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ईश्वर के देश में

उमेश चौहान

हरीतिमा का वल्कल ओढ़े
सह्याद्रि की गोद में शीश टिकाए
स्वच्छ रेत की चमकीली परतों का
सुंदर पादासन सजाए (महाकवि वल्लत्तोल)
 
सदाबहार हरियाली से भरी  केरल की धरती पर पैर रखते ही मलयालम के महाकवि वल्लत्तोल की उपरोक्त काव्य - पंक्तियां अनायास ही मन में गूंजने लगती हैं. केरल हरियाली के अजस्र सौंदर्य से भरा एक ऐसा प्रदेश है, जिसे पर्यटन- जगत में ‘गॉड्स ओन कन्ट्री’ (ईश्वर का अपना देश) के नाम से जाना जाता है. यहां का प्राकृतिक सौंदर्य ऐसा विशिष्ट है कि आप चाहे जिस मार्ग से केरल में प्रवेश करें, आपको उसमें प्रवेश करते ही पता चल जाता है कि केरल आ गया. यदि आप सड़क या रेल मार्ग से केरल आ रहे हैं, या चाहे आप तमिलनाडु के कोयंबटूर के रास्ते से या फिर धुर दक्षिण में कन्याकुमारी के रास्ते से या फिर ठीक उत्तर में कर्नाटक के मंगलौर या पश्चिमी घाट के उस पार मैसूर के रास्ते से, आपको केरल की सीमा में प्रवेश करते ही पता चल जायेगा कि आप तमिलनाडु या कर्नाटक को पीछे छोड़ चुके हैं. तमिलनाडु से सड़क मार्ग से केरल में प्रवेश करने के दो और रास्ते भी हैं, एक मदुराई - तेनी होकर तेक्कडी पहुंचता है, दूसरा तिरुनेल्वेली से चेंकोट्टा होकर कोल्लम की तरफ पहुंचता है. यह दोनों ही मार्ग वन्य प्रदेशों से गुजरते हैं और अद्भुत प्राकृतिक सुंदरता से भरे हैं, पर अधिकांश पर्यटकों को अभी इनकी जानकारी नहीं है. यदि आप हवाई मार्ग से केरल में प्रवेश करते हैं तो आपको विमान में बैठे - बैठे ही नीचे की हरियाली देखकर अंदाज़ा लग जाता है कि आप केरल की वायु - सीमा में प्रवेश कर चुके हैं. जब आप तिरुवनंतपुरम, कोच्चि या कालीकट के हवाई अड्डे पर उतर रहे होते हैं तो यही लगता है कि आप नारियल के पेड़ों के ऊपर बनी किसी हरीभरी काल्पनिक पट्टी पर लैंड करने वाले हैं. रन वे तो तभी नज़र आता है, जब आपका विमान बिल्कुल ज़मीन को छूने वाला होता है.   
 
