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आजादी की लड़ाई का वह अनोखा प्रयोग

अरविंद मोहन

यह चंपारण सत्याग्रह का सौवां साल है. इस अवसर को जिस तरह याद करना चाहिये वह कहीँ दिखाई नहीं दे रहा है. यह तो मुल्क ही गांधी का माना जाता है इसलिये यह गिनवाने का कोई मतलब नहीं है कि सरकार या गांधी का नाम लेने वाली पार्टियां या फिर गांधीवादी संस्थाओं/ व्यक्तियों में कौन ज्यादा जिम्मेवार है. पर इससे गांधी का क्या बनना बिगडना है. यह तो हमारे लिये एक बडा अवसर गंवाने का भी प्रमाण है. संयोग से यह साल रूस की क्रांति का सौवां साल भी है. पर उसकी स्थिति हमसे भी बदतर है क्योंकि अभी हाल तक जिसे आधुनिक इतिहास की सबसे बडी क्रांति और तरह-तरह के नामों से जाना जाता था आज उसको याद करने वालों को भी उससे शर्म सी आ रही है. रूसी क्रांति की सबसे नायाब उपलब्धि माने जाने वाले सोवियत संघ के पतन के साथ ही जिस तरह से अन्य साम्यवादी शासन विदा हुए, सोवियत संघ बिखरा और इस क्रांति का जनक माने जाने वाला विचार पस्त हुआ वह अलग चर्चा का विषय है, पर इस बडी घटना और 70-80 साल तक चले प्रयोग के महत्व को नकारना मुश्किल है. इस हिसाब से नवंबर क्रांति को याद करना भी जरूरी है.
पर अपने पहले भारतीय आंदोलन में चंपारण में गांधी ने जो प्रयोग किये, जिसे बाद में आम तौर पर चंपारण सत्याग्रह कहा जाता है, उन पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है क्योंकि इस प्रयोग से गांधी के भारत के अभियान की शुरुआत तो हुई ही, इसने उस ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ें हिलाने की पहल की जिसमें कभी सूर्यास्त न होने की बात बड़ी शान से कही जाती थी. सिर्फ ब्रिटिश उपनिवेश ही क्यों अगले तीसेक वर्ष में तो दुनिया से उपनिवेशवाद पूरी तरह विदा हुआ और अब जो मूल्यांकन हो रहे हैं उनसे यह बात साबित हो रही है कि सिर्फ आजादी की ही नहीं उपनिवेशवाद पर चोट करने के मामले में हमारा राष्ट्रीय आंदोलन सबसे आगे था. कई देश हमारे आसपास ही औपनिवेशिक शासन से आजाद हुए पर लगातार तीस वर्ष हम ही लड़े और चंपारण से शुरुआत करके गांधी ने देश को एकजुट करने के साथ सच्चे अर्थ में अकेले ही इस लडाई के लिये तैयार किया.
महात्मा गांधी जब दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे तब अपने राजनैतिक गुरु गोपालकृष्ण गोखले की सलाह पर देश देखने का काम सबसे पहले शुरु किया. जाहिर है कि गोखले को उनकी भारत की समझ पर पूरा भरोसा न था. पर उनके देश वापस लौटने तक उनके अफ्रीका के कामों का यश भारत भर में फैल चुका था. और गांधी खुद से ज्यादा घूमे या जगह-जगह से और तरह-तरह के संगठनों की तरफ से आये न्यौते से वे कई सौ आयोजनों में शामिल हुए. और यही समय है जब सुदूर और एकदम पिछडे चंपारण जिले से भी उन्हें कुछ बेचैन लोगों का बुलावा आने लगा था. यह बुलावा किसी सम्मान या भाषण वाला न होकर एक लडाई में शामिल होने वाला था. और सम्भवत: गांधी को भी इस बुलावे में दम नजर आने लगा था तभी वे बिना बहुत शोर शराबे के भी चंपारण चल दिये. जब वे पटना पहुंचे तब वहां उन्हें बहुत भरोसे वाला या मदद करने वाला सहयोगी भी नहीं मिला. पर वे रुके नहीं और लगभग अनजान मुजफ्फरपुर में एक अल्पज्ञात और सिर्फ एकाध बार मिले दादा कृपलानी के भरोसे पहुंचे. वहां से जब वे चंपारण गये तब शासन उनको कहीं आने जाने देने को तैयार न था. लेकिन गांधी न सिर्फ चंपारण में रुके और निलहों के आतंक को समाप्त करने की लड़ाई लड़ी. इससे चंपारण के शोषित और कमजोर किसानों का जो फायदा हुआ वह अपनी जगह है,पर गांधी को और उनके माध्यम से पूरे देश में चल रहे उपनिवेश वाद विरोधी आंदोलन को एक नयी जान मिली.
