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आदिवासियों के बीच एक दिन
सतीश जायसवाल 
आपसदारियां रचना समूह ने 28-29 अक्टूबर के अपने कवर्धा पड़ाव का पहला पूरा दिन चिल्फी और इस बैगा जनजातीय गांव -- बेलापानी में बैगा लोगों के साथ बिताया।उन लोगों ने अपनी बनाई खुम्हरी मुझे पहनाकर पारम्परिक ढंग से हमारा स्वागत किया और आत्मीय भाव से हमें अपनाया भी।धूप और बारिश में सर को ढकने वाली खुम्हरी बनाना भी छत्तीसगढ़ की लोक कला परंपरा से जुड़ी हुई कला है।वह इस बैगा बहुल अंचल में अभी बची हुई है।
बेलापानी चिल्फी से लगभग 15 किलोमीटर दूर है।और इस गांव तक पंहुचाने वाला पहाड़ी रास्ता दुर्गम है।कोई डेढ़-दो किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है।बीच में पतली जल धारा वाली एक पहाड़ी नदी पार करनी पड़ी।खड़े खेतों के बीच से भी होकर निकलना पड़ा।यह तो अच्छा हुआ कि 24 तारीख को ही भूपेश वैष्णव के साथ यहां आकर हम लोग एक तरह से प्री-सर्वे करके जा चुके थे।सब कुछ देख- भाल कर और गांव के लोगों से मिल-बात करके।गांव के लोग भूपेश वैष्णव को अपना मानते हैं।पहाड़ी नदी के किनारे बसा होने के बावजूद बेलापानी पीने के पानी के संकट से ग्रस्त था।तब भूपेश वैष्णव और उनकी संस्था-- शिखर युवा मंच ने यहां जन सहयोग से एक अभियान चलाया।उसे "पानी फ़ॉर बेलापानी" नाम मिला।उसे एक विदेशिनी ने आगे बढ़ाया।अब बेलापानी के बैगाओं के पास पीने का पानी है।
कवर्धा पड़ाव के लिए नीरज मनजीत के आग्रह के अतिरिक्त भूपेश वैष्णव का आग्रह भी प्रबल रहा। भूपेश ने विश्वास दिलाया कि चिल्फी घाटी के बैगाओं ने अपने और अपने गांवों के आदिवासी चरित्र को अभी भी बचाकर रखा है। लेकिन विश्वासी एक्का पर मैनें जो भरोसा किया था वह गलत साबित हुआ।२४ अक्टूबर को जब हम लोग इस बेलापानी को और यहां तक पहुंचाने वाले रास्तों को देखकर समझने के लिए आये थे तब विश्वासी भी हमारे साथ थी। बिना किसी शिकायत के ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी पगडंडियों और खड़े खेतों के बीच से होकर रास्ता पार किया था। गांव से ठीक पहले हमने पतली जल-धारा वाली पहाड़ी नदी भी पार की। उससे मैंने हिसाब लगा लिया कि जब एक महिला, बिना थके-रुके और बिना किसी शिकायत के यह रास्ता पार कर सकती है तो बाकी के लोगों के लिए भी कोई कठिनाई नहीं होगी। लेकिन मेरा हिसाब गलत था। आज मिलने पर विश्वासी ने बेहिचक बता दिया कि उस दिन वह बेहद थक गयी थी। एक और बात उंसने बतायी कि उस दिन घने जंगल के बीच में उसे डर भी लगा था। लेकिन आज उसे सब कुछ जाना-पहिचाना लग रहा है।आज उसे मालूम है कि कितनी दूर और कितनी देर तक पैदल चलने पर बेलापानी मिल जाएगा।
आदिवासियों को देखने और समझने का हमारा नज़रिया अभी तक नृतत्वशास्त्र के सिद्धांतों से बंधा हुआ है। हम आज भी आदिवासियों को जंगल में रहने वाले ही समझते हैं। और वैसा ही देखना भी चाहते हैं। लेकिन विश्वासी एक्का हमारे समकालीन समाज का हिस्सा हैं। हमारे साथ की हैं। इसलिए उनके अपने तौर-तरीके भी हमारे ही तरह के हो चुके हैं। अपनी आनुवंशिकी में वह आदिवासी हैं। लेकिन विकास क्रम में वह हमारे अपने समकालीन समाज का हिस्सा बिलकुल हमारी तरह हैं। उनका थकना और डरना और फिर निशंक हो जाना भी हमारी तरह ही। सरगुजा की विश्वासी एक्का यहाँ, बोड़ला के शासकीय कॉलेज में हिंदी की प्राधायापिका हैं।
भूपेश ने बेलापानी के जिन जंगली रास्तों की तस्वीरें मुझे भेजी थीं उनमें दिखने वाले रास्तों की दुर्गमता लुभा रही थी। क्योंकि तब तक यह दुर्गमता तस्वीर में थी। लेकिन इन दुर्गम रास्तों पर चलने की थकान तस्वीर में कैसे दिख सकती थी ?
