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जसिन्ता केरकेट्टा

मई की 23 तारीख को दिल्ली से फ्रैंकफर्ट रवाना होते हुए भारत में एक दोपहर छोड़ गयी थी जिसे सांझ होते हुए देखना चाहती थी लेकिन फ्रैंकफर्ट में उतरते हुए पता चला वहां सूरज देर से डूबता है. रात के 9.00 बजे तक आकाश में उजाला पसरा रहता है और 10.30 बजते-बजते धीरे-धीरे अंधेरा छाने लगता है. तब भारत में सुबह हो रही होती है. गर्मी का मौसम वहां बसंत सा होता है और तब भी बारिश अपनी मनमानी करती रहती है. दिल्ली से जाते समय गर्मी और उमस से तंग मन ने नहीं सोचा था फ्रैंकफर्ट एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही एक ठंडी हवा यूं टकरायेगी और ऐसी ठंड में कहीं से निकल आयेगा झारखंडी शाल. हमें लेने एयरपोर्ट पहुंचे योहान्नेस लापिंग हमारे लिए दो झारखंडी शाल लेकर आये थे. फ्रैंकफर्ट एयरपोर्ट से एप्पलहाइम की ओर जाते हुए लगा जैसे सपनों की दुनिया में आ गयी हूं. कोई देश इतना साफ कैसे हो सकता है और उस पर जहां तक नजर जाये वहां तक पसरी हुई हरियाली. 
 
जर्मनी में लोगों को धीमे और बहुत कम बोलते सुना मगर चिड़ियों की आवाजें स्पष्ट थीं. कौन सी चिड़िया किससे, क्या और किस आवाज में बातें कर रहीं हैं सब स्पष्ट था. इतनी शांति! खामोश पहाड़, पेड़, ठंडी हवायें और खाली-खाली दूर तक पसरी हुई सड़कें. गहन शांति में ऐसा लगता था, जैसे अपने आप को देर तक महसूस किया जा सकता है. जर्मनी के एप्पलहाइम में प्रवेश करते ही कुछ ऐसा ही लगा. मेरे कमरे की खिड़की से पहाड़ी श्रृंखला दिखाई पड़ रही थी. मैं रात घिरने और सूबह सूरज निकलने तक बस खिड़की से चिपकी खड़ी रखती. रात घिरते ही पहाड़ी पर टिमटिमाती रोशनी, जैसे पहाड़ पर जुगनू रूक गये हों. सुबह सूरज निकलने से पहले ही खिड़की से बाहर झांकना और फिर अलग-अलग तरह की चीड़ियों के गीत देर तक सुनना अच्छा लगता था. खपरैल घर की आकृति वाले खामोश घरों को देखकर ऐसा लगता था जैसे भारत से दूर नहीं हूं.  बस शहर से अपने गांव आ गयी हूं. शहरों को गांव की तरफ मुड़ता देखना सुखद लगा.
 
इसके बाद 25 मई की तड़के तीन बजे ही नींद खुल गयी. खिड़की खोलकर बाहर झांकने लगी. घंटों ठंडी हवा का आनंद लेते हुए सुबह को धीरे-धीरे पूरे आकाश में पसरते हुए देखा. हर घर के पीछे फुलवारी हैं. चेरी के पेड़, गुलाब और तरह-तरह के फूलों के पौधे. रह-रहकर सोच रही थी कि कैसे दूसरे देशों के लोग समझने लगे हैं कि अब नदियों और पहाड़ों को बचा लेना चाहिये. धूल-गर्द से हवाओं के चेहरे पर कालिख पोतना बंद करना चाहिये.  नहीं तो वे करोड़ों शब्द, जिन्हें हम हर दिन बेवजह धकियाते रहते हैं, एक दिन शायद कहीं से उठेंगें और हमें अपने ही घर से धक्का दे देंगे. हमारे बच्चों की तरह उनकी भी शिकायत यही होगी कि हमने उनपर कभी ध्यान न दिया. क्या इन लोगों ने उन शब्दों की पीड़ा सुन ली है और अब उन पर हमला करना रोक दिया है? इन बातों को हमसे पहले ही समझ लिया है?
 