सड़क या रेल मार्ग से केरल की सीमा में घुसते ही आपको हरे -भरे नारियलों के झुरमुट अनंत विस्तार के साथ दिखाई देने लगते हैं. पश्चिमी घाट की सदाबहार वनों से ढंकी पहाड़ियां मन में अजीब-सा आकर्षण भरने लगती हैं. मध्यवर्ती केरल की ऊंची - नीची ज़मीन पर फैला प्रकृति का अप्रतिम संयोजन सामने आता है. नीची समतल ज़मीनों पर साल में दो या तीन बार बोई जाने वाली धान की फसल लहराती हुई लगभग हर मौसम में आपका स्वागत करती है. इन सब नैसर्गिक चमत्कारों के बीच आपको नदियों व झीलों और बैकवाटर्स का ऐसा सुंदर जाल फैला हुआ नज़र आता है कि आप मंत्रमुग्ध हो जायें. जब आपकी कार या रेलगाड़ी केरल की इन सदानीरा नदियों और झीलों के ऊपर बने पुलों से होकर गुजरती है, तब आप उनके तटों पर प्रकृति के उस सौंदर्य-लीला का दर्शन करते हैं, जो अन्यत्र दुर्लभ है. ऐसे में मुझे तो हमेशा कवि मित्र स्वर्गीय कुबेर दत्त की कविता याद आती है,‘हरित सूर्य है/ हरित चांद है/ हरित धूप है/ हरित चांदनी/ हरित नाव है/ हरा पाल है/ हरा समंदर/ हरित हरित की हरित ऊष्मा/ मेरे हिय को आंच रही है. केरल का पर्यटन दृष्टिह से यदि उसका भौगोलिक बंटवारा किया जाये तो इसे तीन भागों में बांट सकते हैं. पहला बीच और बैकवाटर पर्यटन, दूसरा पर्वतीय और वन्यट क्षेत्र और तीसरा सांस्कृैतिक, ऐतिहासिक धरोहरों वाले स्थल. 
मेरा केरल में करीब बारह साल बीता हैं और वहां के चप्पे-चप्पे को मैंने देखा और समझा है. वैसे सैलानियों के सबसे प्रिय स्थल तिरुवनंतपुरम और कोच्चि जैसे शहर, कोवलम, वर्कला जैसे बीच, कुमरकम और अलेप्पी जैसे बैकवाटर के किनारे , मून्नार और पीरमेड जैसे पहाड़ी कस्बे और परंबीकुलम,तेक्कडी जैसे वन्य क्षेत्र आकर्षण हैं, लेकिन यदि कोई मुझसे पूछे तो मैं कहूंगा कि केरल का हर कोना ऐसा है, जहां प्राकृतिक सुंदरता अपने चरम पर बिखरी है, अत: यदि केरल का असली आनंद लेना है तो इन भीड़-भाड़ वाले पर्यटन केंद्रों के बजाय लोगों को कम लोकप्रिय स्थानों पर जाकर रुकना चाहिए और केरल की अनछुई प्राकृतिक सुषमा का आनंद लेना चाहिए. आज केरल के तमाम ऐसे रमणीक स्थानों पर रिसॉर्ट और आयुर्वेदिक चिकित्सा केंद्र खुल गये हैं, जिनके बारे में राष्ट्रीय स्तर पर ज्यादा प्रचार-प्रसार नहीं है. उत्तरी केरल के पर्वतीय जिले वायनाड में ही ऐसे सैकड़ों नेचर रिसॉर्ट खुल चुके हैं, जो धीरे-धीरे विदेशी सैलानियों के बीच अत्यधिक लोकप्रिय होते जा रहे हैं. केरल के दूर-दराज़ के गांवों में भी होम स्टे की सुविधाएं विकसित हो रही हैं. इन सुविधाओं के अंतर्गत लोगों को घर में ठहरने जैसी अनुभूति होती है, स्थानीय आहार का आनंद मिलता है और पांच सितारा होटलों की अपेक्षा इनका किराया भी काफी सस्ता है. होम स्टे करते समय आप लोगों से आसानी से घुलते - मिलते हैं और उनकी सांस्कृतिक और इलाकाई परिवेश को करीब से अनुभव करते हैं. केरल इस मामले में भारत के अन्य प्रांतों से अलग है, क्योंकि यहां आम लोगों के मन में आतिथ्य भाव बहुत ज्यादा है और वे अतिथियों का अत्यधिक सम्मान करते हैं. केरल में आपराधिक प्रवृत्ति भी काफी कम है, अत: लोग निश्चिंत होकर आंतरिक अंचलों में अथवा गांवों में रह सकते हैं और रात-बिरात सुरक्षित ढंग से घूम-फिर सकते हैं.
 
