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साफ़ हवा के लिए बने कानून नेहरू से कौन डरता है? चालीस साल पुराना मुकदमा ,और गवाह स्वर्गवासी चार दशक बाद समाजवादी चंचल फिर जेल में
यनम : इतना निस्पन्द !

सतीश जायसवाल 

हम जिस होटल में ठहरे हैं उसके ठीक सामने ''यनम गेट'' है। हमारा होटल आन्ध्रप्रदेश में है और ''यनम गेट'' से पुडुचेरी लग जाता है। दो अलग-अलग राज्यों के बीच में बस एक सड़क का फासला है। होटल की खिड़की से देखने पर यनम की बसाहट दूर तक फैली हुयी दिख रही है। और उससे भी दूर की तरफ नारियल के पेड़ों का घना हरा विस्तार है। आभास होता है कि उस घने विस्तार के ठीक पीछे समुद्र लहराता होगा। लेकिन समुद्र को तो हम पीछे छोड़ आये थे। वहाँ, काकीनाड़ा के पास, जहां गोदावरी नदी उससे मिल रही थी। 
 
कोई नदी जहां अपने समुद्र से मिलती है, अपने पूरे रूप वैभव से साथ मिलती है। वह दिव्य दृश्य होता है। उसमें एक प्राणिकीय स्पर्श मिलता है। लेकिन यह स्पर्श भूगोल के किसी नक़्शे में नहीं मिल सकता। नक्शा तो बस वहाँ तक पहुंचने का रास्ता बताकर वहीं स्थगित हो जाता है। हम रास्ता ढूंढ रहे थे जहां गोदावरी नदी अपने समुद्र से मिलती है, काकीनाड़ा के पास बंगाल की खाड़ी में। लेकिन हम काकीनाड़ा से आगे निकल आये थे और सीधे यनम पहुंच गये। 
 
यनम गोदावरी नदी के डेल्टा में बसा है।  कोई ९-१० किलोमीटर पहले, जहां गोदावरी की एक सहायक नदी --कोरिंगा आकर उससे मिलती है वहाँ, यह डेल्टा बनता है। ''यनम टॉवर'' पर से देखने पर दोनों नदियों का मिलना दिखता है। स्थूलकाय गोदावरी और कृशकाय कोरिंगा। उससे आगे समुद्र होगा, जो हम पीछे छोड़कर आगे निकल  आये थे। मैंने डेल्टा से और आगे देखने की कोशिश की। लेकिन सामने क्षितिज था। उससे आगे कुछ नहीं। इधर तेल के कुँओं से आग की लपकेँ उठ रही थीं और गोदावरी के जल में आग की परछाँइयाँ पड़ रही थीं। ''यनम टावर'' पर से देखने पर पानी में आग दिख रही थीं। गोदावरी नदी के बेसिन में तेल के कुँए हैं। उनसे आग की लपटें उठती रहती हैं। इन कुँओं पर रिलायंस का अधिकार है। 
 
फ्रांसीसियों के बाद अब उनके इस उपनिवेश पर रिलायंस समूह का औद्योगिक साम्राज्य है। लेकिन उस उपनिवेश की स्मृतियों को बचाकर रखने के लिए रिलायंस ने यहाँ "यनम टावर" बनवाया है। पैरिस के मशहूर "एफिल टावर" की प्रतिकृति। इस पर से दूर तक दिखता है। लेकिन इसके लिए टिकट खरीदना पड़ता है। दूर तक फ़ैल रही शाम को इतने ऊपर से निहारना एक मायावी अनुभव था। उस मायावी अनुभव से बाहर निकलना कुछ भारी-भारी सा लगा। बाहर सुनसान था। 
 