दूर-दूर तक खेतों में तरह-तरह के फसल फैले थे. चारों ओर सिर्फ हरियाली. खेतों के बीच पगडंडियों पर एक जोड़ा धीरे-धीरे टहलता हुआ मेरी नजरों से दूर निकल रहा था. हर कोई अपना काम चुपचाप किये जा रहा था. कहीं कोई किसी को नियम बताने या नियम पर चलाने वाला तैनात नजर नहीं आया. 25 मई की सुबह एप्पलहाइम बाजार की ओर निकल पड़ी. हल्की ठंड थी. कुछ दुकानों के दरवाजों पर अपने कविता-पाठ के कार्यक्रम की सूचना, तस्वीर के साथ देखकर मजा आया. मेरे लिए यह बिलकुल सपने जैसा था. कई लोगों ने तस्वीरें देख कर पहचान लिया और उन्होंने मिल कर कहा कि वे मेरे कार्यक्रम में आ रहे हैं. एप्पलहाइम में एक पब्लिक लाईब्रेरी देखी, जहां लोग खुले में बैठकर किताबें पढ़ सकते हैं. किसी को किताबें लेनी हो तो वह बिना किसी को पूछे वहां से किताबें उठा सकता है या पुरानी किताबें लौटा़ सकता है. लोग यह सब ईमानदारी से करते हैं.  11 बजे एप्पलहाइम से बाडन-बाडन शहर पहुंची. वहां फ्रीडा काहलो का संग्रहालय है. मुझे फ्रीडा काहलो के बारे ज्यादा जानकारी नहीं थी. इस संग्रहालय में उनके बचपन से लेकर पूरे जीवन पर आधारित तस्वीरों को देखते हुए मालूम हुआ कि फ्रीडा अपनी पेंटिंग्स के माध्यम स्वयं को अभिव्यक्त करते हुए मशहूर हुईं. उनकी पेंटिंग्स उनके जीवन की यातनाओं की कहानी कहते सर्वभौम हो गये. बाद में वह और उनकी पेंटिंग्स स्त्री मुक्ति आंदोलनों की प्रेरणा स्रोत बन गइंर्. बाडन-बाडन से लौटते हुए एटनलींगेन नामक शहर भी गयी,  जहां लोग स्वास्थ्य लाभ के लिए जाते हैं और वक्त बिताते हैं. शहर के बीचों बीच नदियों को बेपरवाह बहते देखा, बस वहां की नदियां खूबसूरत नालों की शक्ल में नजर आती है. मेरे लिए नदी का अर्थ तो बालू, चट्टान, मछलियां, मंगरदाह, पानी की धार से कटे-छटे किनारे और किनारों पर कमर लचकाए खड़े पेड़ भी होते हैं.
 
दूसरे दिन यानी 26 मई को नाश्ते के बाद योहान्नेस लापिंग के साथ हाइडलबर्ग शहर देखने निकल पड़ी. खूबसूरत पहाड़ नजर आये, जिन्हें प्राकृतिक रूप में फलने-फूलने दिया जा रहा. उनपर चढ़ने के लिए रास्ते बनाए गये हैं. पहाड़ पर जर्मन कवि जोसेफ वॉन की प्रतिमा खड़ी है. हाइडलबर्ग की नदी, जो आगे जाकर राइन नदी में मिल जाती है, शहर के बीचोबीच बह रही है. इसमें नाव चल रही हैं और कई लोग नदी के किनारे उसकी खूसूरती निहार रहे हैं. नदी पर एक पुराना पुल है, जो हाइडलबर्ग बाजार से  जुड़ता है. हाइडलबर्ग की सड़कों पर देर तक घूमती रही और फिर दो बजने से पहले एप्पलहाइम लौट आयी.
 
