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साफ़ हवा के लिए बने कानून नेहरू से कौन डरता है? चालीस साल पुराना मुकदमा ,और गवाह स्वर्गवासी चार दशक बाद समाजवादी चंचल फिर जेल में
बादलों के बीच
देवेंद्र मेवाड़ी
बेटे मनु ने पूछा, “चार दिन की छुट्टियां हैं। कहीं बाहर चलें?”
मैंने कहा, “जरूर चलें।”
“आपको कैसी जगह पसंद है?”
“ऐसी जगह जहां पहाड़ हों, शीतल हवा हो, जंगल की हरियाली हो, पक्षी चहचहाते हों, वन्य जीव-जंतु हों...”
अभी मैं बोल ही रहा था कि मनु ने कहा, “मैंने खोज ली है एक ऐसी जगह। बहुत दूर भी नहीं है। हम तीन दिन वहां रह कर आ सकते हैं।”
“वहां कहां?” मैंने पूछा। 
“कानाताल के पास गांव में, ऊंचाई 8500 फुट”
“कानाताल?”
“हां, बहुत लोग नहीं जानते उसके बारे में, इसीलिए अभी उसका व्यावसायीकरण नहीं हुआ है। प्रकृति बची हुई है वहां,” मनु ने कहा। 
“तो ठीक, वहीं चलते हैं, प्रकृति की गोद में।”
जगह तय हुई ही थी कि दूर बेरीनाग, पिथौरागढ़ से प्रथम फाउंडेशन में विज्ञान कार्यक्रमों के प्रभारी आशुतोष उपाध्याय जी का फोन आ गया। उन्होंने कहा, “इस बार 28 फरवरी को विज्ञान दिवस के अवसर पर आप हमारी बाल विज्ञान खोजशाला, मसूदा, राजस्थान में जा सकेंगे तो बहुत अच्छा लगेगा। वहां बाल विज्ञान मेला लग रहा है। विज्ञान खोजशाला के प्रभारी कानाराम जी हैं। 
“कानाराम? यह नाम तो सुना हुआ लग रहा है,” मैंने कहा।
“हां, रामनगर में आपसे भेंट हुई थी उनकी,” आशुतोष बोले। 
उनका आग्रह स्वीकार करना ही था लेकिन इस शब्द साम्य पर चकित रह गया कि यहां कानाताल जाना है और वहां कानाराम जी के पास! अद्भुत। कानाताल से एक बात और याद हो आई। मेरी चौरास, श्रीनगर, गढ़वाल की पिछली यात्रा के बारे में पढ़ कर वन विभाग के वरिष्ठ रिटायर्ड अधिकारी जे.एस. मेहता जी ने लिखा था, “मुझे अपने वे तीन वर्ष 1961 से 1963 तक याद आ गए.....लंबगांव, कानाताल, सुरकंडा देवी, कद्दूखाल, मालदेवता...वनों का पैदल भ्रमण करता था।....” मैंने तय किया कि कानाताल जाने पर बड़े-बुजुर्ग पेड़ों को मेहता जी की याद जरूर दिलाऊंगा। 
खैर, वहां जीरो-स्टे में बुकिंग हो गई। रेलवे की तत्काल योजना में पांच टिकट भी मिल गए और हम रात की ट्रेन नंदादेवी एक्सप्रेस से देहरादून के लिए चल पड़े। अलसुबह वहां पहुंच कर मित्र एम.एस.बिष्ट जी के घर पर नहाया-धोया और नाश्ता करके टैक्सी से 9.30 बजे 78 किलोमीटर दूर कानाताल के लिए चल पड़े। 
देहरादून से सारथी अजय सीधे राजपुर रोड से निकलने के बजाय किसी पुरानी रोड से आंय-बांय निकलते हुए, उतार-चढ़ाव और तीव्र मोड़ों के हिचकोले खिलाता, पता पूछता चुपचाप आगे बढ़ता रहा। हम स्वयं रास्ते से अनजान। चालीस-पैंतालीस मिनट बाद मसूरी के मुख्य मार्ग पर पहुंचा। तब तक हिचकोलों ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया था। मां-बेटी उबका कर उल्टियां करने लगीं। अब सड़क ठीक थी। बुरांशखंडा, धनोल्टी और कद्दूखाल होते हुए दोपहर बाद 2 बजे कानाताल पहुंच गए। 
कानाताल मील के पत्थर के पास उतरे तो काले ट्रैक सूट में एक युवक ने मुझसे पूछा, “मनु?” मैंने मनु की ओर इशारा करके कहा, “मनु वह है, मैं उसका दोस्त हूं।” वह मुस्कुराया और कहा, “मैं मनीष जैन, जीरो-स्टे से।” 
हमने टैक्सी की डिकी से अपने बैग निकाले। मैं अपने बारह-तेरह किलोग्राम भारी रक-सैक को पीठ पर चढ़ाने लगा तो मनीष ने कहा, “इसे हमें दे दीजिए।”
“अपना सामान मैं स्वयं ढोता हूं,” मैंने कहा तो वे बोले, “वह तो ठीक है, लेकिन आगे कुछ चढ़ाई आएगी और रास्ता भी संकरा है। आपको दिक्कत हो सकती है।”
मैंने पूछा, “हमें जाना कहां है?”