नदी के साथ चल रही काली, चिकनी सड़क शाम के उस समय सूनी थी। दूर तक बस हम थे। उस सूनी सड़क पर हम देर तक अकेले चलते रहे। यहां तक कि रिलायन्स की औद्योगिक बस्ती सामने आ गयी। लेकिन रास्ते भर कोई लोग नहीं दिखे। बस नदी थी,साथ पकड़कर चलती हुयी। शायद अँधेरे में अकेली छूट जाने से नदी डर रही थी। 
 
पता नहीं क्यों, डोर बाँधकर सीधी लकीर में खींची हुयी सी गोदावरी नदी किसी नदी से अधिक कोई बहुत बड़ी नहर सी लगती रही। हमारे मन में जो नदी होती है वह बाँक लेती हुयी चलती है। लहराती है। उस पर नावें चलती हैं और लोगों को उस पार उतारती हैं। लेकिन गोदावरी कुछ अलग-अलग सी मिली। नदी से कुछ अलग। फिर भी यह एक गहरी नदी है। इस पर बड़ी, मालवाहक नावें चलती हैं। ये नावें उस पार नहीं उतारतीं बल्कि दूर की तरफ ले जाती हैं। दूर,समुद्र की तरफ। 
 
हमने एक ''स्पीड बोट'' ली। और नदी पर चक्कर लगाया। बोट वाले ने गहरी नदी पर तरह तरह के करतब दिखाये। लेकिन नदी के साथ जुडी कोई प्रेम-गाथा नहीं सुनाई। गहरी नदी के पास गहरा मन होता है। और गहरे मन में कोई पुरानी प्रेम कहानी दबी होती है। शायद गोदावरी सूने मन की नदी है। नदी तट पर पुलिस की चौकी है। पुलिस के सिपाही तट पर मुस्तैद हैं और बराबर चक्कर लगा रहे हैं। ध्यान रख रहे हैं कि नदी में कोई दुर्घटना ना होने पाए। गोदावरी गहरी नदी है और उसमें डूबने का डर है।  
 
यनम पुलिस की टोपी अभी तक लाल रंग वाली वही फ्रांसीसी टोपी है जो उन लोगों के समय में रही होगी। महिला सिपाहियों की टोपी भी ऐसी ही है। एक जैसी। और उन पर अच्छी सजती है। ''यनम गेट'' से भीतर होते ही मैं उपनिवेश-काल के वो पुराने निशान ढूंढने लगा था जिनका ३०० वर्षों का जीवन-काल रहा है। इन ३०० वर्षों में यहां डच भी रहे और फ्रांसीसी भी आये। लेकिन उन दिनों के कोई बकाया निशान अभी तक नहीं मिले थे। ना देखने में, ना उनके स्पन्दन में। यनम पुलिस की लाल रंग वाली फ्रांसीसी टोपी ने उन दिनॉ का पहला भरोसा कराया। 
 
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फ्रांसीसियों से पहले उनके इस उपनिवेश पर, डचों का आधिपत्य था। लेकिन अब यहां डच बचे और ना फ्रांसीसी, सिवाय उन 10 फ्रांसीसी परिवारों के जो अब यहीं के हैं। लेकिन हम उन्हें ढूंढ नहीं पाये। ढूंढते तो उन तक पहुँच सकते थे। मैंने पता भी कर लिया था कि यहाँ के म्युनिसिपल स्कूल के पास ही कहीं वो लोग रहते हैं। लेकिन मन में एक दुविधा थी। एक मनुष्य जाति को किसी समय के अवशेष की तरह देखना कहीं उनके मन को दुखा गया तो ? सन १९५६ के बाद से तो अब यहां फ्रेंच पढ़ाई भी नहीं जाती जो उनके अपने पूर्वजों की मातृभाषा रही है। अब इन  बच गए परिवारों के लोग शायद अपने घरों में ही फ्रेंच में बोलते-बात करते होंगे, जो उनके पास छोड़कर उनके पूर्वज यहां से चले गये।  
 