शाम 6.30 बजे योहान्नेस लापिंग के बुक शॉप पहुंची. वहां के कार्यक्रम के लिए लोग आने लगे थे. देखते ही देखते बुक शॉप भर गयी. कविता पढ़ने से पहले योहान्नेस लापिंग ने लैटिन अमेरिका और दुनिया के दूसरे हिस्सों के आदिवासी संघर्षो की चर्चा करते हुए भारत के आदिवासियों की स्थिति का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि अब तक वे डॉक्यूमेंट्री फिल्मों में आदिवासी स्थितियों को देखते रहे, लेकिन स्वयं आदिवासी समाज अपने लेखन में किस तरह अपने आप को अभिव्यक्त कर रहा है, यह जानने का मौका नहीं मिला. लेकिन अब वह कविताओं के माध्यम से इस समाज के साथ एक भावनात्मक जुड़ाव महसूस कर रहे हैं. 
 
मैंने कवितायें पढ़ना शुरू किया. गांव की एक शाम, सारंडा के फूल, गिद्ध दृष्टि, ओ शहर, नदी, पहाड़ और बाजार, हूल की हत्या, कब्र पर मडुआ के अंकूर, भूख का आग बनना...  और धीरे-धीरे लोगों की आंखें गीली होने लगीं. सामने बैठी जर्मन युवती की गालों पर आंसू की बूंदे लुढक गयीं. तब अचानक काश! इमली खट्टी न होती कविता सुनते ही लोग एक साथ मुस्कुरा उठे. हर पांच कविताओं के बाद एक छोटा ब्रेक होता और लोग अपनी प्रतिक्रियायें देते थे. करीब 15 कवितायें सुनने के बाद देर तक तालियां
बजती रहीं.
 
श्वेतरे, बोन, हनोवर और कास्सल शहरों की
यात्रा
 
अगली सुबह एप्पलहाइम से श्वेतरे जाते हुई गाड़ी में सो गयी, फिर बीच रास्ते में अचानक नींद खुल गयी. मैंने कभी भी गाड़ियों में बिना हिचकोले खाये यात्रा नहीं की थी. कब दो घंटे बीत गये पता ही नहीं चला. पूरे रास्ते तस्वीरें उतारती रही. इतने सुंदर रास्ते, हरियाली से भरे हुए, जंगलों के बीच से गुजरती गाड़ी और दोनों ओर तेजी से पीछे की ओर भागती पेड़ों की कतारें. मुख्य सड़क से करीब एक घंटेकी दूरी तय कर हम एक छोटे गांव पहुंचे. दोपहर का खाना खाने के लिए. योहान्नेस ने रेस्टोरेंट चलाने वाली महिला को बताया कि उन्होंने उस रेस्टोरेंट के बारे इंटरनेट पर पढ़ा था. यह जानकर वह काफी खुश हुई. चार बजे हम श्वेतरे शहर पहुंचे, शाम सात बजे कार्यक्रम की शुरूआत होनी थी. पहले दिन गोंड आदिवासियों पर तीन सालों तक शोध करने वाले एक जर्मन व्यक्ति ने अपनी बातें रखी. उन्होंने वे गीत प्रस्तुत किय जिनमें प्रेम व संघर्ष था. 
 
28 मई को कार्यक्रम के प्रथम सत्र में उपसाला यूनिवर्सिटी, स्वीडेन के प्रो. हायंस ने दलित साहित्य पर अपना वक्तव्य दिया. दूसरे सत्र में मैंने कविताओं का पाठ किया. इसके अलावे दो अलग-अलग कार्यशाला का आयोजन था. एक कार्यषाला आदिवाणी की निदेशक रूबी हेम्ब्रोम के अनुभवों पर आधारित थी. वहीं, दूसरी कार्यशाला मेरे अनुभवों व कविताओं पर आधारित. लोग ढेर सारी कवितायें सुनना चाहते थे. उन्होंने मेरी शिक्षा-दीक्षा, कविताओं की प्रेरणा, हिंदी में ही कविता लिखने का कारण, सिमडेगा के गांवों से निकलने वाली कविताओं आदि के बारे में सवाल  पूछे. मैंने सिमडेगा के रेंगारीह प्रखंड की कुछ आदिवासी लड़कियों की लिखी कविताओं का पाठ किया, जिसका अंग्रेजी अनुवाद भी पढ़ा गया. 
 
