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शहर में बदलता भवाली गांव

शैलेंद्र प्रताप सिंह 

भवाली एक गांव है जो आज के भवाली कस्बे से करीब ४-५ कि मी उत्तर पश्चिम है । इसी भवाली गांव के नाम पर आज का भवाली क़स्बे का नामकरण हुआ यद्यपि दोनो के बीच अन्य कोई नाता स्पष्ट नही होता है । आज का भवाली कस्बा बिकसित होने के पहले यहाँ कहलक्यूरा , मल्ला निगलाट , नागरीगांव की ज़मीनें थी और इन गांवों की ग्राम सभायें ही यहां  का स्थायीय प्रशासन देखती थी । सन् 1841 के बाद यहां से करीब ११ कि मी दूर नैनीताल कस्बा विकसित होना शुरू हुआ और उसके रास्ते में पड़ने के कारण आज के भवाली कस्बे के आसपास का जो क्षेत्र और चौराहा धीरे धीरे विकसित हुआ वह १९१६ में सरकार द्वारा भवाली नोटोफाइड एरिया धोषित हुआ । आज यह कस्बा भवाली नगर पंचायत के रूप में एक प्रसिद्ध हिल स्टेशन के रूप में बिकसित हो गया है । भवाली नोटीफाइड एरिया धोषित होने के पहले आज के भवाली चौराहे को दुगई स्टेट का भाग होने के कारण आसपास के लोगो द्वारा इसे दुगे भी कहा जाता था ।
भवाली से करीब ६० किमी उत्तर मे ऐतिहासिक शहर अल्मोडा है । नैनीताल के विकसित होने से पहले अल्मोडा के विकाश से भवाली का भी विकाश जुड़ा हुआ था क्योकि नीचे भाबर / हल्द्वानी से ही खाने पीने का काफी सामान आता था । हल्द्वानी और अल्मोडा के बीच का पैदल मार्ग भवाली कस्बे के ही गांव श्यामखेत से होकर था । वर्ष १५५३ में कुमायूं के चंदवंशी / सोमबंशी राजा कल्यानचंद्र अपनी राजधानी चम्पावत से अल्मोडा ले आये थे । उल्लेखनीय है कि इस वंश के संस्थापक सोमचंद झूसी ( प्रयाग ) के रहने वाले थे और उनकी शादी कत्यूरी राजकुमारी से हुई थी और दहेज में उन्हे चम्पावत मिला था । उनके वंशजों ने धीरे धीरे कत्यरियों से कुमायूँ छीन लिया और कुमायूँ में चंदवंश की सत्ता स्थापित की । चंद राजाओं को तराई का भाबर  क्षेत्र भी ग्रांट में मिला हुआ था । नैनीताल के पूर्व सांसद श्री के सी सिंह 'बाबा' उस वंश के आज एक उत्तराधिकारी है और जनता उन्हे उस रूप में आज भी देखती है । 
१७९० में गोरखाओ ने चंद्र राजाओं को पराजित कर कुमायूँ पर अधिकार जमाया पर १८१४-१५ के आंग्ल नेपाली युद्ध में गोरखा पराजित हो वापस चले गये और कुमायूँ पर अंग्रेज़ों का शासन स्थापित हुआ । 27 अप्रेल १८१५ को अल्मोडा के लालमंडी किले पर ब्रिटिस झंडा फहराया गया । अंग्रेज़ पर्वत प्रेमीथे । पहाडों की ठंडी हवा उन्हे बहुत पसंद थी । उन्होने अल्मोडा को अपना प्रिय सैर सैरगाह बनाया जिस कारण हल्द्वानी से अल्मोडा आवागमन बहुत बढ गया और बढ़ी भवाली के आसपास की चहल पहल ।
1815 में ही अल्मोडा कमिश्नरी मुख्यालय बना । पहले मिस्टर गार्डनर कमिश्नर बने पर जल्दी ही उनके सहायक मिस्टर ट्रेल उनके उत्तराधिकारी बन गये । मिस्टर ट्रेल ने काफी रुचि लेकर सख्ती से कुमायूँ के प्रशासनिक ढाँचे को मज़बूत किया । उसके पूर्व सब कुछ अस्त ब्यस्त सा चल रहा था । ट्रैकिंग का भी उन्हे शौक था । ट्रैकिंग करते करते उन्होने नैनीताल ढूँढा , जहाँ उन्हे नैना देबी मंदिर भी मिला । 1830 में वह कमिश्नर बरेली होकर चले गये । अगले कमिश्नर कर्नल गोवन 1839 तक रहे । उनके समय सन् १८३७ में तराई क्षेत्र का प्रशासन मुरादाबाद कमिश्नरी को दे दिया गया था । उसके बाद मिस्टर लूसिंगटन 1848 तक कमिश्नर रहे । 1842 में भाबर ( तराई क्षेत्र ) पुन: कुमायूँ कमिश्नरी को मिला और एक नया जिला तराई बना । मिस्टर बैटन 1856 तक अगले कमिश्नर अल्मोडा रहे । 
इसी बीच वर्ष 1939-40 में मिस्टर पी बैरन जो शांहजहांपुर के चीनी ब्यापारी थे , अपने साथियों के साथ नैनीताल आये । वह खूब ट्रैकिंग करते थे । उनके अनुसार हिमालय पर उनके १५०० किमी के भ्रमण के दौरान उन्हे नैनीताल ही सबसे सुंदर जगह लगी । उस समय नैनीताल इलाक़े के थोकदार ठाकुर नूर ( नर सिंह ) थे । ठाकुर नूर सिंह को डरा धमका कर मिस्टर बैरन ने नैनीताल में कुछ ज़मीन ख़रीदने में सफलता पायी और नैनीताल में सबसे पुरानी बिल्डिंग प्रिलग्रिम लाज वर्ष 1841 में बनवाया । अंग्रेज़ जगह जगह हिल स्टेशन बिकसित करने के लिये उतावले रहते थे । उन्हे पहाड़ो की जलवायु बहुत पसंद आती थी । अंग्रेज़ों ने बडी तेज़ी से नैनीताल का विकाश प्रारम्भ कर दिया । 1843 में पुलिस की एक पोस्ट भी खोल दी गई । 1846 में बंगाल आर्मी के कैप्टन मैडेन नैनीताल आये तो उन्होने पाया कि झील के आसपास मकान बन रहे है । अल्मोडा से नैनीताल का भी आवागमन बढा और नैनीताल के विकाश के साथ ही विकसित होने लगा आज के भवाली का मुख्य तिराहा । यह तिराहा ही धीरे धीरे अल्मोडा और आगे कुमायूँ जाने का गेट वे बन गया । नैनीताल से ही भीमताल नौकुचुचिया ताल , सातताल आदि जाने के रास्ते भी भवाली से ही होकर निकलते थे । सो धीरे धीरे आज के भवाली तिराहे के आसपास चाय और दैनिक उपयोग की दुकानें आयी ।हां  सारी यात्रायें पैदल और खच्चरों पर ही उस समय तक होती थी ।जारी 
 
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