फिर भी उनको देखना एक मनुष्य जाति को लगभग ३०० वर्षों की उस निरन्तरता में देखने का रोमांच तो होता ही, जिसे अब इतिहास में स्थगित हो जाना है। वैसे ही, जैसे कहीं तक पहुँचने का रास्ता बताकर किसी नक़्शे का भूगोल में स्थगित हो जाना। इसमें फ्रांसीसियों का आना और डचों का जाना, दोनों शामिल है। यनम सन १७३१ ई० में फ्रांसीसियों के अधिपत्य में आया था। तभी वहाँ के लोग यहां आये होंगे। और उन लोगों ने डचों को यहां से जाते हुए देखा होगा, जो उनसे पहले यहाँ आये थे। 
फिर भी मेरा अनुमान था कि उन औपनिवेशिक दिनों का कुछ स्पर्श, कुछ गन्ध, कुछ अनुभूति यहां बाकी होगी।  जैसे वहाँ, पश्चिम बंगाल के चन्दन नगर में वह अब तक बची हुयी है। वहाँ के पुराने घरों के ऊंचे कमानीदार दरवाजों-खिड़कियों में और फ्रेंच स्थापत्य वाले चर्चों के मेहराबों-कंगूरों में। और तो और उन चर्चों में आने वाले धर्मानुयाइयों के दिखने में। और उनके जातीय-सामाजिक संस्कारों में भी। चन्दन नगर भी यनम की तरह एक   फ्रेंच उपनिवेश रहा है। और इसकी ही तरह फ्रांसीसियों से पहले डचों के आधिपत्य में रहा। 
 
पुदुचेरी का फ्रांसीसी उपनिवेश 4 भौगोलिक-प्रशासनिक खण्डों में बँटा हुआ था -- पुदुचेरी, कराईकल, माहे और यह, यनम। यह पुदुचेरी से ८७० किलोमीटर की दूरी है। और आन्ध्रप्रदेश के साथ लगा हुआ है। यहां पहुँचना आन्ध्र के ही किसी हिस्से में पहुंच जाने जैसा लगा। बोली-बानी में, पहरावे-ओढ़ने में और रीति-रिवाजों में ,भी।
 
दूसरे दिन हमेँ, यहाँ के चर्च में हो रहे एक विवाह-संस्कार को देखने का अवसर मिल गया। वर-वधू सहित, उसमें शामिल सभी लोग स्थानीय तेलुगुभाषी ईसाई थे। और विवाह की उनकी विधियां वही देसी-स्थानीय थीँ जो उनके पूर्वजों के समय में भी रही होंगी। इन लोगों ने अपने यहां की विवाह विधियों और अन्य रीति-रिवाजों को उन दिनों में भी बनाये रखा था जिन दिनों यहाँ फ्रांसीसियों का अधिपत्य था। यहाँ और आसपास के स्थानीय समुदायों में  बाल- विवाह का चलन लम्बे समय तक रहा है। ब्रितानी भारत में बाल-विवाह प्रतिबन्धित हो जाने के बहुत दिनों बाद तक भी। आसपास के लोग यहां,यनम में आकर बाल-विवाह कराया करते थे। बाल-विवाह का निषेध करने वाला शारदा कानून यनम में बहुत बाद में लागू हुआ। 
 
ऐंग्लो-इण्डियनों की तरह फ्रांसीसी और स्थानीय रक्त के मेल-मिलाप से उपजी नस्ल को ''क्रियोल'' कहा गया। लेकिन यनम में स्थानीय समुदायों के साथ ऐसा घुलना-मिलना शायद कम हुआ। अलबत्ता यहां के अधिकाँश तेलुगुभाषी स्थानीय लोगों ने अपनी स्थानीयता को बनाये रखते हुए फ्रांस की नागरिकता लेना पसंद किया।
 
