है, मानो राशन लगा हो. 
अगर ऐसा न होता तो प्रकाश जावड़ेकर इन राहुल-कांग्रेस से माफी मांगने को न कहते. अचानक बौद्धिक हो गये इन कांगेसियों नें विदेश के नेताओं को गले से चिपकाने वाले मोदी के दो मिनटवाले बाडी-लेंगुवेज के वीडियो को जारी न कर दिया होता. सीने से सटाने की अदा मोदी की निराली है. अब नीरस नवाज शरीफ हों या सरस डोनाल्ड ट्रम्प . लेकिन दिल्ली हवाई अड्डे पर इसराइल के बेजामिन नेतनयाहू से जिस प्रकार भुजायें फैलाकर, दांत पिरोकर, मोदी मिले उसने कई राजनेताओं को तरसाया होगा. क्या उमंग, कैसी तरंग, कितनी उष्णता, इतना जिस्मानी सामीप्य? उफ!
अगर इन भाजपाइयों में अटल बिहारी वाजपेयी  वाली चुहलबाजी होती, संवदेनशीलता तथा संप्रेषण वाली, तो वे लोग भी जवाहरलाल नेहरू और इन्दिरा गांधी की विदेशी राष्ट्रनायकों से भेंट करतीं तस्वीरों का वीडियो तुरंत रवां कर देते. मसलन विप्लवी और रूमानी फिदेल कास्त्रो और इंदिरा गांधी के दरम्यान स्नेहिल अभिवादन, गर्म अगवानी वाली. याद कीजिये उस वाकये को जो तीन दशक पूर्व हुआ था. स्मृति में आज भी ताजा है. दिल्ली के विज्ञान भवन में निर्गुट राष्ट्राध्यक्षों के सातवें सम्मेलन (7 मार्च 1983) की नवनिर्वाचिता अध्यक्षा मेजबान इन्दिरा गांधी को निवर्तमान अध्यक्ष क्यूबा के राष्ट्रपति डाक्टर फिदेल कास्त्रों रूज़ ने मंच पर अभिवादन की मुद्रा में गले लगा लिया. पहले इन्दिरा गांधी तनिक सकुचाई, फिर ठिठकी, कुछ मुस्कराई और तब अपनी बाहें बढ़ा दीं. दूरदर्शन पर इस नज़ारे का अवलोकन करने वाले करोड़ो भारतीयों को तब लगा होगा कि यह टोपीधारी दढ़ियल राजनेता जरूर कोई हस्ती है. देखा देखी फिलिस्तीन के यासर अराफत ने भी नकल की . इन्दिरा गांधी आलिंगन से इनकार न कर पाई. अब चूंकि वे महिला थीं और दकियानूस भारत नरनारी की बराबरी अभी तक गवारा नही करता, अतः इंदिरा गांधी कुछ मर्यादा निभाती रही, कम से कम सार्वजनिक तौर पर. उनके पिताश्री पूर्णतया विमुक्त नेता थे, बिन्दास! राष्ट्रपति की पत्नी जेकेलीन कैनेडी, पमेला माउंटबैटन, नरगिस दत्त, तारकेश्वरी सिन्हा वे चन्द नाम है जिन के साथ नेहरु ने नरनारी की (लोहियावादी) बराबरी वाला सिद्धान्त लागू किया था. 
अब भाजपायी इतने प्रगतिवादी नहीं है कि घूंघट और पर्दा का खात्मा करदें, भले ही बुर्का को बन्द करा दें. अत: इस संदर्भ में भाजपा के महानतम और आगेदेखू नेता अटल बिहारी बाजपेयी की याद आती है. उन दिनों प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई और गृहमंत्री चरन सिंह का टकराव गंभीर हो गया था. अटल जी और उघोग मंत्री जार्ज फर्नाण्डिस लोकनायक जयप्रकाश नारायण से हस्तक्षेप की विनती लेकर कदम कुआं (पटना) गये. दिल्ली का यह वायुयान अमौसी (लखनऊ) में तब कुछ समय रूका करता था. रिपोर्टर लोग हवाई अड्डे गये खबर की खोज में. वहां पूछा एक ने: “अटलजी जनसंघ का जनता पार्टी में विलय के बाद कैसा बदलाव आया?” अपनी चिरपरिचित विनोदी अदा में मुस्करा कर अटल जी ने जवाब दिया, “बहुत बदले है हम जनसंघ के लोग. देख नही रहें है कितनी अधिक संख्या में महिलायें यहा आईं हैं.”
असली व्यंग तो अटल जी का था जब लखनऊ के एक इंटव्यू में एक महिला पत्रकार ने उनसे पूछा: “आपने विवाह क्यों नही किया?” अटल जी का उत्तर संक्षिप्त था: “आपका यह प्रश्न है अथवा प्रस्ताव?” अर्थात् आज के भाजपाइयों को ठसपना तजना होगा.
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