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दक्षिण भारत में किसान मुक्ति यात्रा

 सुनीलम 

अखिल भारतीय किसान संघर्ष समिति द्वारा किसान मुक्ति यात्रा का दूसरा चरण बंगलूरु में 23 सितंबर को समाप्त हुआ। यात्रा की शुरुआत हालांकि 16 सितम्बर को हुई, लेकिन पिछली यात्रा की तरह इस बार भी यात्रा का केंद्र मन्दसौर रहा। 15 सितम्बर को प्रमुख किसान नेताओं ने मंदसौर जिले के ग्राम टकरावद और ग्राम चिल्लोद पिपलिया पहुंच कर शहीद किसानों की मूर्तियों का अनावरण किया। इस बार माहौल बदला हुआ था, पिछली यात्रा की तैयारी करने जब मैं मंदसौर पहुंचा था, तब मुझे गिरफ्तार कर लिया गया तथा यात्रा के शुरू होने के पहले 1000 किसानों को यात्रियों के साथ गिरफ्तार किया गया था। हालांकि इस बार भी हमें कार्यक्रम की अनुमति नहीं दी गई लेकिन जब हम ग्रामवासियों द्वारा आयोजित अनावरण कार्यक्रम में पहुँचे तब प्रशासन व पुलिस ने कोई विघ्न पैदा नहीं किया, ग्रामीणो ने बड़ी संख्या में भागीदारी की। मंदसौर से हम सब हैदराबाद पहुंचे जहां से दक्षिण भारत की यात्रा शुरु हुई। 
यात्रा हैदराबाद, तेलंगाना से 16 सितंबर को शुरू होकर आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, केरल होते हुए कर्नाटक पहुँची, जहां यात्रा का समापन बेंगलूरु में 23 सितम्बर को हुआ। पिछली यात्रा में 150 साथी 50 वाहनों के साथ शामिल हुए थे, जिसके चलते कार्यक्रम के आयोजकों को यात्रियों का प्रबंध करने में काफी तकलीफ हुई। इसलिए दक्षिण भारत की यात्रा में 45 साथी 5 वाहनों से यात्रा में शामिल हुए। क्षेत्रीय भाषाओं को नहीं समझ पाने के कारण दक्षिण राज्यों के किसानों की समस्याओं को समझने में काफी दिक्कत हुई। अनुवाद संभव था। लेकिन समय के अभाव में अनुवाद नहीं किया गया। परेशानी यह भी है कि ग्रामीण क्षेत्र में हिंदी और अंग्रेजी, दोनों ही समझना किसानों के लिए कठिन है। इसके बावजूद यह जरूर स्पष्ट हुआ कि दक्षिण के राज्यों के किसान देश में सर्वाधिक कर्जदार किसान हैं। वहां भी कृषि उत्पादों के दाम लगातार गिरते जा रहे हैं। किसानांे की आत्महत्याएं भी लगातार बढ़ रही हैं। हम देश भर में कर्जा मुक्ति की मांग कर रहे हैं। लेकिन तेलंगाना और आंध्र में स्थिति अलग है। 2014 के चुनाव कर्जा माफी के मुद्दे पर लड़कर टी आर एस व तेलगु देशम ने सरकारें बनाई हैं, परंतु दोनों ही पार्टियों ने एकमुश्त कर्जा माफी से इंकार कर दिया। किश्तों में कर्जा माफी के चलते किसानों के कर्जे मंं कोई बहुत अंतर नहीं आया है। आंध्र और तेलंगाना के 82 प्रतिशत, तमिलनाडू के 74.5 प्रतिशत, केरल के 64.4 प्रतिशत, कर्नाटक के 61 प्रतिशत किसान कर्जदार हैं।
यात्रा का सबसे बड़ा उपयोग यह हुआ कि जो संगठन कभी अपने ही राज्य में एक साथ नहीं आए थे, वे एक मंच पर आए। तेलंगाना, आंध्र, तमिलनाडु में 25 से 30 किसान संगठन हर राज्य में एक साथ दिखलाई पड़े। इससे बड़ी बात यह कि किसान आंदोलन को समर्थन देने व्यापारियों, उपभोक्ताओं, बैंक अधिकारियों के संगठनों के साथ फिल्म उद्योग के नामी कलाकार भी चेन्नई में एकसाथ दिखलाई दिए। हैदराबाद और विजयवाड़ा में पूर्व न्यायाधीश और सेवा निवृत्त उच्च अधिकारी भी शामिल हुए। यानी दक्षिण भारत में किसान आंदोलन को समाज के अन्य तबकों का समर्थन भी दिखलायी पड़ा।