गांधी का चंपारण पहुंचना एक युगांतकारी घटना साबित हुआ. यह प्रयोग कई मायनों में विलक्षण था और गांधी के दम को बताने के साथ ही अन्याय सहने वाले जीवंत समाज में प्रतिरोध की शक्ति के उभरने और खुद गांधी द्वारा अपनी पूरी ईमानदारी, निष्ठा, दम और समझ के साथ स्थानीय लोगों और समस्याओं से एक रिश्ता जोड़ने और उन हजारों-लाखों द्वारा झट से गांधी पर भरोसा करके उनको अपनाने की अद्भुद दास्तान भी है. गांधी चंपारण को तो नहीं ही जानते थे, जिन लोगों के बुलावे पर वे गये थे उनके सहयोग की भी बहुत साफ सीमा थी. समाज जातियों संप्रदायों में बंटा था और निलहों के पक्ष में शासन तो था ही उनका अपना जाल हर जगह फैला था, हर चीज में जमींदारों का शोषण चलता था. गांधी कुछ तो तैयार होकर आये थे, कुछ चंदा वगैरह के स्रोत लेकर आये थे, कस्तूरबा समेत कुछ कार्यकर्ता लाने की स्थिति में थे और दक्षिण अफ्रीका के प्रयोग से सामाजिक-राजनैतिक काम करने का एक खाका भी उनके दिमाग में था.
पर जब चंपारण ही क्यों पूरे बिहार में एक भी पूर्णकालिक कार्यकर्ता न हो, बाहर से आने वाले हर कार्यकर्ता के साथ उसका नौकर और रसोइया साथ आ रहा हो, अनजान इलाका, मुश्किल मौसम, बोली और भाषा की भी दिक्कत हो तब अप्रैल की गर्मी से शुरु करके गांधी किस तरह इलाके में घूमे होंगे, किस तरह सारे नेताओँ को साथ भोजन करने तक मनाया होगा, बडे-बडे वकीलों तक को करियर छोडने तक प्रेरित कर पाये होंगे और निलहों के विरोध के आंदोलन को किस तरह शिक्षा, स्वास्थ्य और सफाई जैसे बडे मुद्दोँ से जोडकर चंपारण में जमने का फैसला किया होगा यह एक दिलचस्प और प्रेरक कहानी तो है ही यह गांधी की सम्वाद शैली और उनके संदेश  देने-लेने के तरीके की भी दिलचस्प दास्तान है.
गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन के लिये चंपारण आंदोलन का क्या महत्व है यह बताने की जरूरत नहीं है. इस आंदोलन के बाद गांधी में और राष्ट्रीय आंदोलन में जो फर्क आये उसे देश-दुनिया ने देखा और समझा है, बल्कि अभी भी समझने की कोशिश की जा रही है. खुद चंपारण के लोगों के लिए तो अनजान और परदेसी गांधी आज तक उनकी पहचान और जीवन का अभिन्न अंग बने हुए हैं. सौ साल होने को आये और दूसरी भी बहुत चीजें हुई हैं- चंपारण के लोगों के लिए भी और मुल्क के जीवन में भी. पर इस आंदोलन की छाप को मिटाना मुश्किल है. आज भी जो नेता कुछ करना चाहता है या करने का दिखावा करता है वह लोटा-डोरी लेकर चंपारण और भितिहरवा पहुंचता है और वहां से नयी  शुरुआत का दावा करता है. अभी गांधी आंदोलन के दिखाने लायक अवशेष हैं जिससे यह नाटक भी चलता है और कुछ को भरोसा भी होता है. अभी भी कोई स्थानीय कवि बनता है तो गांधी को याद करना अपना कर्तव्य मानता है. सैकड़ों स्थानीय विद्यालयों में गांधी तरह-तरह से याद किये जाते रहे हैं. खुद उनके बनाये – बताये अनुसार स्थापित कई दर्जन बुनियादी विद्यालय गिरते-पड़ते हुये भी उनके प्रयोगों को काफी समय तक चलाते रहे हैं.