29 मई के पहले सत्र में रूबी हेम्ब्रोम ने संथाली लिपि और आदिवाणी प्रकाशन के बारे में बताया. दूसरे सत्र में हाइडलबर्ग यूनिवर्सिटी में गेस्ट फेकल्टी डॉ. मारकुस, जिन्होंने भारत में रहकर लंबे समय तक आदिवासियों द्वारा बनायी जाने वाली क्षेत्रीय फिल्मों के निर्माण में काम किया है, ने आदिवासी विषयों पर बनने वाली फिल्मों पर अपने विचार रखे. उसी दिन करीब 3.00 बजे हम बॉन शहर के लिए रवाना हुए. दो घंटे की यात्रा के बाद हम बॉन यूनिवर्सिटी के निकट प्रो. जो. हिल के घर पहुंचे. उस शाम हम बॉन शहर देखने निकले और एक मेला देखने चले गये. वहां अलग-अलग देश के लोग अपनी चीजें बेच रहे थे. एक ओर म्यूजिक कंसर्ट चल रहा था, जहां लोग नृत्य भी कर रहे थे. देर शाम तक बॉन की सड़कें छानने के बाद हम घर लौट आये. 30 मई को बॉन यूनिवर्सिटी में कविता-पाठ का कार्यक्रम था. इस कार्यक्रम में कुछ जर्मन वरिष्ठ कवि मौजूद थे. उन्होंने कविताओं को काफी पसंद किया और कहा उन्हें ये प्रभावशाली लगीं.
 
 
अगले दिन सुबह करीब 9.00 बजे हम हनोवर के लिए रवाना हुए. दो घंटे की यात्रा के बाद हम बीच में योहान्नेस लापिंग की एक मित्र के पास रूके. वहां लंच किया और पास के ही  एक झील देखने निकल पड़े. यात्रा शुरू हुई और शाम पांच बजे हनोवर के एक गेस्ट हाउस पहुंचे.  शाम सात बजे कविता पाठ का कार्यक्रम था. इस कार्यक्रम में  कुछ विद्यार्थी और कुछ बुद्धिजीवी मौजूद थे. जैसे ही कार्यक्रम समाप्त हुआ, जोरों की बारिश शुरू हो गयी. हम भीगते हुए एक भारतीय रेस्टोरेंट पहुंचे. इतने दिनों बाद पहली बार चावल और दाल-सब्जी खाने को मिला. मैं काफी थक चुकी थी और बस गेस्ट पहुच कर सो जाना चाहती थी.
 
सुबह जब नींद खुली तो बारिश हो रही थी. खिड़की पर बैठ कर देर तक बारिश को देखती रही. नौ बजे हनोवर से कास्सल के लिए रवाना होना था. कास्सल में भी शाम 7.00 बजे कविता-पाठ का कार्यक्रम था. हम दोपहर तक कास्सल पहुंच गये. कुछ देर आराम करने के बाद उठकर नहा-धोकर ठीक सात बजे कार्यक्रम के लिए पहुंच गये. वहां ब्राजील, श्रीलंका व दुनिया के विभिन्न हिस्सों में आदिवासी संघर्षो पर काम करने वाले श्रोता मौजूद थे. वे कविता-पाठ के बाद कई बातें जानने को उत्सुक थे. मसलन भारत में आदिवासियों के संघर्श किस तरह के हैं?  उनकी धार्मिक पहचान क्या है? दुनिया के आदिवासी किस तरह बचे रह सकते हैं? आदि. इसपर देर तक चर्चा-परिचर्चा होती रही.
 
जर्मनी के इतिहास को करीब से देखा
 
कास्सल में रूबी हमारा साथ छोड़ रही थीं. वे भारत वापस आने की
तैयारी कर रही थी. हमने कास्सल में रूबी हेम्ब्रोम से विदा लिया और एक जून को
एरफर्ट के लिए रवाना हो गये. उस शाम 7.00 बजे एरफर्ट यूनिवर्सिटी में कार्यक्रम था. मुझे बताया गया कि एरफर्ट
शहर के जिस हॉल में यह कार्यक्रम था, वहां पहले यहूदियों का छोटा
पूजा स्थल हुआ करता था. इस कार्यक्रम में भारत, अमेरिका, ईरान, जर्मनी के शोधार्थी मौजूद थे. कार्यक्रम के समाप्त होने पर शाम को एरफर्ट की सड़कों पर पैदल चलते हुए विद्यार्थियों के द्वारा चलाए जा रहे एक रेस्टोरेंट पहुंचे. वहां से रात के खाने के बाद विश्राम के लिए शहर से बाहर प्रो. एंथिया के घर पहुंचे.
 