“उस ओर,” मनीष ने दाहिनी तरफ इशारा करते हुए कहा, “आगे घना जंगल है, हमें उसे पार करके जाना है।” उन्होंने मेरा रक-सैक अपने साथ आए भरत को देते हुए कहा, “तुम चलो आगे-आगे, मैं इन्हें लेकर आता हूं। मैंने छोटा बैक-पैक पीठ पर कसा और उनके पीछे चल पड़ा। बेटी के साथ ही पत्नी भी उल्टियां करते-करते निढाल हो चुकी थी। सारथी पैसे लेकर जा चुका था और हम मार्गदर्शक बने मनीष के पीछे-पीछे चल पड़े। गांव के सिरहाने से जाती पतली पगडंडी पर आगे बढ़ते जा रहे थे कि तोरण द्वार की तरह फूलों से लदा बुरांश का पेड़ सामने आ गया। बेटे ने उसके साथ मेरा फोटो खींचा। आगे बढ़े। मोड़ से आगे सचमुच घना जंगल था। मेरे बचपन की यादों के जंगल की तरह घना, हरा-भरा जंगल। 
सामने दोनों ओर पेड़ों से जैसे ग्रीन-टनल बनी हुई थी। कच्ची पगडंडी पर ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते गए, पेड़ों की छांव और जंगल की खुशबू मिलती चली गई। पीछे कानाताल की खौणी (नंगी) धार देख कर लग नहीं रहा था कि यहां इस ओट में देवदार, थुनेर, सुरई, बांज, बुरांश, मोरु और अंयार जैसे पेड़ों का जंगल भी होगा। पगडंडी के किनारे कई पेड़ों के छिले घावों पर नंबर लिखा देख कर मैंने मनीष से कहा, “ये नंबर कैसे?”
“जंगलात विभाग ने डाले हैं। कानाताल से इस जंगल के बीचों-बीच से मोटर रोड निकालने के लिए सर्वे करके पेड़ों को छापना शुरू कर दिया था। ये पेड़ कटते और रोड बनती,” उन्होंने कहा।  
“तो फिर क्या हुआ?” 