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किसी औपनिवेशिक नगर या पुराने पत्तन की पुरातनता तक पहुँचने का एक आजमाया हुआ तरीका मेरे पास है। वहाँ की सबसे पुरानी किसी शराब की दुकान तक पहुंचते ही उस पुरातनता की आहट मिलने लगती हैं। मैंने अपना वही तरीका यहां भी आजमाने की कोशिश की। यनम में शराब सस्ती है। इसलिए, विशाखापत्तनम और आसपास के शौक़ीन लोग शराब पीने के लिए यहाँ चले आया करते हैं। वैसे कुछ शौक़ीन लोग तो दिखे और शराब की दुकानें भी दिखीं। लेकिन शराब की वैसी कोई पुरानी दुकान नहीं मिली जिसके पास उस पुरातनता की आहट हो रही हो। ऐसी कोई पुरानी दुकान यहाँ होगी जरूर, लेकिन हम वहाँ तक पहुँच नहीं पाए। यनम १९६३ में विधिवत भारत संघ के केंद्र प्रशासन के अंतर्गत आया। लेकिन विलय के इन ५०-६० वर्षों के छोटे से समय-काल में ही ३०० वर्षों का लम्बा उपनिवेश-काल यहां इतना निस्पन्द हो चुका है कि उसकी आहट तक नहीं मिल रही है ! 
 
आज का यनम पूरे तौर पर इन ५०-६० वर्षों की एक नयी बसाहट है। किसी मध्यम दर्ज़ा औद्योगिक बस्ती जैसी। करीने से बसाई गयी कालोनियां। साफ़-सुथरी सड़कें। और उन पर तरतीब से की गयी रोशनियां। मुख्य सड़क के दोनों किनारों पर, हमारे अपने समय के राजनेताओं की, प्रतिमाओं की कतारबद्ध सजावट। सभी प्रतिमाएं सुनहरे रंग के पानी से एक जैसी रंगी हुयी हैं। देखने में, यह सजावट अरुचिपूर्ण लगती हैं। और विचार में, कहीं-कुछ खटकता भी है। 
 
डचों और फ्रांसीसियों के पास उनका अपना मूर्ति शिल्प था। सेरामपुर और चन्दननगर जैसे उनके दूसरे उपनिवेशों में उनका अपना मूर्तिशिल्प उनके शासकों और इतिहास नायकों की प्रतिमाओं में दिखता है। लेकिन यहाँ, यनम में उनकी कोई प्रतिमा नहीं दिखी। शायद हटा दी गयी होंगी। या शायद, हम वहाँ नहीं पहुँच सके हैं। अभी तक तो हम लोग वहाँ भी नहीं पहुँच सके थे जहां वो लोग रहा करते होंगे। उनके घर, उनके बाज़ार। कुछ ना कुछ तो वहाँ फिर भी बाकी होगा ! लोगों की स्मृतियों में, किस्से-कहानियों में। 
 
चाहे नदी के पास यहां कोई प्रेम-कहानी नहीं है , लेकिन ३०० बरसों के इतने लम्बे दिन बिना किसी कहानी के कैसे हो सकते हैं ? यनम में फ्रांसीसी भूतों की कहानियां भी बताई जाती रही हैं। फ्रांसीसी भूत और उनके करतब हमारे यहां के भूतों और उनके करतबों जैसे ही रहे होंगे या उनसे कुछ अलग ? यह जानने की जिज्ञासा होती है। श्मसान और वीराने हमारे यहां के भूत-प्रेतों के रहने और उनके मिलने की जानी-पहिचानी जगहें होती हैं। तो फ्रांसीसी भूत भी यहाँ ऐसी ही किन्हीं जगहों में रहते होंगे। और रातों में निकलते होंगे। कल, जब हमको यहाँ से निकलना है तब ऐसा हो सकता है कि जाते-जाते हम वहाँ पहुँच जाएँ और उनका पता मिलने लगे। 
 
