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कहानी एक पहाड़ी शहर की कुशीनगर में लोकरंग का रंग कौन हैं ये तिरंगा वाले रीढ़ वाले संपादक थे निहाल सिंह
साफ़ हवा के लिए बने कानून

नई  दिल्ली  । दीपावली के समय सर्वोच्च न्यायालय के दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण के कारण पटाखों पर प्रतिबंध वाले आदेश पर देश भर में इसे धर्म से जोड़ते हुए बहुत बहस हुई । हिंदू संगठनों ने जोर शोर से अभियान चलाया की पटाखे चलाओ और खूब चलाओ । अफसोस है की हम प्रदूषण जैसी भयानक समस्या पर भी राजनीति करते हैं।  नतीजा हमारे सामने हैं ।  विभिन्न अदालतों के निर्णय को प्रदूषण नियंत्रण के उपायों को एक तरफ करके हम जब पानी सर से ऊपर हो गया तब मूल समस्या के समाधान की ओर ना जाकर फिर से कुछ करने का दिखावा कर रहे हैं । ऐसा भी नहीं कि सरकारों की नियत साफ ना हो । किंतु केंद्र, दिल्ली व् पडोसी राज्यों की सरकारों में आपसी तालमेल ना होना व्दोषारोपण की राजनीति के कारण आज स्थिति इतनी खराब कर दी है कि दिल्ली के निवासियों के जीवन को दांव पर लगा दिया गया है । 

दिल्लीवासियों में भी खासकर गरीबों का जीवन, सड़क पर रहने वाले मजदूर, रिक्शा वाले, कूड़ा बीनने वाले ऐसे तमाम वर्गों के लोग जिनके पास एक बंद घर भी नहीं है, के जीवन को हमने दाव पर लगा दिया है । प्रदूषण को रोकने के लिए कारो के लिए ऑड-ईवन जैसे उपायों की बात होती है जो कि ऊंट के मुंह में जीरे जैसी बात है। पिछले कुछ सालों से पड़ोसी राज्यों के किसानों पर पराली जलाने से प्रदूषण फैलाने का इल्जाम लगाया जा रहा है किंतु पूसा संस्थान, पंतनगर या ऐसे अनेक कृषि विश्वविद्यालयों संस्थानों में कोई भी ऐसा अध्ययन शायद नहीं किया और यदि किया भी है तो वह सामने नहीं आ पाया जो यह बताता की पराली को बिना जलाए कैसे उपयोग में लाया जाए । महंगी खेती, सस्ती कृषि उपज, पानी, खाद जैसी तमाम समस्याओं से जूझते किसानों पर अब मुकदमे लगाए जा रहे हैं । किसान क्या करे जब खेती में पशुओ की जरूरत ही ख़त्म होती जा रही है । कुल मिलाकर गरीबो और किसानो पर ही मार । उद्योग बंद किये जाते है तो भी गरीब मजदूरों पर ही असर आयगा ।

पराली तो बहुत समय से जलाई जाती है उसके भी अनेक कारण हैं खेत खाली करना है किंतु दिल्ली में जो तीव्र घनीभूत आबादी का रहना, उद्योगों का बढ़ना, तेजी से बढ़ता सड़क निर्माण कार्य व अनियंत्रित मकान आदि का निर्माण कार्य, सार्वजनिक वाहनों की कमी व् अनियंत्रित होती जा रही वाहनों की आबादी, वनभूमि व अन्य भूमि पर समुचित वृक्षारोपण का अभाव जैसे कारणों को क्यों नहीं देखा गया है?

अफसोस की बात है फिर भी सरकार जो नियम नीतियां बना रही है उससे गरीबों पर, गरीबों की जिंदगी पर कोई अच्छा प्रभाव नहीं पड़ने वाला । उनके जीवन रक्षण की कोई बात, कोई नीति नहीं । शायद इसलिए की नीति बनाने वाले उनकी समस्याओं तक पहुंच नहीं पाते, नतीजा होता है की प्रदूषण से बचाव की बात सिर्फ मध्यम और उच्च वर्ग तक सीमित मानी जा रही है ।

ध्यान देने को जरूरी है-

·       ध्यान रहे की स्कूल बंद करने से सभी बच्चों का स्वस्थ्य संरक्षण नही होगा क्यूंकि बच्चों की एक बड़ी आबादी खुले में ही रहतीहै ।