पर सौ साल बाद भी इस आंदोलन और उसके नतीजों के बारे में अभी काफी कुछ जानना-समझना बाकी है. सबसे बड़ी बात तो यही जाननी है कि आखिर बापू का संदेश एक तरफ चंपारण के आम लोगों और दूसरी ओर पूरी दुनिया तक कैसे पहुंचा. किसी राजकुमार शुक्ल को तो उन्हें बुलाने की सूझी पर चंपारण के हजारों लोग गांधी के पास अपनी आपबीती सुनाने क्यों और कैसे पहुंचे. उन्हें क्या कहकर बुलाया गया और उन्हें क्या मिला. अंग्रेज प्रशासन को उनके आने का संदेश कैसे और क्यों पहुंचा. इससे भी बडी बात यह है कि जिस गांधी को चंपारण नक्शे में भी नहीं मालूम था उसने कैसे तिनकठिया प्रणाली को इतना बड़ा मुद्दा माना और आंदोलन की सोच ली. फिर यह भी हुआ कि गांधी को चंपारण की लगभग सभी समस्याओँ ( और उसी के साथ देश के ग्रामीण इलाकों की भी) की इतनी समझ बन गयी कि वे देश-दुनिया छोडकर वहीं टिके और अपने साथियों के साथ शिक्षा से लेकर हर क्षेत्र में प्रयोग शुरु किया जिसमें पर्सनल हाइजीन और उसके माध्यम से ग्रामीण दरिद्रता भी शामिल है. इस काम को अकेले करना या सिर्फ पुरुषों के भरोसे करना असंभव मानकर बापू ने कस्तूरबा और अपने संपर्क की अन्य महिलाओं को भी इस काम में लगाया. हम पाते हैं कि बापू का चंपारण का अनुभव बाद में उत्तर भारत के भूकंप और फिर देश की हर समस्या के निदान की दिशा में मददगार साबित हुआ.
पर हम सब जानते हैं कि गांधी बहुत बडी बडी बातें और क्रांति जैसा भारी-भरकम शब्द इस्तेमाल किये बिना जो कर रहे थे उसे मात्र राजनैतिक लड़ाई नहीं मानते थे- वे इसे सभ्यताओं की लड़ाई बताते थे और एक बडी राजनैतिक लड़ाई के साथ एक देसज विकल्प देने और उसके रचनात्मक कामों को भी समान महत्व देते थे, इन सबको सत्य के प्रयोग मानते थे. वे सब कुछ खुद से जानते-समझते हों इसका दावा उन्होंने कभी भी नहीं किया. वे अपने जीवन को सत्य का प्रयोग ही मानते थे. और उन्होंने कभी भी अच्छी लग रही चीज को अपनाने से इस चलते कोताही नहीं की कि फलां चीज का स्रोत उनकी धारणा के अनुसार उत्तम नहीं है. जिस पश्चिम की सभ्यता को वे शैतानी मानते थे उसकी अच्छी बातों को न गांधी ने सिर्फ अपने जीवन और राजनैतिक काम में प्रयोग किया बल्कि प्रचारित करके अमर भी बनाया. ये चीजें दक्षिण अफ्रीका के समय से ही लक्षित होने लगी थीं और भारत समेत सभी जगहों पर उसकी चर्चा भी होने लगी थी. चंपारण ने भारत में इन सबकी धमाकेदार शुरुआत करायी और उसके बाद गांधी ने मुड़कर पीछे नहीं देखा.