आज यहां पहुँचने पर बेलापानी के एक नर्तक दल ने हमें ठीक वहीं पर रोक दिया जहां तक हमारी गाड़ियां पहुंच सकीं। और इससे आगे पैदल जाना था। नर्तक दल ने यहां हमारी अगवानी की और नाचते-गाते हुए अपने साथ लेकर गांव में पहुंचे। उन सबके साथ होने की वजह से पता ही नहीं चला कि रास्ता कब पार हो गया और हम गांव में पहुँच गए। लेकिन एक उलझन मेरे साथ अभी भी बनी हुयी है कि नर्तक दाल के द्वारा हमारी अगवानी उनका अपना पारम्परिक तरीका है, या भूपेश की कोई हिकमत अमली ? ताकि हमें थकान का पता ही ना चलने पाए ?
जलधारा कितनी भी पतली हो,पर नदी है, तो उस पार पहुंचने के लिए पार करनी होगी। शहर के लोगों के लिए पहाड़ी नदी पार करना आसान नहीं था। खास तौर पर महिलाओं के लिए। तब भूपेश ने हाथ दिया। यह हाथ देना सामूहिकता का शायद सबसे सहज संकेत होता है। साथ चलने के लिए आवाज़ लगाता हुआ। इस समय मुझे लक्ष्मण मस्तुरिया का गीत सुनाई पड़ता सा लगा -- मोर संग चलव जी, मोर संग चलव गा ... ''
लक्ष्मण ने यह गीत अपने बिलकुल शुरूआती दिनों में गाया था। जब वह युवा थे। और मैं अब तक हैरान हूँ कि उस समय के युवा गीतकार के पास सामूहिकता की यह भावना कहाँ से आयी ? मैंने तो चाहा था कि हमारे इस प्रवास में लक्ष्मण भी हमारे साथ चलें। आखिर यह 'आपसदारियाँ ' रचनाकारों की सामूहिकता ही तो है !जिस नर्तक दल ने गांव से बाहर हमारा स्वागत किया था वह अभी तक थका नहीं था। वैसे ही नाच रहा था। अब हमारे रचनाकार साथी भी उनके साथ मिलकर नाचने लगे। भूपेश ने बताया कि ये लोग पैरों की सरल चाल लेकर नाच रहे हैं। एक पैर सामने लेकर उस पर झुकते हैं फिर एक पैर छोड़कर वापस सीधे हो जाते हैं। बस। मुझे लगा कि इतनी सरल चाल के साथ तो मैं भी शामिल हो सकता हूँ। और मैं भी सबके साथ शामिल हो गया। अब मुझे समझ आ रहा है कि उनका झुकना और फिर सीधे हो जाना पृथ्वी के प्रति झुकना था और आकाश की ओर उन्मुख होना था। और अब, इतनी सरल चाल वाले उनके नृत्य के इस आध्यात्म भाव के प्रति मैं विस्मित हूँ।पता चला कि उनका यह नाच रात भर भी ऐसे ही चलता रह सकता है। इसमें नए लोग भी जुड़ते चले जायेंगे, जो पड़ोस के गांवों से उनके यहां आये हुए हैं। उस रात उनके यहां अड़ोस-पड़ोस के गांवों से भी नर्तक दल आये हुए थे। वह उनके यहां करमा उत्सव का दिन था। यह कितना अच्छा हुआ कि हम, बाहरी लोग भी उनके उत्सव का हिस्सा हो गए। और उन लोगों ने अपनेपन के साथ हमें भी अपने में शामिल कर लिया।
 
 
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