ताजा खबर
बिना बर्फ़बारी के निकल गया पौष रहीम की दास्तान सुनेगा लखनऊ भाजपा के पल्ले व्यंग नही पड़ता इस विरोध को समझें नीतीश जी
यहां अवैध शराब ही आजीविका है
पूजा सिंह
 
मंडला. मध्य प्रदेश के मंडला जिले के दो गांव पीपरटोला और जहरमऊ एक दूसरे से महज चंद किलोमीटर की दूरी पर मौजूद लेकिन एक दूसरे से एकदम अलग. बंभनी ब्लॉक के इन दो गांवों में से पीपरटोला की पूरी जवानी जहां अवैध शराब के कारोबार में बरबाद है वहीं जहरमऊ की ग्राम पंचायत ने शराब पर पूर्ण प्रतिबंध लगा रखा है. दोनों ही गांवों की अधिसंख्य आबादी परधान आदिवासी समुदाय की है.
पीपरटोला की प्राथमिक शाला में पिछले 22 सालों से अध्यापन कार्य कर रही शिक्षिका वंदना दुबे इसके लिए बेरोजगारी को जिम्मेदार मानती हैं. इसके अलावा मंडला शहर के नर्मदा का तटवर्ती शहर होने के कारण वहां शराबबंदी लागू है. ऐसे में पीपरटोला जैसे दूरदराज स्थित गांवों में शराब का कारोबार बहुत फायदे का सौदा बन गया है. हालात की भयावहता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पूरे गांव के माहौल में देसी शराब की गंध रचबस गयी है. हालांकि स्थानीय बंभनी थाना ऐसी किसी जानकारी से इनकार करता है लेकिन यह बात किसी से छिपी नहीं है. सामाजिक कार्यकर्ता त्रिवेणी सैय्याम कहते हैं कि प्रशासनिक लापरवाही के चलते यह समस्या भयावह रूप लेती जा रही है. सरकार को शराब को लेकर जागरूकता फैलानी चाहिए लेकिन उससे ज्यादा जरूरी है कि लोगों के लिए नौकरियों और स्वरोजगार के अवसर तैयार किये जायें.
बमुश्किल दो या तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित है गांव जहरमऊ. तकरीबन 3000 की आबादी वाले इस गांव में परधान अच्छी खासी तादाद में हैं. उसके अलावा यहां बैगा और अन्य जातियों के लोग रहते हैं. जहरमऊ के नाम में जरूर जहर जुड़ा है लेकिन इस गांव ने शराब पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा रखा है. गांव में शराब पीने वाले व्यक्ति पर पंचायत ने 500 रुपये का जुर्माना भी लगा रखा है. यह गांव वालों की स्वप्रेरणा है.
पोषण पर असर
परिवार के मुखिया में शराब की आदत और परिवार के बच्चों के पोषण का आपस में गहरा संबंध है. यह बात अनगिनत अध्ययनों से साबित और स्थापित हो चुकी है. ऐसे में उस वक्त हमें आश्चर्य नहीं हुआ जब हमारी मुलाकात गांव में दो अल्पपोषित बच्चों से हुई. आंगनबाड़ी कार्यकर्ता ने हमें अंश टेकाम और शालिनी टेकाम से मिलवाया जिनका वजन अपनी उम्र के मुताबिक औसत वजन से 5 किलो तक कम था. कई परिवारों में पुरुष सदस्य शराब के चलते काल के गाल में समा चुके हैं. त्रिवेणी सैय्याम कहते हैं कि पिता की शराब पीने की आदत पूरे परिवार को अलग-अलग तरह से प्रभावित करती है. परिवार के अन्य सदस्यों पर जहां इसका आर्थिक प्रभाव होता है वहीं बच्चों पर इसका असर पोषण की कमी के रूप में सामने आता है. ऐसे में सरकार अगर बच्चों के पोषण को समस्या मानकर कदम उठाएगी तो उसे सफलता नहीं मिलेगी यहां असल मुद्दा तो शराबखोरी और अवैध शराब का कारोबार है.
 
email ईमेल करें Print प्रिंट संस्करण
  • बिना बर्फ़बारी के निकल गया पौष
  • इस विरोध को समझें नीतीश जी
  • भाजपा के पल्ले व्यंग नही पड़ता
  • एअर इंडिया बेचने की तैयारी ?
  • शिवराज को गुस्सा क्यों आया?
  • रहीम की दास्तान सुनेगा लखनऊ
  • चार जजों की चिट्ठी !
  • हे प्रभु इतनी ऊंचाई न देना !
  • अंबानी को भी बरी कराया और राजा को भी !
  • पर्यावरण का यह अनुपम आदमी
  • राहुल को भी ज़िन्दगी जीने का हक़ है
  • बर्फ़बारी से बचेंगी हिमालयी नदियां
  • विकास से निकला ऐसा विकलांग बहुमत !
  • घर-आंगन में भी उगाएं सहजन
  • कैसे पार हो अस्सी पार वालों का जीवन
  • अब सबकी निगाह राहुल गांधी पर
  • कश्मीर में सीएम बना नहीं पाया तो कहां बनाएगा ?
  • राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष बने
  • गुजरात में एक नेता का उदय
  • डगर कठिन है इस बार भाजपा की
  • Post your comments
    Copyright @ 2016 All Right Reserved By Janadesh
    Designed and Maintened by eMag Technologies Pvt. Ltd.