पर गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में जो प्रयोग किये थे और सत्याग्रह से लेकर दूसरी जिन चीजों को एक राजनैतिक हथियार बनाया था उसमें पश्चिम में तब चले प्रयोगों का अनुभव ही आधार बना था पर यह कहना कुछ ज्यादा पश्चिम भक्ति दिखाता है कि गांधी ने टालस्टाय और रस्किन से ही सब कुछ सीखा था. गांधी के सबसे अधिक इस्तेमाल हुए हथियार सत्याग्रह को ही पहले पश्चिम के पैसिव रेजिस्टेंस से जोडा गया पर गांधी ने खुद बहुत विस्तार से बताया है कि यह किस तरह अलग है और इसके लिए किस तरह की नैतिक शक्ति और तैयारी जरूरी है. गांधी ने अहिंसा को अपनाया और इसे एक राजनैतिक औजार बनाया पर न तो उनकी अहिंसा को अकेले बुद्ध-महावीर से जोड़ा जा सकता है न पश्चिम के नान-वायलेंस से. अहिंसा को व्यक्तिगत आचरण की चीज की जगह सार्वजनिक आचरण की चीज बनाना, अन्याय दूर करने में हथियार बनाना और प्रशिक्षण से लोगों को, खासकर सार्वजनिक काम में आने वाले सत्याग्रहियों को अहिंसक बनाने का प्रयोग और आचरण तो गांधी ने किया. गांधी उस राजनीति और आर्थिक कार्य व्यापार में नैतिकता को स्थापित करने वाले महापुरुष भी दिखाई देते हैं जिसे चाणक्य से लेकर अरस्तू और लगभग सारे राजनैतिक दार्शनिक नैतिकता से अलग चीज मानते रहे थे-युद्ध और प्रेम में हर चीज को जायज बताने वाला जुमला इसी सोच से निकला था. गांधी की करुणा बुद्ध  से आई थी लेकिन सिर्फ बुद्ध वाली न रह गयी थी.
गांधी निजी तौर पर चंपारण पूरी तरह तैयार होकर गये थे, हर परिणाम भुगतने की पक्की मानसिकता के साथ गये थे पर उन्हें अकेलेपन की, अपनी बाकी तैयारियों की, साधन की और अपने समाज की कमजोरियों-अच्छाइयों का अन्दाजा था. उन्होंने खुद सत्याग्रही के लिए जो ग्यारह नियम बनाये थे उन सबको वे अपने पर लागू करने के साथ आजमा चुके थे. वे कुछ साधनों का इंतजाम करके गये थे और चंपारण में चंदा न लेने का साफ फरमान सुना दिया था. और बाद में जब 2200 रुपये में ही 10 महीने आंदोलन का खर्च चल गया तो बहुत निहाल होकर बताते हैं कि हमारे पांच सौ-हजार रुपये बच ही गये. वे तब भी चंदे की चिंता करते हैं पर साबरमती आश्रम और दूसरे कामों के लिए. वे तब भी बाहर के कामों के लिए कार्यकर्त्ता ढूंढ़ते हैं, पर उनकी मुख्य चिंता चंपारण ही रहता है. कुछ ही लोगों को वे चंपारण में लगाने की जगह वहां से बाहर भेजते है-स्वामी सत्यदेव को हिंदी प्रचार के लिए चंपारण से दक्षिण भारत भेजते हैं.
गांधी ने चंपारण में किसी क्रांति का नाम नहीं लिया, कोई सत्ता उखाडने का आह्वान नहीं किया, हिंसक बदलाव की वकालत नहीं की, किसी जाति, किसी मजहब का नाम नहीं लिया, मुश्किल से हिंदी बोली पर ज्यादातर उसी का प्रयोग किया, कोई भूख हडताल भी नहीं की और हिंसक रुझान दिखने पर सब कुछ छोडकर उस पर पहले ध्यान दिया, अंगरेज हुक्मरानों ही नहीं निलहों से भी स्नेह का व्यवहार किया. हर बात में गांधी और कस्तूरबा तक पर हमला करने से लेकर खुद को जहर देने का प्रयास करने वाले निलहे विल्सन के प्रति उनकी तरफ से कभी कडवाहट आई हो यह नहीं दिखता. कस्तूरबा पर जब उसने व्यक्तिगत आक्षेप किया और आम तौर से अखबारी बहस से दूर रहने की रणनीति छोडकर भी जब गांधी उसका जबाब देते हैं तो उसमें कोई कडवाहट दिखाई नहीं देती. और हमको किसी अंगरेज अधिकारी के लिखे में गांधी के लिए कोई सीधी आलोचना नहीं दिखती. निलहे भी आम तौर पर उनकी जगह उनके सहयोगियों पर हमला करते दिखते हैं जबकि गांधी उनकी लंका ही जला रहे थे.