इस पूरे सप्ताह प्रो. एंथिया के पास ही ठहरे. दो जून को एरफर्ट से लाइपस्चिक शहर के लिए रवाना हुए. वहां के ट्राइबल म्यूजियम के ठीक सामने एक होटल में हमारे रूकने की व्यवस्था की गयी थी. शाम को कार्यक्रम था. यह कार्यक्रम संग्रहालय मे ही आयोजित था. संग्रहालय में घूमते हुए देखा कि वहां भारत, अफ्रीका, लैटीन अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, दुनिया के हर देश के आदिवासियों से जुड़ी चीजें मौजूद थीं. लाइपस्चिक में म्युनिख से पहुंचे डॉ. फिलिप व डॉ. कात्जा ने उनके साथ रात बाहर घूमने जाने का आग्रह किया. देर रात लाइपस्चिक की सड़कों पर बेपरवाह घूमते हुए पहली बार आदमी से आदमी का बिना डरे रात भर घूमने का एहसास क्या होता है, पता चला. मैंने विदा लेते वक्त उन्हें धन्यवाद दिया इस दिन के लिए. यह मेरी एक कविता रात और लड़की की याद दिलाती है.
 
लाइपस्चिक से लौटते हुए वाइमार शहर में रूकी. वाइमार से सटे नाजी कन्सट्रेशन कैंपों देखने गयी, जहां यहूदियों को कैद किया जाता था और उन्हें क्रूर यातनाएं दी जाती थी. वहां गैस चेंबर को उसी अवस्था में देखकर मन भारी होने लगा. कन्सट्रेशन कैंप के अंदर उस भवन को भी देखा जहां हिटलर के दौर में नाजियों द्वारा यहूदी कैदियों पर तरह- तरह के प्रयोग होते थे. मसलन शरीर का कौन सा हिस्सा निकालने से कैदी कितने दिन जिंदा रहेगा और न जाने किस-किस तरह के क्रूर प्रयोग. यह भवन अब संग्रहालय में तब्दील कर दिया गया है. यहूदी कैदियों के लिए बनाए गये भवन अब ध्वस्त हो चुके हैं . उन जगहों पर अब काले पत्थर भर दिये गये है. पर हर ब्लॉक की संख्या अंकित है. जर्मनी के अलावा दूसरे हिस्सों में भी मौजूद बड़े कन्संट्रेशन कैंपों के नाम एक जगह अंकित हैं. उस स्थान को देखते ही साथ गये योहान्नेस लापिंग फफक कर रो पड़े. पूर्वजों के क्रूर कदमों के निशान कैसे पीढ़ियों के सीने में अंकित रह जाते हैं किसी बदनुमा दाग की तरह और अपना इतिहास याद दिलाते रहते हैं. योहान्नेस उन कहानियों को दोहराने लगे जो उन्होंने बचपन में देखी सुनीं. वाइमार शहर में सिलर व गोट्ठ की प्रतिमा भी देखी जिनका जर्मन साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है. 
 
देर शाम एरफर्ट वापस लौटते हुए उन पुरानी तस्वीरों को पलटती रही, जिन्हें कन्संट्रेशन कैंपों के पास के एक किताबों की दुकान से लायी थी. उस दिन रात का खाना खाते वक्त फिर इन बातों पर चर्चा होने लगी और माहौल और गमगीन हो गया. प्रो. मार्टिन अपने पिता के बारे बता रहे थे कैसे उन्होंने लंबे समय से नाजी अत्याचारों पर बात करने से रोक लगा दी थी और इस कारण पिता-पुत्र के संबंध में लंबे समय तक दरार पड़ गया. प्रो. एंथिया उन्हें समझा रही थी यह सारी बातें बीत चुकी हैं. बार-बार खुद को परेशान करना बंद कर दीजिये. हम सभी एक बारगी चुपचाप खाना खाने लगे और खाना खाते ही मैं सीधे अपने कमरे में चली गयी.
 
