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ये नए मिज़ाज का लखनऊ है
हिमांशु बाजपेयी 
लखनऊ का ख़याल आते ही ज़हन में आमतौर पर एक रिवायती शहर की छवि उभरती है. सलीक़े से पेश आने वाला, शीरीं ज़बान बोलने वाला, अपनी तहज़ीब पर इतराने वाला, बात बात पर मीर-ओ-ग़ालिब के शेर सुनाने वाला शहर. मगर आज का लखनऊ अपने दामन में बहत सी ऐसी छवियां समेटे है, जो इसकी पारंपरिक छवि से बिल्कुल अलग हैं. एक ऐसी ही तस्वीर बनती है यहां होने वाले कल्चरल फेस्टिवल्स से. कभी अदबी महफ़िलों और नशिस्तों के गढ़ रहे इस शहर में आज-कल ग्रान्ड फेस्टिवल्स का जलवा है. ये सही हैं या ग़लत इस पर बहस हो सकती है पर इतना तय है कि ये पुराने दौर के लखनऊ से एकदम अलग हैं. ये लखनऊ के लिए एक बिल्कुल नया तजुरबा है. इन फेस्टिवल्स ने नशिस्तों और जलसों के पुराने तौर-तरीके और आदाब जो कभी लखनऊ की पहचान थे उन्हे पूरी तरह बदल दिया है और अब इन्हे नए सिरे से स्थापित कर रहे हैं. जो फेस्टिवल इस जद्दो-जहद के केन्द्र में रहा, इस बदलाव के लिए जिसकी सबसे ज़्यादा आलोचना और प्रशंसा हुई वो रेपर्टवा थिएटर फेस्टिवल है. बहुत जल्द जिसका आठवां संस्करण होने वाला है.
 
लखनऊ ने अलग अलग दौर में रंगमंच की दुनिया को बहुत से महत्वपूर्ण योगदान दिए हैं मगर लखनऊ कभी भी व्यावसायिक रंगकर्म और व्यवसाय के तौर पर रंगकर्म करने वाले लोगों के लिए उपयुक्त धरातल नहीं बन पाया. सन 2000 के बाद रंगमंच में विषयवस्तु, शिल्प, प्रदर्शन और अर्थशास्त्र के स्तर पर बहुत तेज़ी से बदलाव हुए हैं लेकिन लखनऊ इसके साथ कदम नहीं मिला पाया. यहां कुछ लोग ऐसे थे जो मानते थे कि लखनऊ के पारंपरिक मानस में ये नए प्रयोग जमेंगे नहीं, कछ लोग ये मानते थे कि थिएटर को पूर्णत: आम आदमी की चीज़ होना चाहिए. लेकिन इस सन्दर्भ में दो बातें सबसे अहम थीं. यहां टिकट ख़रीदकर नाटक देखने वाला दर्शक-वर्ग पर्याप्त तरीके से विकसित नहीं हो पाया. इसके अलावा सरकारी तंत्र के पास थिएटर को लेकर इस तरह की समझ ही नहीं थी कि वो इक्कीसवीं सदी के बदलते हुए रंगमंच को जनता के सामने लाने का माध्यम बन सके. नतीजा ये हुआ कि लखनऊ में फ्री इंट्री या मामूली टिकट दर वाले नाटक होते थे कि पारंपरिक बल्कि उससे भी ज़्यादा ऐसे विषयों पर होते थे कि जिन्हे सरकार से सहयोग मिल सके. क्योंकि जब टिकट न हों तो रंगकर्म के लिए इस तरह के सहयोग की अपेक्षा अनिवार्य हो जाती थी. 
इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में रेपर्टवा फेस्टिवल ने इस परिदृश्य में किसी विस्फ़ोट की तरह हाज़िर हुआ. इस फेस्टिवल ने बिल्कुल ग़ैर-पारंपरिक विषयों वाले व्यावसायिक नाटकों को लखनऊ में बुलाना शुरू किया. वो भी हर नाटक के लिए अपेक्षाकृत बहुत महंगी टिकटों के साथ. ये दोनो ही चीज़ें ऐसी थीं कि हंगामा होना लाज़िमी था. अक्सर इन नाटकों में मुंबईया सेलिब्रिटीज़ की भरमार होती थी. अंग्रेज़ी भाषा में, सेक्सुआलिटी, जेंडर रोल्स, टैबू सब्जेक्ट्स, नारीवाद, डिजिटल डिवाइड एवं पोस्ट-माडर्न विचार आधारित इतने सारे नाटकों के इतने सारे शो इतने सारे ताम-झाम और महंगे टिकट्स के साथ लखनऊ में पहले कभी नहीं हुए थे. लिहाज़ा ये बदलाव लखनऊ के सासंकृतिक जगत में व्यापक उथल-पुथल पैदा की. 'वेजाइना मोनोलॉग्स' पर तो इतना हंगामा हुआ कि मंचन ही नहीं हो पाया. 