यह एक दिलचस्प तथ्य है कि अपनी किताब ‘दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास’, की भूमिका में महात्मा गांधी ने 2 अप्रैल, 1924 को ही लिखा था, ‘यह बात उल्लेखनीय है कि सत्याग्रह में चंपारण के लोगों ने खूब शांति रखी. इसका साक्षी मैं हूं कि सारे ही नेताओं ने मन से, वचन से और काया से सम्पूर्ण शांति रखी. यही कारण है कि चंपारण में सदियों पुरानी बुराई छह माह में दूर हो गयी.’ वे आगे लिखते हैं, ‘अहमदाबाद मिल मजदूरों की जीत को मैंने दोषयुक्त माना है; क्योंकि मजदूरों की टेक की रक्षा के लिये मैंने जो उपवास किया, वह मिल मालिकों पर दबाव डालने वाला था...... मजदूर अगर शांति की टेक पर डटे रहते तो उनकी जीत अवश्य होती और वे मिल-मालिकों का मन जीत लेते.’ वे फिर लिखते है, ‘खेड़ा में शुद्ध सत्य की रक्षा हुई ऐसा तो मैं नहीं कह सकता. शांति की रक्षा जरूर हुई.....परंतु खेडा ने पूरी तरह शांति का पाठ नहीं सीखा था; और अहमदाबाद के मजदूर शांति के शुद्ध स्वरूप को नहीं समझे थे. इससे रालट एक्ट सत्याग्रह के समय लोगों को कष्ट उठाना पडा, मुझे अपनी हिमालय जैसी भूल स्वीकार करनी पडी और उपवास करना और दूसरों से करवाना पडा.’ काफी बाद में गांधी ने चंपारण आंदोलन के अपने सहयोगी जनकधारी प्रसाद को लिखा, ‘चंपारण के सहयोगियों की यादें मेरे मन के खजाने में भरी पडी हैं. अगर देश भर में ऐसे लोग मिल जाएं तो स्वराज आने में वक्त नहीं लगेगा.’
चंपारण के उनके प्रयोग को दूसरों से ऊपर करने वाली चीज रचनात्मक काम ही थे. यह चीज उनके दक्षिण अफ्रीकी सत्याग्रह आंदोलन में नहीं थी जहां सत्य की लडाई और सत्याग्रही तैयार करने का प्रयोग काफी बडे पैमाने पर हुआ और मोहनदास के महात्मा बनने की शुरुआत हुई पर वहां सफाई सम्बन्धी कुछ प्रयोगों के अलावा अन्य रचनात्मक काम नहीं हुए. अखबार छापना और आश्रम के नाम पर सह-जीवन का प्रयोग हुआ, शिक्षा की बात थी पर हल्के प्रयोग भर ही हुए और जल्दी ही रुक गये. और तब के सत्याग्रही तैयार करने के कार्यक्रम में भी काफी कमी खुद गांधी मानते हैं. उन्होंने स्वयं अपने खाने, पहनने, सेक्स-जीवन से लेकर लगभग हर चीज में बाद में बदलाव किये. और जब वे यह भूमिका लिख रहे थे उसके बाद भी बदलावों का क्रम रुका नहीं पर सत्याग्रही कौन हो, कैसा हो इस बारे में बहुत स्पष्टता आ चुकी थी. पर गांधी नील की खेती और निलहों के जुल्म को मिटाने के साथ जो दूसरे प्रयोग किये वे तब ज्यादा प्रचारित नहीं हुए या खुद गांधी उनका उस तरह का प्रचार नहीं चाह्ते थे जैसा कि नील की खेती की समाप्ति का.