केरल की यात्रा का सबसे बढ़िया समय तो जाड़े का होता है अर्थात नवंबर से लेकर फरवरी तक का. इन महीनों में गर्मी बहुत कम पड़ती है, बरसात भी ज्यादा नहीं होती, वातावरण साफ - सुथरा रहता है. समुद्री बीचों पर भी इन महीनों में आर्द्रता ज्यादा नहीं होती और पसीना वगैरह ज्यादा नहीं निकलता और ठंडी हवा बड़ा ही सुकून देती है. हांलाकि, यदि केरल के त्योहारों, विशेष रूप से ओणम के उत्सव का आनंद लेना है, तब तो यात्रा अगस्त - सितंबर के महीनों में ही करनी चाहिए. ओणम केरल का विशिष्ट त्योहार है, जो दस दिन चलता है. लेकिन ओणम से जुड़ी नौका - दौड़ प्रतियोगिताएं करीब माह भर चलती हैं. इन्हें देखने का अनूठा आनंद है. इनमें भाग लेने वाली स्नेक बोट (केट्टु वल्लम) विशेष तरह से बनी लंबे आकार वाली नौकाएं होती हैं, जिनका इस्तेमाल आम तौर पर कृषि-उपज, अन्य माल और बालू आदि को ढोने के लिए किया जाता है. बड़ी पारंपरिक केट्टु वल्लम में तो करीब सौ नाविक एक साथ बैठकर चप्पू चला सकते हैं. जब इतने सारे लोग एक साथ बैठकर नौका -दौड़ से जुड़े पारंपरिक गीत गाते हुए पूरे जोशो-खरोश के सहित एक लय में चप्पू चलाते हैं, तब एक अद्भुत समां बंधता है.  दर्शक अंर्तनाद करते हुए इन नाविकों में उत्साह का संचार करते हैं. नौका-दौड़ दक्षिण केरल के करीब हर जिले में आयोजित होते हैं और इनकी तिथियां पहले से तय होती हैं अत: पर्यटक उनके अनुसार अपनी यात्रा की प्लानिंग कर सकते हैं. ओणम के उत्सव-काल की एक और विशेषता है, जगह-जगह आयोजित होने वाली पुष्पालंकार प्रतियोगिताएं. ओणम के समय स्कूलों,कॉलेज़ों,दफ़्तरों,क्लबों,सांस्कृतिक केन्द्रों में कई सामाजिक संस्थाओं में पुष्पालंकार प्रतियोगिताएं आयोजित करने की होड़ मच जाती है.  कई तरह की आकृतियों में अनेक प्रकार के रंगों वाले फूलों का इस्तेमाल कर पुष्पालंकार किए जाते हैं. इन्हें देखने का आनंद अवर्णनीय होता है. कुछ ऐसा जिसे आप सिर्फ़ महसूस कर सकते हैं, बता नहीं सकते. ओणम के दिन लोग अपने घरों को भी पुष्पालंकार और रंगोलियों से सजाते हैं. ओणम के अलावा यदि केरल के त्योहारों का आनंद लेना है तो सबसे अच्छा समय होता है क्रिसमस का. क्रिसमस के सप्ताह में होटलों और बाज़ारों में विशेष साज-सज्जा होती है, जगह-जगह मेले लगते हैं और कार्निवल आयोजित होते हैं, जिनमें केरल की सांस्कृतिक विरासत खुलकर प्रदर्शित होती है. 
 
