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जज की हत्या और मीडिया का मोतियाबिंद
महेंद्र मिश्र 
बृजगोपाल लोया अब महज नाम नहीं बल्कि एक सवाल है जो इस देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के माथे पर चिपक गया है। और ये ऐसा दाग है जिसे अगर छुड़ाया नहीं गया तो पूरी व्यवस्था कलंकित दिखेगी। लिहाजा कलंक के इस टीके को हटाना व्यवस्था में बैठे हर जिम्मेदार और जवाबदेह शख्स की जिम्मेदारी बन गयी है। बृजपाल कोई सामान्य शख्स नहीं थे वो सीबीआई की स्पेशल कोर्ट के जज थे। इस देश की सबसे ताकतवर खुफिया एजेंसी। उसके जज की मौत होती है। मौत संदेहास्पद है। कड़ी दर कड़ी चीजें अब सामने आ रही हैं। बावजूद इसके पूरा सन्नाटा पसरा हुआ है। न मुख्यधारा का मीडिया मामले को उठाने के लिए राजी है। न ही न्यायपालिका इसका संज्ञान ले रही है। सत्ता तो सत्ता विपक्ष का कोई एक शख्स तक जुबान खोलने के लिए तैयार नहीं है। चंद लोगों को छोड़ दिया जाए जिन्होंने शायद मौत को जीत लिया है या फिर न्याय के पक्ष में खड़े हुए बगैर उन्हें चैन की नींद नहीं आती! वरना चारों तरफ सन्नाटा है। आखिर किस बात का डर है? क्या सामने मौत दिख रही है? या फिर हमारी व्यवस्था पूरी तरह से आपराधिक हो गयी है जिसमें गोडसों की पूजा ही उसकी अब नियति है। या फिर पूरे लोकतंत्र पर अपराधियों का कब्जा हो गया है। ये मामला सबसे पहले सीबीआई का मामला बनना चाहिए था क्योंकि उसके जज की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हुई थी। चलिए अगर उस पर किसी तरह का दबाव था तो उसके बाद न्यायिक संस्थाओं को इसे संज्ञान में लेना चाहिए था। क्योंकि उसके एक सदस्य की मौत हुई थी। न्यायिक तंत्र ने ये क्यों नहीं सोचा कि आज लोया हैं कल उनमें से किसी दूसरे की बारी होगी। और सत्ता तो सत्ता इस देश का विपक्ष क्या कर रहा है? किसी एक भी खद्दरधारी ने अब तक जुबान नहीं खोली है। लेकिन लोया की मौत पर ये चुप्पी भयानक है। ये ऐसी चुप्पी है जो और ज्यादा डर पैदा कर रही है। और अगर ये बनी रही तो डर का खतरा और बढ़ता जाएगा।
 
लोया की बहन और उनके पिता।
 
कारवां के रिपोर्टर निरंजन टाकले ने पूरे मामले को खोल कर रख दिया है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि मुंबई की पूरी न्यायिक बिरादरी मामले को जानती थी और जानती है। अनायास नहीं लोया के दाह संस्कार में जाते समय उनकी पत्नी और बेटे को चुप रहने की सलाह उनके साथ ट्रेन में जा रहे तत्कालीन जजों ने ही दी थी। और तब से जो दोनों चुप हैं तो आज तक उन्होंने मुंह नहीं खोला। सामने आयी हैं लोया की बहन अनुराधा बियानी और उनके 83 वर्षीय पिता हरिकिशन लोया। बहन जिन्हें शायद अपने भाई के लिए न्याय दिलाना अपनी जान से भी ज्यादा जरूरी लगा। और पिता जिन्हें अब अपनी मौत का डर नहीं है। लिहाजा दोनों ने मौत के भय की दीवार को तोड़ दिया है। और अब उनके जरिये जो बातें सामने आ रही हैं उससे जिम्मेदार और जवाबदेह लोगों का मुंह चुराना और चुप रहना सबसे बड़ा अपराध होगा।
 