गांधी के आदेशों, सलाहों, टिप्पणियों और आचरण को देखने के बाद तीन ही चीजें ऐसी दिखती हैं जो गांधी पाना चाहते हैं. चंपारण के किसानों का दुख-दर्द खत्म कराना, गोरी चमडी और शासन का डर निकालना और अंगरेजी शोषक व्यवस्था की जगह देसी विकल्प देने का अपना प्रयास जो उनके रचनात्मक कामों से निकलता है. पहला काम तो उन्होने डंके की चोट पर किया और शोर मचाकर भी अंग्रेजी व्यवस्था पर दबाव बनाया. इस मुद्दे को उन्होंने न कभी छुपाया और न मद्धिम पडने दिया. एक आलोचना यह की जाती है कि तब नील अपनी स्वाभाविक मौत मरने जा रहा था क्योंकि तब तक कृत्रिम रंग बन गये थे और पौधे से बनने वाले नील की विदाई हो रही थी. तब सिर्फ विश्व युद्ध के चलते कुछ समय के लिए मांग एक बार फिर बनी थी और गांधी ने उसी अवसर का लाभ लिया. अब सबको यह दिख रहा हो और खुद निलहे नील की खेती से मुंह मोड़ रहे हों तब गांधी को यह समझ न आ रहा हो यह सम्भव नहीं था. पर तिनकठिया खेती, नीलहों की जमींदारी, अनगरेजी शासन से उनके निकट सम्बन्ध और पुरानी जमींदारी व्यवस्था से आए दर्जनों किस्म के आबवाब की व्यवस्था किस तरह किसानों के गले का फांस बन गयी थी, यह समझने में गांधी को ज्यादा वक्त नहीं लगा. उन्होंने चंपारण पहुंचते ही जान लिया कि निलहे खुद तिनकठिया का अंत देखकर किसानों को उससे मुक्त करने के नाम पर अधिक लगान का शरहबेशी करार कर रहे हैं और शासन उसे कानूनी मान्यता दे रहा है.
गांधी ने इन सब सवालों को हर मंच पर उठाया और थोडे ही दिनों में सबको अपनी दलीलों से सहमत कर लिया. और जैसे ही उन्हें लगा कि शासन निलहों के साथ जाकर अपनी प्रतिष्ठा और इकबाल को दांव पर लगाने को तैयार नहीं है और निलहे अपनी करतूतों को जारी नहीं रख पाएंगे वैसे ही उन्होने अपने तीसरे लक्ष्य के लिए काम शुरू कर दिया और इसमें सरकार के साथ ही निलहों से भी सहयोग मांगा. यह समर्थन मिला तो नहीं पर इसका वैसा विरोध भी नहीं हुआ जैसा कि नील की तिनकठिया खेती खत्म कराने के मसले का हुआ था. इस काम में पहले की तरह एक आदेश से सब कुछ हासिल हो जाने जैसा कुछ था भी और गांधी जब खेडा के किसानों और अहमदाबाद के मिल मजदूरों के बुलावे पर चंपारण से निकले तो उन्हें अफसोस रहा कि वे अपने इस पहले प्रयोग के फल नहीं देख पा रहे हैं और उनके कई सपने अधूरे हैं. पर बीच वाले अर्थात गोरी चमडी और शासन का डर निकालने का काम उन्होंने इन दोनों की तरह बहुत शोर-शराबे के साथ नहीं किया- पर बहुत गोपनीय ढंग भी नहीं रखा. और पश्चिमी सभ्यता से लडाई या विकल्प की लडाई में शायद यही सबसे ज्यादा असरदार साबित हुआ.
उन्होंने क्या-क्या कहा और बाकी जीवन में कब-कब किस तरह के प्रयोग किये यह गिनवाना हमारा मकसद नहीं है. पर यह बात जोर से बताना जरूर मकसद है कि हिन्दुस्तान में तीस साल से ज्यादा की अवधि में गांधी ने जो भी प्रयोग किये चंपारण उसकी शुरुआत ही नहीं करता, यह एक बडा और सम्भवत: सबसे महत्वपूर्ण पडाव था. अब यह गिनती मौजूद है कि गांधी सेवाग्राम में कितने दिन रहे और साबरमती में कितने दिन, दिल्ली में कितना समय गुजारा और लाहौर में कितना, कलकत्ता कितने दिन रहे और मद्रास में कितने दिन, पर इन जगहों पर रहते हुए वे सिर्फ उन्ही जगहों का काम करते रहे हों या उन्होने सारा समय और ध्यान वहीँ की चीजों पर लगाया यह कहना गलत होगा. इस लिहाज से चंपारण यह दावा कर सकता है कि यहां गुजारे दस महीने की अवधि का ज्यादातर वक्त और अपना ध्यान उन्होने चंपारण पर केन्द्रित किया.