इस यात्रा की एक और खासियत यह थी कि इसमें मदुरै, अनंतपुर, चेन्नई और कर्नाटका के विभिन्न कार्यक्रमों में महिला किसानों की उपस्थिति अच्छी संख्या में दिखलाई पड़ी, इसी तरह जैविक खेती को लेकर काम करने वाले संगठन विशेषकर तमिलनाडु में सक्रिय दिखलाई दिए। पता चला की केरल सरकार और किसान सभा केरल में जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए विशेष प्रयास कर रही है। सरकार और पार्टी दोनों का जैविक खेती के लिए सामूहिक प्रयास अनुकरणीय है। 
केरल में किसानों को कर्जा मुक्त करने की दृष्टि से कर्जा राहत आयोग बनाया गया है, जो कर्जा ग्रस्त किसान से आवेदन प्राप्त होने पर उसकी कर्जा मुक्ति हेतु विशेष प्रयास करता है। इसमें साहूकारों के कर्ज को खत्म करने का प्रयास भी किया जाता है। यह आयोग कुछ सुधारों के साथ अन्य राज्यों के लिए भी मॉडल का कार्य कर सकता है। 
इसी तरह कर्नाटक में कृषि मूल्य आयोग (एग्रीकल्चर प्राइस कमीशन) बनाया गया है, जो खरीद भी करता है तथा तुअर, मूंग, रागी एवं अन्य फसलों के दाम भी तय करता है। कर्नाटक सरकार द्वारा किसान नेता नंदुलस्वामी की स्मृति में परंपरागत बीजों के संरक्षण, उत्पादन और किसानों को बीज उपलब्ध कराने का कार्य भी किया जा रहा है।
केरल में ट्रेड एग्रीमेंट्स के चलते रबर, काली मिर्च और अन्य उत्पादों की कीमतो में भारी गिरावट आई है। 270 रुपये की जगह रबर का 70 रुपये, 120 रुपये की कॉफी 24 रुपये किलो तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में गिरावट के कारण बिकी है। कीमतों के उतार चढ़ाव ने किसानों के जीवन को और अधिक असुरक्षित बना दिया है।
अन्य राज्यों की तरह दक्षिण भारत में भी फसल बीमा योजना का लाभ किसानों को नही मिल रहा है। देश भर में बीमा कंपनियों ने 22,000 करोड़ किसानों से प्रीमियम एकत्रित किया और केवल 8 हजार करोड़ मुआवजा दिया। यही हालत दक्षिण के हर राज्य की भी है।
यात्रा की एक और उपलब्धि यह रही कि किसानों में नई आशा का संचार हुआ है। महाराष्ट्र और राजस्थान के किसानों की जीत ने देश भर के किसानों में नई आशा का संचार किया है। दक्षिण भारत के किसानों को लगता है कि यदि महाराष्ट्र के किसान 34 लाख पांच सौ करोड़ रुपये तथा राजस्थान के किसान बीस हजार करोड़ रुपए आंदोलन से हासिल कर सकते हैं तब दक्षिण भारत के किसान क्यों नहीं ? यात्रा के दौरान इस आशा से पैदा उत्साह स्पष्ट दिखलाई पड़ा, जिसे यात्रा का महत्वपूर्ण योगदान माना जाना चाहिए; क्योंकि देश में किसानों की आत्महत्याओं के चलते निराशा का वातावरण है। महाराष्ट्र में कर्जा माफी की घोषणा के बाद 710 किसान आत्म हत्या कर चुके हैं, मध्य प्रदेश में 10 दिन में 48 आत्म हत्याएं हुई हैं, तब अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के गठन और यात्राओं से पैदा हो रहा उत्साह और नई आशा का वातावरण समन्वय समिति का विशेष योगदान माना जा सकता है।