यनम में डच या फ्रांसीसी शासकों और उनके इतिहास नायकों की कोई प्रतिमा नहीं दिखना एक खटकने वाली बात भी थी। लेकिन फ्रेंच शासकों की स्मृति में एक चर्च यहां जरूर है। सेन्ट ऐन्स कैथलिक चर्च फ्रेंच शासकों की स्मृति में बनवाया गया था। यह, यहां के पुराने चर्च से बाद का है। यनम का पुराना चर्च तो १७६९ का है।  लेकिन शासकों की स्मृति में बनवाया गया सेन्ट ऐन्स चर्च १८४६ का है। यूरोपीय शिल्प में बने इस चर्च का शिलान्यास किन्हीं फादर मिशेल लेकनम ने किया था। लेकिन चर्च के पूरा होने से पहले ही उनकी मृत्यु हो गयी। हो सकता है कि उनकी अतृप्त आत्मा अभी तक यहां भटकती होगी। 
 
चर्च के सामने ही पुरानी सिमेट्री है। वह धूप में निस्पन्द पड़ी हुयी मिली। सिमेट्री के भीतर वीराने का वास था। और दरवाज़े पर पड़ा हुआ ताला, मालूम नहीं कब से नहीं खुला था। शायद अरसे से यहाँ किसी का आना-जाना नहीं हुआ था। किन्हीं के नाते-रिश्तेदार भी शायद अब उतनी दूर, फ़्रांस से चलकर यहाँ नहीं आते होंगे। 
 
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डचों के पास नील की खेती करने का कौशल था। उन्होंने अपना यह कौशल भारतीयों को  सिखाया था। वहाँ, बंगाल के सेरामपुर और चन्दन नगर में तो स्थानीय लोगों को नील की खेती करने का कौशल डचों ने ही सिखाया था। यहाँ, यनम में भी सिखाया होगा। उनके समय में यनम नील का एक बड़ा व्यापारिक केंद्र रहा होगा। यहां से उनके व्यापारिक जहाज गोदावरी नदी के रास्ते समुद्र के लिए निकलते होंगे। और दूर देशों तक जाते होंगे। अब यहाँ उन दिनों के नील के कुँओं के अवेशष भर रह गए हैं। नील का रोज़गार-व्यापार नहीं।  
 
यनम में कोई बड़ा युद्ध हुआ हो, ऐसा कोई उल्लेख नहीं मिलता। फिर भी डचों ने यहां, पास के ही एक गांव -- नीलपल्ली में अपने लिए एक किला बनवाया था। शायद, किले में उनका खजाना रहा होगा। यहां उनकी अपनी टकसाल भी थी। वहाँ मुद्राएं ढाली जाती थीं। वहाँ जाने और उस टकसाल को देखने का मन था। लेकिन अब वहाँ ना उनका किला बचा और ना ही उनकी टकसाल। डचों के जाने के बाद यनम फ्रांसीसियों का हो गया। और नीलपल्ली गांव अंग्रेजों के आधिपत्य में आ गया। 
उन दिनों मंगलवार के दिन भरने वाला, यनम का साप्ताहिक हाट ''मंगलावरम'' बड़ा प्रसिद्द था। उसकी प्रसिद्धि वहाँ मिलने वाले इम्पोर्टेड सामानों के लिए थी। और उन दिनों में भी भारतीयों को ''इम्पोर्टेड'' सामान ललचाता था। इसके लिए दूर-दूर से लोग यहां आते थे। यह देखकर अंग्रेजों के आधिपत्य वाले नीलपल्ली ने भी अपने यहां ''मंगलवारी हाट'' शुरू कर दिया। इस पर अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच एक लंबा विवाद चला। यह विवाद, उस समय के मद्रास प्रेसिडेंसी तक पहुंचा, जो अंग्रेजों का मुख्यालय था। वहाँ इस विवाद का फैसला यनम के पक्ष में हुआ। यनम का वह ''मंगलवारी हाट'' तब से चला आ रहा है। क्या उन दिनों की कुछ रौनक वहाँ आज भी बची हुयी होगी ? क्या पता। जिस दिन हम लोग वहाँ थे, वह मंगलवार का दिन नहीं था। 
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