दक्षिण अफ्रीका के दो ठिकानों को छोडकर उन्होंने किसी और जगह न तो इतना समय लगाया और ना ही सिर्फ वहीँ के काम पर अपना ध्यान लगाया. चंपारण रहते हुए गांधी की चिंता का एक अंश तब बन रहे साबरमती आश्रम पर और फिर अहमदाबाद के मजदूरों और खेडा के किसानों की समस्याओं पर था पर गांधी चंपारण में रम गये थे. और जैसे ही उन्हें नील की खेती की तिनकठिया प्रणाली के अंत का संकेत मिलने लगा उन्होने भारत में अपने सबसे महत्वपूर्ण प्रयोगोँ की धूम-धडाके से शुरुआत की. वे चंपारण आने के कुछ समय बाद ही सर्वेंट्स आफ इंडिया सोसाइटी के डा. श्रीहरिक़ृष्ण देव को साथ लेकर आए थे और स्वच्छता तथा स्वास्थ्य के मामलों में उनकी सेवाएं लेने लगे थे. और जैसे ही उन्हें चंपारण की सदियों पुरानी नील की खेती की बीमारी जाती लगी उन्होने, बीमारी, महामारी, साफ सफाई अर्थात हाइजिन, शिक्षा, शिल्पकारी, खादी, गौ-सदन बनाने जैसे न जाने कितने ही प्रयोग शुरू किये और बिहार के अपने सारे पुराने सहयोगियों को तो लगाया ही बाहर से रचनात्मक काम वाले पन्द्रह कार्यकर्ता ले आए. इस काम में उन्होंने कस्तूरबा और देवदास गांधी को भी लगाया और महादेव देसाई तथा कृपलानी जैसे सहयोगियों को भी.
और जब वे 10 महीने बाद अहमदाबाद आंदोलन के क्रम में चंपारण से निकले तो उन्हें अफसोस रहा कि वे अपने कई प्रयोगों को अधूरा छोडकर जा रहे हैं और कुछ प्रयोग शुरु ही नहीं कर पाए. पर बीसेक साल बाद जब वे गांधी सेवा संघ के जलसे में वृन्दावन, चंपारण आए तो यह देखकर गदगद हो गये कि उनके प्रयोग न सिर्फ फल-फूल रहे हैं बल्कि कई कदम आगे बढ चुके हैं. गांधी बीच में भी चंपारण आते-जाते रहे थे.
इतिहास गवाह है कि गांधी खुद भी चंपारण के बाद रुके नहीं थे, बल्कि उनकी रफ्तार तेज हुई थी. और जो प्रयोग उन्होने चंपारण में किये थे उसे बडे पैमाने पर देश भर में चलाया गया. कांग्रेस की कमान हाथ में आते ही गांधी ने एक करोड चवन्निया सदस्य बनाने के साथ पच्चीस लाख चरखे चलवाने का अभियान भी छेडा. पहले का कोई कांग्रेसी या हमारा कथित राष्ट्रीय नेता यह संख्या सोच भी नहीं सकता था. शिक्षा का जो अनगढ प्रयोग चंपारण में शुरू हुआ वह थोडे दिनों में ही बुनियादी तालीम आंदोलन के रूप में देशव्यापी हुआ और चंपारण समेत पूरे मुल्क में राष्ट्रीय स्कूल और कालेज ही नहीं विश्वविद्यालय खोलने का आंदोलन ही खडा हो गया. गांधी ने छुआछूत, विकेंद्रित उत्पादन, वितरण और खपत की व्यवस्था शुरू की, सफाई, शराबबंदी, प्राकृतिक चिकित्सा, उन्नत खेती और पशुपालन से लेकर कुटीर उद्योग जैसे जाने कितने प्रयोग किये जिन्हे गिनवाने और जिनके बुनियादी पक्षों की चर्चा करने का सामर्थ्य इस लेखक में नहीं है. साथ ही बारीक की जगह मोटी खादी, बहुत सुघड की जगह अनगढ चीज इस्तेमाल का, बाहरी की जगह स्थानीय उत्पाद के उपयोग का प्रयोग शुरु हुआ. चंपारण में बने पहले स्कूलों में कोई भी निर्माण सामग्री दूर की इस्तेमाल न करने की प्राथमिक शर्त थी.
