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इस राख में अभी आग है !

अंबरीश कुमार 

लखनऊ .उत्तर प्रदेश नगर निकाय चुनाव में लोग चौंके हैं तो बहुजन समाज पार्टी के नतीजे से .जिसकी राष्ट्रीय अध्यक्ष जो संसद से भी बाहर है उन्होंने इस चुनाव के प्रचार में हमेशा की तरह कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई .पर भगवा लहर के सामने बसपा मजबूती से खड़ी हुई और दो शहर के मेयर पद पर इसके उम्मीदवार जीत चुके हैं .इस चुनाव में लोग मेयर के चुनाव को केंद्र में रख कर ही बात कर रहे है नगर पालिका को न जाने क्यों भूल जा रहे हैं .शहरी  इलाकों में भाजपा का दबदबा पहले से था और आगे भी रहेगा .शहरी बदहाली के बावजूद लोग शहर में भाजपा को वोट देते हैं  तो उसकी वजह पर फिर बात करेंगे .वैसे भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने निकाय चुनाव में स्टार प्रचारक थे .सपा बसपा ने कहीं झाँकने की भी जहमत नहीं उठाई .चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी के एक कद्दावर नेता से बात हुई तो उनका जवाब था ,यह चुनाव शहरी इलाकों का होता हैं जहां भाजपा का अच्चा नेटवर्क है ,सपा को इस चुनाव से कोई बहुत उम्मीद नहीं है .पर पालिका चुनाव में सपा ने भी बसपा के साथ कंधे से कंधा मिलकर मुकाबला किया है .यह नतीजो से दिख रहा है .नगर पालिका के 198 सीटों के नतीजे देख ले तो यह साफ हो जाएगा .बहरहाल चुनाव में भाजपा भी जिस बात को लेकर चिंतित हुई है वह बसपा की राख में सुलगती आग है .यह अंदाजा नहीं था कि बसपा फिर से खड़ी हो जाएगी .बसपा का खड़ा होना दलितों की घर वापसी का संकेत है .यह योगी और मोदी के दोनों के लिए चिंता की वजह बन सकते है .छह महीने पहले हुए चुनाव में ये दलित ही थे जिसके चलते मायावती हाशिये पर चली गई तो मोदी की लहर चल गई .भाजपा को सपा सूट करती है ,बसपा नहीं .सपा के साथ वे अहिर मुसलमान का हव्वा खड़ाकर नादान हिंदूओ को आसानी से लामबंद कर लेते है .पहली बार इस खेल में दलित भी फंसे और लगा बसपा अब हमेशा के लिए साफ़ हो गई .पर नगर निकाय चुनाव से बसपा खड़ी हुई है तो इसमें मायावती की उतनी भूमिका नहीं है जितनी बसपा कैडर और कांसीराम के आंदोलन की रही है .पर मायावती को इससे उर्जा मिलेगी यह भी साफ़ है .दरअसल सपा हो या बसपा इनका मौजूदा नेतृत्व अपने वोट बैंक के इजाफे की किसी रणनीति पर ठोस पहल करता तो दिखता नहीं .कोई राजनैतिक कार्यक्रम भी नहीं दिखेगा सिर्फ दिवंगत नेताओं की पुण्य तिथि के जमावड़े को छोड़कर .
अखिलेश यादव को लगता है मेट्रो और एक्सप्रेस वे से ही वोट मिलेगा जैसे भाजपाइयों को मुगालता है कि नोटबंदी और जीएसटी से उन्हें वोट मिलता है .वोट का गणित ही अलग है .भाजपा अभी भी मुस्लिम विरोधी वोट के चलते जीतती है .सपा का कोर वोट बैंक मुस्लिम यादव और अन्य पिछड़े और दलित है .पर सपा गैर यादव गैर मुस्लिम खांचे से बाहर सोच तक नहीं पाती .याद होगा दलित नौजवान नेता चंद्रशेखर के बर्बर उत्पीडन पर दोनों यानी सपा बसपा ने मुंह बंद कर लिया .वोट बैंक के विस्तार के बारे में जबतक ये दोनों दल नहीं सोचेंगे ,भाजपा से ठीक से मुकाबला नहीं कर पाएंगे .बसपा को इस  चुनाव में जो ताकत मिली है उससे वह अपने को आम चुनाव के लिए तैयार कर सकती है .शुक्रवार 
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