यह पहला अवसर है जब देश के 165 किसान संगठन मिलकर पूरे देश की यात्रा कर रहे हैं। अभी तक यात्राओं में जो भी कार्यक्रम हुए हैं, उनमें संगठनों की ताकत के अनुसार किसानों ने भागीदारी की है। आम किसानों तक संदेश पहुंचाना समिति के समक्ष अहम चुनौती है। उससे ही 20 नवंबर की किसान मुक्ति संसद की सफलता तय होगी ।
हम जानते हैं कि कर्ज मुक्ति का मुद्दा नया नहीं है, देश में पहले भी सरकारों ने कर्जा माफी की घोषणाएं की हैं। आधा-अधूरा अमल भी हुआ है। तेलंगाना और आंध्र में वही पार्टियां सरकार र्में आइं, जिन्होंने कर्जा माफी का वायदा किया था लेकिन किश्तवार अमल किये जाने के चलते कर्ज माफी सिफर सिद्ध हुई है। उत्तर प्रदेश में कर्जा माफी को लेकर रोज अखबारों मै 1 पैसे से लेकर 100 रूपए की कर्ज माफी दिए जाने की खबरें पढ़ने को मिल रही हैं।
पंजाब के किसानों ने जब घोषणा पर अमल नहीं किये जाने के चलते मुख्य मंत्री के घेराव की घोषणा की तो सरकार ने प्रदेश में रातांेरात किसानों को गिरफ्तार कर लिया, छत्तीसगढ़ में भी यही हुआ। पंजाब में कांग्रेस की सरकार है, छत्तीसगढ़ में भा ज पा की, लेकिन किसानों के प्रति दोनों सरकारों में अंतर करना मुश्किल है। मध्य प्रदेश में कांग्रेस सरकार ने मुलताई में गोलीचालन कर 24 किसान मार गिराए, भा ज पा सरकार ने 6 किसानों की दिन-दहाड़े हत्या कर दी। किसान आंदोलन पर गोलीचालन रुक सके, इस मुद्दे को आज नहीं तो कल किसान आंदोलन को अपनी प्राथमिकता में लाना होगा।
किसानों के लिए तात्कालिक मुद्दा कर्जा मुक्ति है लेकिन यह कृषि संकट का हल नहीं है। कर्जा माफी के साथ किसानी की लागत से डेढ़ गुना समर्थन मूल्य तय किया जाए, यह सर्वाधिक महत्व की मांग है। अभी सरकारें गिने-चुने कृषि उत्पादों का समर्थन मूल्य तय करती हैं, जो दाम तय होता है वह भी किसानों को नहीं मिलता, सभी कृषि उत्पादों का समर्थन मूल्य तय हो, यह सभी उत्पादों की खरीद सुनिश्चित की जाए। यह मांग अखिल भारतीय किसान समन्वय समिति की ऐसी मांग है जिससे किसानों की हालत में कुछ सुधार संभव है। कांग्रेस और भाजपा दोनों स्वामीनाथन कमेटी की इस सिफारिश से सैद्धान्तिक सहमति जाहिर कर चुके हैं, भाजपा तो 2014 के घोषणा पत्र में वायदा कर चुकी है।
इसलिए दोनों मागों को लेकर कहा जा सकता है कि यदि प्रभावशाली किसान आंदोलन जारी रहा तो केंद्र और राज्य सरकारों को दोनों मांगे मानने को मजबूर होना पड़ेगा। लेकिन इसके लिए यह जरूरी है कि जिस तरह महाराष्ट्र के किसान संगठन सुकाणु समिति बनाकर एकजुट हुए, उसी तरह सभी राज्यों में किसान संगठनों की समन्वय समिति बनानी होगी। हम जानते हैं कि संसाधनों की दृष्टि से राज्य सरकारें कर्जा मुक्ति का बोझ उठाने में आर्थिक तौर पर सक्षम नहीं हैं। ऐसी स्थिति में केंद्र सरकार से कर्जा मुक्ति के लिए विशेष पैकेज लेने के लिए केंद्र सरकार के खिलाफ राष्ट्रव्यापी किसान आंदोलन छेड़ना होगा। समर्थन मूल्य