दूसरे दिन पांच जून को हाइनिस जंगल देखने के लिए निकली. यहां पूरे जंगल को उपर से देखा जा सकता था. इसके लिए सीढ़िया बनायी गयी हैं. लौटने के क्रम में जर्मनी के मध्य में स्थित एक खुला संग्रहालय देखा जहां जर्मनी के पहले आदिवासी, जो ईसा पूर्व से ही इस देश के बीचांबीच रहा करते थे. वहां उनके स्मृतिशेष रखे गये हैं. लौटते समय दूर-दूर तक बस बड़े-बड़े खेत नजर आ रहे थे. जब हवा जब चलती थी तो लगता था मानो समुद्र में लहरें एक साथ उठ और गिर रही हैं. जितनी दूर तक नजरें जाती थी, बस खेत और खड़ी फसलें नजर आती थीं. प्रो. एंथिया के घर लौटकर थोड़ा आराम किया, फिर एरफर्ट शहर देखने के लिए निकल गयी. एरफर्ट यूनिवर्सिटी जर्मनी के पुराने विश्वविद्यालयों में से एक है. यहीं मार्टिन लूथर ने अपनी पढ़ाई की थी. प्रो. एंथिया ने उस चर्च को दिखाया जहां मार्टिन लूथर आराधना किया करते थे और उस मठ को भी जहां वे रहते थे. वह संग्रहालय जहां यहूदियों ने नाजी सेना के भय से अपनी संपति जमीन के अंदर छिपा दी थी, जो बाद में खुदाई के दौरान मिला. इस संग्रहालय में उन सामग्रियों व पैसों को रखा गया है.
 
छह जून को हम गोटिनगन शहर के लिए रवाना हुए, जहां गोटिनगन यूनिवर्सिटी में कार्यक्रम था. इस कार्यक्रम में भारत के मुंबई, पुणे व अन्य शहरों से जर्मनी गये लोगों ने हिस्सा लिया. इनमें पीएचडी के नेत्रहीन और नृत्य-संगीत में रूचि लेने
वाले विद्यार्थी भी शामिल थे. उन्होंने कहा कि इन कविताओं की रिकॉर्डिंग उपलब्ध होनी चाहिए. गोटिनगन के बाद आखन, लेम्गो व एमडन गये. हर दूसरे दिन हम दूसरे शहर की यात्रा पर निकल रहे थे. 11 जून को एमडन में मेरा अंतिम कार्यक्रम था. एमडन से एप्पलहाइम लौटते वक्त फ्रैंकफर्ट के करीब ही साइंटिफिक अमेरिका मैग्जीन की पूर्व संपादक मधुश्री मुखर्जी के घर पहुंचे. मसाले वाली चाय पीते हुए हमने काफी देर तक बातें की. उन्होंने अपनी किताब द लैंड ऑफ नेकेड पीपल दी. हम चाय के बाद वहां से फिर एप्पलहाइम के लिए रवाना हुए. 
 
लौटकर दूसरे दिन पूरे दिन अपनी नींद पूरी करती रही. 14 जून को हाइडलबर्ग यूनिवर्सिटी और 16 जून को हाइडलबर्ग के इवनिंग एकाडमी में कविता-पाठ का कार्यक्रम संपन्न हुआ. 17 जून को शाम पांच बजे फैंकफर्ट एयरपोर्ट के लिए रवाना होना था. लौटने से पहले एक बार फिर ठंडी हवाओं को देर तक महसूस किया. पहाड़ों को जी भर कर देखा. खाली-खाली सड़कों को घंटों निहारा. सुबह अकेली घर से बाहर निकल गयी और दूर तक पैदल चलती रही, सड़कों के किनारे खिले फूलों को देखती रही.... फिर करीब 5.00 बजे फ्रैंकफर्ट एयरपोर्ट के लिए रवाना हो गयी.
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