रेपर्टवा का आठवां संस्करण होने वाला है. इसके पहले संस्करण से ही ये दो सवाल लखनऊ की फिज़ा में तैर रहे हैं. आलोचक कहते हैं कि इतनी क़ीमत का टिकट एक ख़ास आर्थिक पृष्ठभूमि वाले लोग ही ख़रीद सकते हैं. तो इस फेस्टवल में आम आदमी के लिए क्या है ? वहीं रेपर्टवा पूछता है कि टिकट न लगाया जाए तो इन नाटकों को लखनऊ में बुलाने का और क्या तरीका है. इस बार के फेस्टवल में लाइव म्यूज़िक और स्टैण्ड-अप कॉमेडी का फेस्टिवल भी शामिल रहेगा. बैंड म्यूज़िक अथवा स्टैण्ड-अप कॉमेडी का ये तजुरबा भी लखनऊ के लिए बिल्कुल नया होगा. नाटक, संगीत और स्टैण्ड-अप कॉमेडी के कुल 28 टिकेट आधारित प्रस्तुतियां होंगी, इनमें 150 से ज़्यादा कलाकार शामिल रहेगें, जिनमें से बेशतर लखनऊ में पहली बार परफॉर्म करेंगे. इसके अलावा रेपर्टवार की तरफ़ से 200 से ज़्यादा लोग आयोजन-दल का हिस्सा हैं, जो एक हफ़्ते तक कुल 22000 लोगों को टिकट के साथ इस फेस्टिवल तक लाने की कोशिश करेंगे. ये भव्यता लखनऊ की सांस्कृतिक संस्कृति में कोई इतराने लायक बात कभी नहीं रही. नवाबी दौर में इसकी मिसालें ज़रूर ढूंढी जा सकती हैं परंतु उस दौर में भी मीर तक़ी मीर का तीखा प्रतिरोध इसके प्रति मिलता है. इसी शहर में प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन में प्रेमचंद ने इस भव्यता की ज़ोरदार आलोचना करते हुए कहा था कि साहित्यकार का काम केवल महफिलें सजाना नहीं है, न ही साहित्य सिर्फ अमीरों के लिए होना चाहिए. सौन्दर्य का मापदण्ड बदलने की ज़रूरत है.
ये फेस्टिवल लखनऊ का एक नया चेहरा है. वो चेहरा जो बदलते हुए वक़्त ने तैयार किया है. लखनऊ के पुराने चेहरे से ये नहीं मिलता मगर इसके बावजूद ये आज के लखनऊ का चेहरा है.
भारतीय पत्रकारिता महोत्सव के लोगो का विमोचन
इंदौर. भारतीय पत्रकारिता महोत्सव-20१७ के लोगो का विमोचन मप्र विधानसभा के अध्यक्ष डॉ. सीतासरण शर्मा ने किया। प्रारंभ में स्टेट प्रेस क्लब, मप्र के अध्यक्ष प्रवीण कुमार खारीवाल ने बताया कि मूर्धन्य पत्रकार राहुर बारपुते, राजेंद्र माथुर, प्रभाष जोशी, शरद जोशी और माणकचंद वाजपेयी की स्मृति में इंदौर में २३-२४ एवं २५ दिसंबर को आयोजित होने जा रहे इस महोत्सव में देशभर के 150 से अधिक वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक हिस्सा लेंगे। आयोजन समिति के सचिव कमल कस्तूरी ने विधानसभा अध्यक्ष को महोत्सव में पधारने का निमंत्रण दिया। इस मौके पर विधानसभा के प्रमुख सचिव अवधेश प्रताप सिंह भी विशेष रूप से मौजूद थे। अध्यक्ष डॉ. शर्मा ने आयोजन की सफलता के लिए अपनी शुभकामनाएं प्रेषित की। इस अवसर पर स्टेट प्रेस क्लब के पदाधिकारी संजीव श्रीवास्तव, अजय भट्ट, सुनील जोशी, आकाश चौकसे, प्रबुद्ध दुबे, शीतल राय एवं सोनाली यादव भी मौजूद थी।
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