केंद्र सरकार के अंतर्गत कार्यरत मूल्य आयोग तय करता है। किसानों की मेहनत का दाम उसे पूरा मिले, यह केंद्र सरकार ही सुनिश्चित कर सकती है। मनरेगा के श्रमिकों को न्यूनतम 177 रुपए, केंद्र सरकार के चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी को न्यूनतम पच्चीस हजार रुपए महीना तथा जन प्रतिनिधियों और अफसरों को पांच से सात हजार रुपए प्रतिदिन यानी डेढ़ से ढाई लाख रुपए महीना जिस आधार पर दिया जाता है, वही आधार किसानों का मेहनताना तय करने के लिए सरकार द्वारा माना जाना चाहिए। आय से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि किसानों की न्यूनतम आय भी तय कर सुनिश्चित की जानी चाहिए। सरकार कर्मचारियों के लिए अब तक 7 वेतन आयोग की सिफारिशें लागू कर चुकी है लेकिन किसानों के लिए पहला न्यूनतम आयोग भी गठित नहीं किया गया है। 
केंद्र सरकार द्वारा गत साढ़े तीन वर्षों में एक तरफ गिने चुने सौ अरबपति औद्योगिक घरानों का चौदह लाख करोड़ रुपए माफ किया जाना तथा किसानों की कर्जा मुक्ति को लेकर केंद्र सरकार द्वारा पल्ला झाड़ लेना केंद्र सरकार की किसानों के साथ भेदभावपूर्ण तथा किसान विरोधी नीति का परिचायक है। यही मसला किसानों की आय को लेकर भी है। लगभग सभी राज्य सरकारों का 70 से 80 प्रतिशत राजस्व कर्मचारियों के वेतन में खर्च हो जाता है। जिनकी संख्या 4 प्रतिशत भी नहीं है, जबकि कि केंद्र सरकार के बजट में किसानों को 3 प्रतिशत हिस्सा भी नहीं मिलता। इससे स्पष्ट है कि सरकारों द्वारा किसानों के साथ षड्यंत्रपूर्वक भेदभाव किया जा रहा है। 
फिलहाल किसान संगठनों की एकजुटता दो मुद्दों तक सीमित है। किसान सभाओं का अपना इतिहास भी है और वैचारिक आधार भी, लेकिन बाकी किसान संगठन किसानों के मुद्दों तक सीमित हैं। लेकिन फिलहाल अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति वैचारिक बहस से दूर है, अभी दो मुद्दों पर ही एकता बनी है। राजनीतिक समीक्षक डेढ़ में लगातार ताकत पा रहे किसान आंदोलन से अपेक्षा कर रहे हैं कि आने वाले एक वर्ष में किसान आंदोलन मोदी सरकार को चुनौती देने वाला अहम केंद्र बिंदु बनेगा ।
यह सर्वविदित है कि दोनों मुद्दों के समाधान भर से कृषि संकट खत्म होने वाला नहीं है, देश की अधिकतर पार्टियां किसान, किसानी और गांव को खत्म करना विकास के लिए आवश्यक मानती हैं। आत्म-निर्भर गांव संप्रभु खेती की दृष्टि पार्टियों की नहीं है। अखिल भारतीय किसान सघर्ष समिति ने भी इस विषय पर ध्यान केंद्रित नहीं किया है लेकिन यात्रा के दौरान सभी राज्यों में जैविक खेती करने वाले किसान सँगठन किसान मुक्ति यात्रा के साथ दिखाई दिए हैं। जीन संवर्धित खेती का विरोध करने वाला संगठन आशा भी कविथा कुरुघंटी के नेतृत्व में यात्रा की अगुआई करते हुए सामने आया है। चेन्नई में सेकड़ों आई. टी क्षेत्र के युवा अमरीका की एशोआराम की जिंदगी छोड़ कर जैविक खेती के क्षेत्र में अनुकरणीय पहल करते दिखलाई दे रहे हैं।
