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कैसे पार हो अस्सी पार वालों का जीवन

अंबरीश कुमार 

पिछले दो दशक में ज्यादातर बड़े शहरों में लोग बड़े मकान छोड़ कर अपार्टमेंट में जा चुके है । कई अपने मकान बेचकर फ़्लैट में जाने की तैयारी में है । मुख्य वजह सुरक्षा और साफ सफाई में आसानी ।बड़े मकानों में सुरक्षा बड़ी समस्या तो है ही साथ ही चौकीदार और नौकर रखना पड़ता है ।पर सुरक्षा की फिर भी कोई गारंटी नहीं होती ।इसी वजह से लोग अपार्टमेंट में ज्यादा जा रहे हैं ।पर इस अपार्टमेंट में सबसे ज्यादा समस्या अस्सी पार के बुजुर्ग की है । सयुंक्त परिवार अब रहे नहीं । बुजुर्ग माता पिता को अपने बेटे बेटी के पास रहना पड़ता है । जीवन शैली बदली तो तरह तरह की समस्याएं भी ।अस्सी पार के बहुत से बुजुर्ग चलने फिरने में असमर्थ होते है खासकर जो गंभीर बिमारियों से जूझते हैं । ऐसे में वे खुद उठकर नहाने तक नहीं जा सकते ।इनके लिए बेटे बेटी के सामने सिर्फ दो ही विकल्प बचता है या तो किसी ओल्ड एज होम की सेवा ले या कोई नर्स रखे देखभाल के लिए । किसी घर में अगर पति पत्नी दोनों नौकरी कर रहे हों तो और समस्या । फ़्लैट में प्रवेश के लिए अमूमन एक ही रास्ता मिलता है । अगर कोई नर्स की सेवा लें तो फ़्लैट खुला रहेगा ।बुजुर्ग माता पिता को अकेले ही दिन गुजारना होगा । यह भी बहुत महंगी व्यवस्था है जो सिर्फ बहुत बड़े शहरों में ही उपलब्ध है ।एक नर्स को दिन में दस घंटे रखने का शुल्क पंद्रह  से बीस हजार आता है । नर्स की बजाय अगर अगर अप्रशिक्षित अटेंडेंट रखना हो तो भी एक शिफ्ट का दस से पंद्रह हजार रुपए तक देना पड़ सकता है । ये अटेंडेंट बुजुर्ग का नित्य कर्म करने में मदद करते है साथ ही व्हील चेयर पर आसपास घुमाने से लेकर खाना और दावा भी समय पर देते है । पर फ़्लैट में किसी बुजुर्ग को नीचे ले जाकर घुमाना आसान नहीं होता इसलिए बालकनी में कुछ देर बैठा दिया जाता है । जो लोग बड़े मकान में रहते हैं उनके यह सुविधा तो होती है कि बुजुर्ग को लान में कुछ देर घुमा दिया जाए । पर अपार्टमेंट में रहने वाले बुजुर्ग के लिए लिफ्ट से नीचे ले जाकर घुमाना आसान नहीं होता  । दो ,तीन या चार मंजिल वाले वे अपार्टमेंट जिसमे लिफ्ट न हो उसमे तो चार छह महीने भी चलने फिरने में असमर्थ बुजुर्ग को नीचे ले जाना संभव नहीं होता  ।ऐसे में में और समस्या पैदा हो जाती है  । मानसिक अवसाद से लेकर चिडचिडापन बढ़ जाता है । दिल्ली से लेकर कोलकोता तक दो तीन या चार मंजिल वाली सरकारी कालोनी में  लिफ्ट नहीं होती । इन फ़्लैट में रहने वाले परिवार में जो बुजुर्ग होते हैं वे फ़्लैट में ही कैद होकर रह जाते हैं ।खासकर जो व्हील चेयर पर निर्भर होते हैं ।
पर इससे भी बड़ी समस्या इस तरह के बुजुर्ग के लिए नर्सिंग आदि की सुविधा जुटाने की है । मध्य वर्ग भी किसी बुजुर्ग पर चालीस पचास हजार रुपए खर्च पाने की स्थिति में नहीं होता । अगर किसी बुजुर्ग को सरकारी नौकरी के चलते पेंशन मिलती है तो उससे काम चल जाता है ।पर जिन्हें यह सुविधा न हो उनका जीवन कष्टमय हो जाता है । स्वास्थ्य बीमा में भी इस तरह के लंबे नर्सिंग खर्च की कोई व्यवस्था नहीं होती ।इस पर सरकार को भी सोचना चाहिए और समाज को भी । अपने एक परिचित अमेरिका में नौकरी के लिए जो गए तो वही बस गए । इकलौते बेटे है । बुजुर्ग मां बाप को वीसा नहीं मिला । वे ओल्ड एज होम में चले गए । सरकारी नौकरी थी पेंशन से गुजरा हो गया । ओल्ड एज होम में ही पिता ने अंतिम सांस ली । बेटा अंतिम संस्कार तक में नहीं पहुंच पाया । ये तो उस पिता का हाल है जिसे करीब तीस हजार पेंशन मिलती थी । जिन्हें पेंशन न मिलती हो वे क्या करेंगे । और जिनका कोई बेटा बेटी न हो वे क्या करेंगे ।अस्सी पार का जीवन अब बहुत ज्यादा खर्चीला हो चुका है खासकर किसी लाचार बुजुर्ग के लिए । एक महीने में सिर्फ दस बारह हजार रुपए का तो डायपर ही इस्तेमाल हो जाता है ।क्योंकि इन्हें बार बार वाशरूम ले जाना संभव नहीं होता । स्वास्थ्य बीमा एजंसियों को इस दिशा में भी विचार करना चाहिए । सरकार को भी । इस हालात से तो सभी को एक न एक दिन गुजरना ही है । बेहतर हो इसकी कोई ठोस योजना बने ताकि बुजुर्ग भी सम्मान से अपना अंतिम समय गुजार सके ।नवभारत टाइम्स 
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