केरल के समुद्री - तटों की लोकप्रियता काफी पहले से है. विश्व में कोवलम के तट की जैसी काली रेती शायद ही किसी बीच पर पाई जाती हो. इसीलिए इस बीच का आकर्षण सारी दुनिया में व्याप्त है. लेकिन धीरे-धीरे उत्तरी केरल में स्थित बेकल बीच की लोकप्रियता भी काफी बढ़ी है. हाल के वर्षों में समुद्री बीचों से भी ज्यादा लोकप्रिय हुए हैं केरल के बैकवाटर. ये बैकवाटर झीलें अथवा जलाशय हैं, जो समुद्र से अलग होकर बने हैं. इनके पानी में खारापन होता है. कभी-कभी ऊंचा ज्वार-भाटा आने पर इनमें समुद्री पानी आ जाता है, जो इनके खारेपन को बढ़ा देता है. चूंकि इनमें बरसात का पर्याप्त सामान्य जल निरंतर समाविष्ट होता रहता है, इससे इनके पानी का खारापन संतुलित बना रहता है. इन बैकवाटर झीलों के किनारे - किनारे से निकलने वाली पतली - पतली जल - धाराएं कहीं - कहीं मीलों दूर तक फैली हुई होती है, जिनके किनारे की निचली ज़मीनों पर खेती होती है और तटबंधों पर तमाम लोग रहते हैं. यहां की खेती का तरीका एकदम अलग होता है. यहां के लोगों का जीवन भी अलग तरह का होता है. मुख्य भूमि से इनका संपर्क केवल जल-मार्ग से ही होता है. अलेप्पी जिले का कुट्टनाड क्षेत्र इस तरह की प्राकृतिक स्थिति एवं आबादी का एक सर्वोत्तम उदाहरण है. यह वेम्बानाड नामक बैकवाटर सिस्टम का एक हिस्सा है. इसी विशाल बैकवाटर झील के दूसरे छोर पर कोट्टयम जिले का सुप्रसिद्ध पर्यटन केंद्र कुमरकम स्थित है. उत्तर की तरफ यह बैकवाटर एरणाकुलम शहर और फोर्ट कोच्चि द्वीप तक विस्तृत है. आज इस बैकवाटर में एक हज़ार से भी ज्यादा हाउस बोट संचालित हो रहीं हैं, जो पर्यटकों का विशेष आकर्षण हैं. केरल जाने वाला हर सैलानी कम से कम एक रात बैकवाटर की हाउसबोट में जरूर बिताना चाहता है. ये हाउस बोट कई आकार वाली केट्टु वल्लम के ऊपर एक ढांचा खड़ा करके ही बनायी जाती हैं, जिनमें वातानुकूलित और गैर- वातानुकूलित दोनों तरह के एक या दो कमरे, टॉयलेट, बैठका सभी कुछ होता है. पर्यटकों की रुचि के अनुरूप बोट - संचालक खाने - पीने की सारी व्यवस्था भी कर देते हैं. रात में झील के बीचोबीच हाउसबोट में रात बिताने का अनुभव निश्चित ही अनूठा होता है, खास तौर पर हनीमूनर्स के लिए.         
 
केरल की सांस्कृतिक विरासत में रुचि रखने वालों को वायनाड जिले की प्रागैतिहासिक काल की एडक्कल गुफाओं से लेकर शंकराचार्य के जन्म-स्थल कालडी, अध्यात्म रामायण के रचयिता एषुतच्छन के जन्म-स्थान तुंचनपरंब, गुरुवायूरप्पन मंदिर, पद्मनाभस्वामी मंदिर, भारत की सबसे पुरानी सेंट फ्रांसिस चर्च, फोर्ट कोच्चि का यहूदी सिनॉगाग, केरल की पारंपरिक कलाओं के पोषण का केंद्र-कलामंडलम, केरल की पारंपरिक मार्शल आर्ट कलरीपयट्टु के प्रशिक्षण केंद्रों तक में कई दिन बिताने का मन हो सकता है. वन- वैभव के प्रेमियों के लिए साइलेंट वैली और नीलगिरि की पर्वत श्रृंखलाओं में अन्यत्र दुर्लभ वनस्पतियों और वन्य प्राणियों के दर्शन हो सकते हैं. मनमोहक केरल के बारे में अन्त में मैं फिर कुबेर दत्त जी की काव्य पंक्तियों, ‘ऐसी मनहर शाम कि जिसमें/ ताड़ - सुपाड़ी/ नारिकेल, कटहल केले के/ हहराते हैं हरे समंदर, अंतरिक्ष तक/ मेरा सब अभिमान तिरोहित/ मैं कुर्बान देखकर ऐसी संध्या लोहित’ को उद्धृत करते हुए इतनी ही कहूंगा कि यदि किसी ने केरल नहीं देखा है, तो उसने प्रकृति के एक अनूठे वरदान से अपने को वंचित कर रखा है.
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  • दीव का समुद्र
  • लॉस वेगास में सिमटी सारी दुनिया
  • बारिश नहीं मिली फिर भी, घाटशिला ..
  • गांव होते शहर
  • इच्छामती में कामनायें बहती हैं
  • रात में शिमला
  • शहर में बदलता भवाली गांव
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  • नैनपुर अब कोई ट्रेन नहीं आएगी
  • शंखुमुखम समुद्र तट के किनारे
  • बदलती धरती बदलता समुद्र
  • सपरार बांध के डाक बंगले तक
  • संजय गांधी ,तीतर और बाबू भाई
  • गांव ,किसान और जंगल
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