·       कारो के लिए ऑड ईवन से प्रदुषण से ज़्यादा सडको को जाम से मुक्ति मिली । नुकसान भी हुए । भले ही हम उसकी उपयोगिता को नकार नहीं सकते किन्तु जरूरत एक बेहतर विकल्प की है ।

·       दिल्ली की आबादी का वह बड़ा हिस्सा जो बिना छत के रहता है या जिसकी छोटी सी छत के नीचे बड़े-बड़े परिवार रहते हैं उसको हर योजनामें सामने रखना होगा ।

·       प्रदूषित इकाइयों को बंद करना भी बेहतर विकल्प नहीं होगा क्योंकि उसका असर उसमें काम करने वाले मजदूरों और उनकी जीविका पर होगा । बल्कि बेहतर होगा कि इन इकाइयों पर तुरंत प्रदूषण नियंत्रण यंत्र आदि लगाए जाएं जिसकी कड़ी निगरानी होनी चाहिए ।

·       वास्तव में प्रदूषण बढ़ाना और जानबूझ कर बढ़ाना तो गैर इरादतन हत्या का जन्म होता है ।

·       हमें आज ही जलस्त्रोतों जलभंडारों जलप्रभावों को भी प्रदूषणमुक्त रखने का कड़ी योजना बनानी होगी हम धर्म के नाम पर मजहब के नाम पर किसी को भी इस बात की इजाजत नहीं दे सकते की सदियों से जिन जलस्त्रोतों ने हमें जीवन दिया है उन्हें अब नष्ट कर दिया जाये ।

·       पानी के पुनः इस्तेमाल और संरक्षण के विकल्पों को इस्तेमाल करना चाहिए ।

·       सडको और अन्य तरह के निर्माण जैसे मेट्रो, फ़्लाइओवर, बड़े बड़े बिल्डिंग काम्प्लेक्स आदि के निर्माण के दौरान प्रदूषण रोकने के उपाय किए जाएँ, और ज़रूरत पड़ने पर कुछ समय के लिए काम रोके भी जाएँ ।

कुछ उपाय-

·       पराली पर अध्यन की जरूरत, पराली के मुद्दे पर सरकार किसानो की मदद करे न की मुकद्दमे करे । 

·       जल संरक्षण के कारगर उपाय और पुराने जलाशयों का पुनर्निर्माण व पुनरुद्धार ।

·        चौड़ी पत्ती के व् पपीता, आवला, निम्बू, बेल जैसे फलदार वृक्ष तथा तुलसी, एलोवेरा व अन्य स्वास्थ्यवर्धक प्रदूषण नियंत्रक पेड़ पौधों का लगाने जैसे उपाय हैं । जिन पर दिल्ली सरकार को जनसंगठन ने २०१६ में विस्तृत योजना सहित पत्र भेजा है किंतु उस पर कोई कार्यवाही होती नजर नहीं आई ।

·       उद्योगों पर प्रदूषण नियंत्रण यंत्र के संदर्भ में युद्ध स्तर पर कड़ी व त्वरित कार्यवाही होनी चाहिए । कर्मचारियों व ऑफिसरो को इसके लिए ईनाम जैसे प्रोत्साहन देने चाहिए । जो ऑफिसर इसमें दोषी पाए जाएं उन पर कड़ी कार्यवाही होनी चाहिए उन पर जुर्माना लगना चाहिए ।

इस समस्या में हमें साथ खड़े होने की जरूरत है न कि इस को किसी भी तरह के राजनैतिक या धार्मिक चश्मे से देखने की आइए हम संकल्प करें कि प्रदूषण के खिलाफ गैर राजनीतिक गैर धार्मिक उन्मादी पहल करें ताकि हम दिल्ली को जो कि संसार के सबसे बड़े प्रजातंत्र की राजधानी है जीने योग्य बनाएं रहने योग्य बनाएं । आज ज़रूरत इस बात की भी है है की प्रदूषण की समस्या पूरे देश में बढ़ी है और लोगों के जीवन पर असर कर रही है इसलिए स्वच्छ हवा का अधिकार को संविधान के 21 धारा के मुताबिक़ मौलिक अधिकार का दर्जा देना चाहिए और Right to Clean Air Act, सरकार को तुरंत पारित करना चाहिए ।जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय (एनएपीएम)

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