समिति ने बिखरे हुए किसान आंदोलन को एकजुट करने की प्रशंसनीय कोशिश की है। किसानों, खेतिहर मजदूरों, महिला, आदिवासी किसानों और दलित भूमिहीन किसानों का एक बृहद मोर्चा बनाया है। अगली यात्रा 2 अक्टूबर से चंपारण से शुरू होनी है, जो 11 अक्टूबर को गजरौला में समाप्त होगी।
यात्रा के दौरान कृषि संग्राम संघर्ष समिति के किसान नेता अखिल गोगई की राष्ट्रद्रोह का मुद्दा हर सभा में उठाया गया तथा उनको तत्काल बिना शर्त रिहा करने की मांग भी की गई। सभी सभाओं में जैविक खेती के जनक नामलबार के योगदान को भी याद किया गया। सुश्री मेधा पाटकर के नेतृत्व में नर्मदा बचाओ आंदोलन की गूंज भी यात्रा के दौरान सुनाई दी। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के बावजूद चालीस परिवार किसान परिवारों की तीस हजार हेक्टेयर जमीन डुबाए जाने की निंदा दक्षिण भारत के किसान संगठनों के नेताओं द्वारा लगातार की गयी। 
यह पहला अवसर नहीं है जब किसानों ने सफलता पाई है, मोदी जी के सत्ता में आने के बाद जब उन्होंने 3 बार भूमि अधिग्रहण संबंधी अध्यादेश लाने का प्रयास किया तब देश में भूमि संघर्ष में लगे संगठनों ने भूमि अधिकार आंदोलन बनाया जिसने सरकार को नया कानून बनाने से रोकने में साफलता पाई। यह बात अलग है कि इस समय देश में जो कानून लागू है उसको सरकार लागू करने को तैयार नहीं है। परंतु अंग्रेजों के जमाने के 1894 के कानून को रद्द कराना कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। इस बदलाव को लाने में 30 सालों से सक्रिय जनांदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय की अहम भूमिका है, एन ए पी एम और भूमि अधिकार आंदोलन आज अखिल भारतीय किसान संघर्ष समिति के साथ खड़े है जिससे समिति की दोनों मुद्दो पर जीत सुनिश्चित दिखाई पड़ती है।                        
यात्रा के बाद आंध््राा के एक किसान की निम्नलिखित टिप्पणी पूरी यात्रा के संबंध में दक्षिण भारत के किसानों की समझ बतलाती है। 
‘‘पूरे भारत में कृष्णा और गोदावरी नदियों के इर्द गिर्द का इलाका सबसे अधिक उपजाऊ है। यहां के किसान धान और रागी की उपज के लिए पूरी दुनिया में मशहूर हैं। लेकिन आंध्र प्रदेश की सरकार इस पूरे तटीय उपजाऊ इलाके को औधौगिक क्षेत्र में बदल देना चाहती है। यहां के लोगों का कहना है कि चंद्र बाबू नायडू अपने आपको इंद्र समझता है। उसका इरादा है कि वह अपनी भावी राजधानी मतलब अमरावती को भव्य बनाए। लेकिन उसका मानना है की भव्यता किसानी से नहीं आ सकती है। भव्यता केवल औद्योगिक क्षेत्र में बदल जाने से आएगी। इसलिये आंध्रा की सरकार अपने इरादे को अंजाम देने के लिए हमारी जमीनें विकास के नाम पर, इंडस्ट्रियल कॉरिडोर के नाम पर हड़प रही है। हमारी बातें कोई नहीं सुनता। आपका यहाँ आना हमारे अंदर आस जगाता है। हम आपके साथ हैं। हम समझ चुके हैं कि जब तक सत्ता में हिस्सेदारी नहीं मिलेगी तब तक हम नायडू जैसे नेता हमें बेकार करते रहेंगे। यकीन मानिये 20 नवम्बर को एक हमारा जत्था भी किसान मुक्ति यात्रा के साथियों के साथ दिल्ली कूच करेगा।’’
 
 
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