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नेहरू से कौन डरता है?
विभूति नारायण राय
करीब चार वर्ष पहले, जब अच्छे दिनों की आहट  अभी सुनायी  ही देनी शुरू हुई थी, केरल के एक संघ प्रचारक ने लिखा कि गांधी की नहीं नेहरू की हत्या की जानी चाहिए थी. यह मात्र  दिल्ली की सत्ता हासिल करने से उपजा आत्मविश्वास ही नहीं था बल्कि इसके पीछे छिपा हुआ यह दुःख भी था कि लाल किले पर अकेला झंडा फहराने का मौका उन्हें इतनी  देर से मिल रहा है.  यह हताश क्रोध शून्य से नहीं उपजा था. भारतीय समाज, राजनीति और जीवन में बहुत कुछ ऐसा प्रगतिशील बचा हुआ है जिसका श्रेय जवाहर लाल नेहरू को मिलना चाहिए और जिसने इतने दिनों तक संघ परिवार को सत्ता से वंचित रखा था.
मैं हमेशा सोचता रहा हूं कि 1947 में यह कैसे संभव हो सका होगा कि सांप्रदायिक हिंसा के तांडव के बीच जन्में एक शिशु राष्ट्र ने अपने को धर्मनिरपेक्ष घोषित कर दिया. एक करोड़ से अधिक लोगों के विस्थापन और लाखों लोगों की लाशों पर निर्मित हो रहे इस राष्ट्र के नायकों ने किस तरह बगल में एक धर्माधारित राष्ट्र के निर्माण के बाद भी  खुद को धर्मनिरपेक्ष बनाये रखने का फैसला लिया होगा? इस प्रश्न का उत्तर तलाशते हुए मुझे बार-बार जवाहर लाल नेहरू के पास जाना पड़ा और कुछ वर्षों पूर्व  प्रकाशित रामचंद्र गुहा की पुस्तक इंडिया आफ्टर गांधी तथा विभाजन के समय संसद में  जवाहर लाल नेहरू के दिये गये  भाषणों से इस गुत्थी को सुलझाने में मुझे मदद मिली.
26 जनवरी 1950 को लागू संविधान ने भारत को एक धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र जरूर घोषित कर दिया था किंतु इसे वैधता प्रदान करने के लिए इस पर जनता की मुहर लगानी जरूरी थी. साल 1952 की शुरूआत में हुआ पहला आमचुनाव इसी परीक्षा की घड़ी थी. कांग्रेस ने पुरुषोत्तम दास टंडन को हटाकर जवाहर लाल नेहरू को अपना अध्यक्ष चुन लिया और उनके कंघों पर चुनावी वैतरणी पार कराने की जिम्मेदारी डाल दी.
नेहरू ने 1951 के दौरान देश भर में 300 से अधिक सभाएं की. जालंधर से शुरू कर देश के चारों कोनों  में होने वाली ये सभाएं जनता से एक बड़े राजनेता के सीधे संवाद का अद्भुत नमूना थीं. इन सभाओं में वे आसान हिंदुस्तानी में विशाल संख्या में उमड़ने वाले  जनसैलाब से सिर्फ एक ही प्रश्न पूछते कि उन्हें कैसा भारत चाहिए- एक धर्मनिरपेक्ष, प्रगतिशील और आधुनिक भारत या धर्माधारित और  पिछड़ी दृष्टि वाला हिंदू राज? यह प्रश्न ऐसे समय में पूछा जा रहा था जब दो राष्ट्रों के सिद्धांत के आधार पर देश का विभाजन अभी हुआ ही था और बड़ी संख्या में हिंदू तथा सिक्ख लुटे-पिटे पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान से भारत आ रहे थे. इन खस्ता हाल लोगों के पास उनके अपने आख्यान  थे और अधिकतर मामलों में अतिरंजित इन आख्यानों के कारण देश का माहौल कैसा विषाक्त होगा इसकी कल्पना की जा सकती है. ऐसे समय में कितना कठिन रहा होगा एक राजनेता के लिए घंटे सवा घंटे के अपने भाषण से निरक्षर लोगों को यह समझाना कि उनकी तरक्की और उज्जवल भविष्य के लिए देश का धर्मनिरपेक्ष होना निहायत जरूरी है. पर यह असंभव लगने वाला काम नेहरू ने किया और रामचंद्र गुहा ने इन सभाओं की दूसरे दिन अखबारों में छपी रिपोर्टों का विश्लेषण कर उपस्थित जन मानस पर पड़े प्रभाव का विश्लेषण किया तो वे खुद ही चकित रह गये. बीस प्रतिशत से कम साक्षरता वाले देश में सिर्फ अपनी वक्तृता से श्रोताओं को समझा पाना कि नव निर्मित राष्ट्र राज्य की सलामती सिर्फ धर्म निरपेक्ष बने रहने में है, कितना मुश्किल रहा होगा पर नेहरू ने यह असंभव लगने वाला काम कर डाला. नतीजतन 1952 के पहले आमचुनाव में धर्मनिरपेक्षता की समर्थक कांग्रेस और सी. पी. आई. को मिलाकर चार सौ से अधिक सीटें मिली जब कि हिंदू राज बनाने के लिए चुनाव लड़ी हिंदू महासभा, रामराज्य परिषद और भारतीय जनसंघ कुल दस स्थान जीत सके. चुनाव परिणामों ने धर्म निरपेक्ष संविधान पर मुहर लगा दी और इसके लिए संघ परिवार ने नेहरू को कभी माफ़ नहीं किया.
संघ परिवार ने नेहरू को और भी कई कारणों से माफ़ नहीं किया. उनकी उपस्थिति संघ की उस विश्व दृष्टि के खिलाफ जाती थी जो वर्ण व्यवस्था और लैंगिक असमानता पर आधारित राम राज्य स्थापित करना चाहती थी. गांधी के रामराज्य से भिन्न संघ परिवार के इस रामराज्य में स्त्रियों, शूद्रों और धार्मिक अल्पसंख्यकों की नियति द्वितीय श्रेणी के नागरिक से अधिक कुछ नहीं होती.
कांग्रेस में पिछड़ी दृष्टि वाले हिंदूओं की संख्या कम नही थी और नेहरू को पग पग पर उनसे जूझना पड़ा. हिंदू कोड़ बिल ऐसा ही एक उदाहरण है जब महिलाओं को बराबरी के कुछ अधिकार देने का प्रयास इन्हीं तत्वों के विरोध के कारण असफल हो गया और खीज कर डाक्टर आंबेडकर को नेहरू से अपनी राहें जुदा करनी पड़ी.  योजना आयोग और समाजवादी अर्थ व्यवस्था पर आधारित विकास का माडल भी धुर दक्षिण पंथी नहीं पचा सके.
यह अलग और विस्तृत अध्ययन का विषय हो सकता है कि नेहरू कि सदिक्षाओं के बावजूद भारत एक आदर्श धर्म निरपेक्ष गणराज्य क्यों नहीं बन पाया और कैसे छह दशकों के भीतर ही ऐसी स्थितियां बनी कि नेहरूवियन माडल अप्रासंगिक सा लगने लगा? नेहरू के इस अवदान को नही भुलाया जा सकता कि उनकी राजनीति ने लंबे अरसे तक सांप्रदायिक शक्तियों को लाल किले से दूर रखा.
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