यह कहा जा सकता है कि चंपारण आंदोलन में लोगों और अपने अद्भुत सहयोगियों का व्यवहार देखकर गांधी ने इनमें से अधिकांश मामलोँ में पहल कर दी थी जिसमें कुछ उसी रूप में आगे बढे तो कई में आगे चलकर बदलाव भी दिखता है. पर यह लेखक अपने सीमित अध्ययन से ही यह दावा कर सकता है कि गांधी ने दस महीने की छोटी अवधि में चंपारण से, यहाँ के लोगों से और अपने सहयोगियों के व्यवहार और आचरण से भी काफी कुछ ऐसा सीखा जिसका असर पूरे जीवन रहा, पूरे आंदोलन पर रहा. और उनके सहयोगियों पर ही नहीं चंपारण पर भी गांधी का ऐसा रंग चढा जो जीवन भर बना रहा और आज का चंपारण अब राजा जनक. सीता, वाल्मीकि, आल्हा-ऊदल, मौर्य, कौटिल्य, अशोक जैसे प्रतापी लोगों के नाम की जगह गांधी के चंपारण के नाम से जाना जाता है और इस बात पर गर्व अनुभव करता है.
जब सोवियत संघ का पतन हो गया तब ज्यादातर साम्यवादी चुप्पी साध गये और अमेरिकापरस्त जमात विचारधारा और इतिहास से लेकर जाने किन किन चीजोँ के अंत की घोषणा करने लगा. और उसने जो वैश्वीकरण, उदारीकरण और भूमन्डलीकरण के रूप में जो समाधान दुनिया को देना चाहा उसका क्रूर और लुटेरा चेहरा समझने-देखने में किसी को भी मुश्किल नहीं हुई. यह उपनिवेशवाद और पुराने साम्राज्यवाद से भी ज्यादा शोषक और डरावना लगने लगा. और ज्यादा समय नहीं हुआ जब कभी सब-प्राइम संकट तो कभी यूरोप की एकता और बिखराव जैसे अनेक कदमों से इस मुहिम के कदम रुक से गये हैं. दूसरी ओर युरोप-अमेरिका के ही काफी लोगों ने इस मुहिम का चरित्र जानकर विरोध शुरू किया और दुनिया भर के गरीब मुल्कों से उठने वाली आवाजों के साथ अपनी आवाज मिलाई. भूमंडलीकरण, उदारीकरण और वैश्वीकरण की मुहिम ने गरीब मुल्कों में भी अपने समर्थक बनाए हैं- खासकर वहां के शासक जमात और अमीर वर्ग में. पर विरोध का स्वर स्वत:स्फूर्त है और काफी हद तक सरकारी अभियानों के समान ताकतवर होने लगा है.
पर आज यह सिर्फ ताकत और संख्या बल का मामला नहीं रह गया है-विरोध करने वाले दुनिया की विविधताओं का, टिकाऊ विकास के माडल का, विकेन्द्रीकरण का, स्थानीय समूहों का उनके प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार को उसी तरह स्वीकार करने लगे हैं जो गांधी के दर्शन और आचरण का केन्द्रीय तत्व है. वे गांधी को विकल्प के रूप में पेश भी करने लगे हैं. गांधी अब तक दुनिया भर में अन्याय का प्रतिरोध करने वाली जमातों में (जैसे इजरायल विरोधी फिलीस्तीनियों), अहिंसक विरोध आन्दोलनों में (जैसे दलाई लामा और तिब्बत की आजादी के आंदोलन)  पश्चिमी माडल के लोकतंत्र का विकल्प चाहने वालों (जैसे बर्मा की नेता आंग सांग सू की), सोवियत माडल के साम्यवाद से बगावत करने वालों (जैसे पोलैंड के श्रमिक नेता लेख वालेसा), हर तरह के अन्याय से लडने वालों (जैसे दक्षिण अफ्रीका के रंगभेद विरोधी आंदोलन) के लिए प्रेरणा के स्रोत हुआ करते थे, अब वे एक वैकल्पिक विश्व व्यवस्था चाहने वालों की आशा के केंद्र बने हैं. ऐसे में यह जरूरी है कि गांधी को, उनके आंदोलनों को उनके प्रयोगों को ज्यादा बारीकी से देखा जाये और अपनी जरूरतों के लायक समाधान या समाधान तक ले जाने वाली राह तलाशने का काम किया जाये.शुक्रवार 
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