पूरा मामला शीशे की तरह साफ है। सोहराबुद्दीन एनकाउंटर का मुकदमा गुजरात की एक अदालत में चल रहा था। लेकिन न्याय न मिल पाने की आशंका पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा उसे मुंबई भेजा गया था। लोया के पहले जज उत्पट उसकी सुनवाई कर रहे थे। मामले के मुख्य अभियुक्त बीजेपी नेता अमित शाह सुनवाई के दौरान कई बार अदालत में उपस्थित नहीं हुए। हिदायत देने के बाद भी लगातार तीन सुनवाइयों में वो नदारद रहे। फिर उत्पट ने शाह के वकील को बाकायदा चेतावनी के लहजे में आरोपी को कोर्ट में उपस्थित कराने का निर्देश दिया। इसका नतीजा ये हुआ कि अगली घोषित सुनवाई की तारीख से ठीक एक दिन पहले जज उत्पट का तबादला हो गया। फिर लोया ने उत्पट का स्थान लिया। उन्होंने शुरू में शाह को उपस्थिति की छूट दी। और वो उनके वकील के जरिये मामले को देखते रहे। लेकिन उनकी छूट भी एक व्यवस्था और शर्त के तहत थी। एक समय मुंबई में मौजूद होने के बाद भी शाह जब सुनवाई के दिन कोर्ट में उपस्थित नहीं हुए। तो लोया ने इसे गंभीरता से लिया और उन्होंने बचाव पक्ष के वकील की जमकर मजम्मत की।
इस बीच लोया अपनी ही न्यायिक बिरादरी के एक जज की बेटी की शादी में शामिल होने के लिए नागपुर जाते हैं। बताया जाता है कि वहां जाने की उनकी इच्छा नहीं थी। लेकिन दो अन्य जज दबाव बनाकर उन्हें ले गए। ये सब नागपुर में एक सरकारी गेस्ट हाउस में रुकते हैं। अचानक उनके दिल का दौरा पड़ने की बात सामने आती है। फिर यहां के बाद से जो कुछ भी होता है उसे सामान्य घटनाओं की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है। मसलन दिल का दौरा पड़ने पर उन्हें सामान्य आटो में एक ऐसे अस्पताल में ले जाया जाता है जहां ईसीजी की कोई सुविधा ही नहीं थी। एक सरकारी गेस्ट हाउस जहां वीवीआईपी लोग रुके हों। वहां एक चार पहिया गाड़ी का भी न होना कई सवाल खड़े करता है। एक सामान्य जज के लिए प्रोटोकाल होता है लोया तो सीबीआई जज थे। फिर वो सब कहां गया और क्यों नहीं मुहैया हो पाया? उसके बाद उन्हें एक दूसरे अस्पताल में ले जाया गया जहां पहुंचने पर पहले से ही मृत घोषित कर दिया गया। इस बीच मौत रात में हो गयी थी लेकिन एफआईआर में सुबह का समय बताया गया है। इस पूरी घटना के दौरान न तो किसी ने उनके परिजनों से संपर्क करने की कोशिश की न ही किसी ने फोन किया। सुबह आरएसएस के किसी बहेती का फोन उनके पिता और पत्नी के पास गया। जिसमें कहा गया था कि उन्हें आने की जरूरत नहीं है। और शव को उनके पास भेज दिया जा रहा है। और सबसे खास बात ये है कि लोया के पोस्टमार्टम के बाद हासिल रिपोर्ट के हर पन्ने पर एक ऐसे शख्स का नाम दर्ज है जिसे उनका ममेरा भाई बताया गया था। जबकि परिजनों का कहना है कि इस तरह के किसी शख्स का उनके साथ दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं है। 
 
इस बीच उन जजों की क्या भूमिका रही इसका कोई सुराग नहीं मिला। उन्होंने लोया के परिजनों से कोई संपर्क नहीं किया। न ही लोया के कथित दिल के दौरे के दौरान वो उनके साथ मौजूद दिखे। यहां तक कि अगले एक महीने तक लोया के परिजनों से उन्होंने कोई संपर्क तक नहीं किया। पोस्टमार्टम के बाद लोया के शव को लावारिस लाश की तरह एक एंबुलेंस में उनके गांव भेज दिया गया। जिसमें इंसान के नाम पर महज एक ड्राइवर था। उनके परिजनों से ये भी नहीं पूछा गया कि उनका दाह संस्कार कहां होगा? मुंबई में या फिर उनके पैतृक स्थल पर या फिर कहीं और? लोया की डाक्टर बहन ने जब अपने भाई का शव देखा तो उनके गले के नीचे खून के धब्बे थे। उनके पैंट की बेल्ट बेतरतीब बंधी थी। उनका कहना था कि उनके भाई को हृदय संबंधी कभी कोई समस्या नहीं थी। लिहाजा हार्ट अटैक का कोई सवाल ही नहीं बनता।
 
इसके साथ ही बहन और पिता ने एक सनसनीखेज खुलासे में पूरे मामले की जड़ को सामने ला दिया है। उन्होंने बताया कि तब के मुंबई हाईकोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश मोहित शाह ने पक्ष में फैसला देने के लिए लोया को 100 करोड़ रुपये का आफर दिया था। इसके साथ ही मुंबई में मकान से लेकर किसी तरह की प्रापर्टी का प्रस्ताव दिया गया था। लोया के पिता के मुताबिक उन्होंने दीवाली के मौके पर परिवार के सभी सदस्यों की मौजूदगी में इसे बताया था। लेकिन लोया उसके लिए तैयार नहीं थे। उन्होंने गांव में खेती कर जीवन गुजार लेना उचित बताया था बनिस्पत इस तरह के किसी अन्यायपूर्ण और आपराधिक समझौते में जाने के। उल्टे वो केस की और गहराई से छानबीन और अध्ययन में जुट गए थे। जिससे किसी के लिए ये निष्कर्ष निकालना मुश्किल नहीं था कि वो इस मसले पर किसी भी तरह के समझौते के मूड में नहीं थे।
 
 
मुख्य न्यायाधीश को लेना पड़ेगा संज्ञान
कार्यपालिका के मुखिया को निभानी होगी अपनी जिम्मेदारी
 
शायद यही बात उनके खिलाफ चली गयी। और फिर उसका अंजाम उनकी मौत के तौर पर सामने आया। मौत के बाद लोया के स्थान पर आए जज ने शाह को बाइज्जत मामले से बरी कर दिया। फैसला उस दिन आया जब पूरे देश में क्रिकेटर एमएस धोनी के सन्यास लेने की खबर चल रही थी। लिहाजा पूरा मामला मीडिया की नजरों से ओझल रहा। और सुर्खियां बनने की जगह इलेक्ट्रानिक चैनलों की पट्टियों तक सिमट कर रह गया।
 
ये किसी और की नहीं बल्कि सीधे सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की जिम्मेदारी बनती है कि वो अपने एक सदस्य को न्याय दिलाने के लिए मामले का संज्ञान लें। ये दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के कार्यकारी मुखिया की जिम्मेदारी बनती है कि संसद के सामने टेके गए मत्थे की लाज रखें। और अगर सत्ता और न्यायिक व्यवस्था इसका संज्ञान नहीं लेते हैं तो ये जिम्मेदारी विपक्ष की बनती है कि वो अपने मुंह पर लगी पट्टी हटाए और लोकतंत्र को बचाने के लिए आगे आए। और ये जिम्मेदारी उस मीडिया की बनती है कि वो मामले को तब तक उठाता रहे जब तक कि लोया और उनके परिजनों को न्याय न मिल जाए। ऐसा नहीं हुआ तो पूरी व्यवस्था से लोगों का भरोसा उठ जाएगा और फिर ये इस देश और उसके लोकतंत्र के लिए बेहद घातक साबित होगा। जनचौक से साभार  
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