“हमने, गांव वालों ने मिल कर विरोध किया। अब भी विरोध कर रहे हैं। देखिए, कब तक बच पाता है यह जंगल। एक बार मोटर रोड बन गई तो जंगल गायब होना शुरू हो जाएगा। कामर्शियल गतिविधियां शुरू हो जाएंगीं। सीमेंट, कंक्रीट का जंगल खड़ा हो जाएगा। कानाताल की पहाड़ी को देखा आपने? वहां रिजार्ट ही रिजार्ट बन गए हैं, हट्स बन गई हैं, सारा शहरी कल्चर पनप गया है और जंगल गायब हो गया है।”
मुझे वर्षों पहले के एक विदेशी टीवी सीरियल की कड़ी के शब्द याद आ गए, जो कुछ इस तरह थे- ‘मनुष्य ‘उपभोक्ता’ बन गया और प्रकृति का दोहन करने लगा। तात्कालिक खुशी बटोरने लगा- तुरंत सुख, तुरंत संतोष। कंज्यूम एंड डिस्कार्ड! जमीन हड़पो! उपभोग करो और फेंको! उपभोग करो और फेंको!’ मैंने कहा, “आप लोगों ने विरोध किया, बहुत अच्छा किया।”
हम चलते जा रहे थे। जंगल में, बीच-बीच में बुरांश खिले हुए दिखाई देते रहे। पेड़ों के पार दूर उत्तर में कभी-कभी भव्य हिमालय की झलक दिखाई दे जाती।
....मनीष ने चलते-चलते मुझे थुनेर और देवदार के पेड़ों को दिखा कर उनका अंतर बताया। वहां जंगल के बीच धूप का एक टुकड़ा दिखा। थोड़ी खुली जगह थी। हम वहां खड़े होकर देवदार और थुनेर के पेड़ों की भीनी खुशबू से भीगी भरपूर हवा अपने फेफड़ों में भरने लगे। तभी मनीष ने कहा, “यहां जंगल में इतना ठंडा रहता है कि कई जगह बर्फ अभी भी बची हुई है। जहां हम खड़े थे, उसके ऊपर देवदारुओं की छांव में उन्होंने हमें इशारे से बर्फ की सफेद कालीन का टुकड़ा दिखाया। बेटा-बहू जाकर उसका फोटो खींच लाए। थोड़ा दम लेने के बाद हम फिर आगे ब़ढ़े। अब पगडंडी नीचे उतार में जा रही थी। वहां भी कुछ पेड़ों का तना छीलकर नंबर डाले हुए थे। जंगल के इस भाग में बहुत ऊंचे और मोटे रैंसुल के पेड़ थे जिन्हें वनस्पति विज्ञानी एबीज पिंड्रो कहते हैं। उतार में संभल कर चलते हुए हमें खूब अनुभव हो रहा था कि शहरी जीवन ने हमारा क्या हाल बना दिया है। गनीमत है कि जल्दी ही पगडंडी सीधी और समतल हो गई। 
चलते रहे हम और अचानक सामने सीढ़ीदार खेतों से सजी पहाड़ी आ गई। नीचे जुते हुए खेतों के ऊपर सलेटी रंग का साधारण काटेज दिखाई दिया, जिसके बरामदे के ऊपर सूखी घास की छत पड़ी हुई थी। आंगन में बैठने के लिए सूखे पेड़ों के कटे हुए तने के डेढ़-दो फुट ऊंचे गोल टुकड़े रखे हुए थे। सामने आर-पार विशाल हिमालय, जिससे बादलों के टुकड़े अठखेलियां कर रहे थे। खेतों में कुछ महिलाएं काम कर रही थीं। काटेज के पीछे दो, हरे-भरे और ऊंचे मोरू के पेड़ों की जोड़ी। उससे ऊपर खेतों के किनारे मोरू के तीन और हरे-भरे पेड़। दो-चार सीढ़ियां उतर कर हम काटेज के आंगन में पहुंचे। 
कमरे में सामान रखा। भीतर मिट्टी से लिपी दीवारें और चार जगह बिस्तरे। दो नीचे और दो सीढ़ियों से चढ़ कर ऊपर। मनीष ने पूछा तो पता चला, चार बिस्तरे एक सैट में इसलिए कि पूरा परिवार साथ रह सके और शहर में जिनके पास आपस में बातचीत करने का वक्त नहीं है, वे यहां आकर आपस में बातचीत कर सकें। हम बाहर आकर तने के टुकड़ों पर बैठ गए। बादलों के बीच भव्य हिमालय की झलकी मिलती रही। वहीं गर्मागर्म चाय पी।
शाम ढलने को थी। काटेज में बिजली की रोशनी थी। इसके अलावा कमरे और वाशरूम में बैटरी की छोटी-सी लालटेन भी रखी थी। पानी छत पर टंकी से आता था जिसे रेन हार्वेस्टिंग करके जमा किया गया था। यानी, वह वर्षा का जमा पानी था। उसी से काम चलाना था। पीने-खाने के लिए पानी पास के जंगल में बहते सोते की पतली-सी धार से भर कर लाया जाता था। रात के खाने में हमने मंडुवा (कोदा) की रोटी मिली जुली सब्जी और गहत की दाल चुनी। बच्चों ने मांसाहार भी किया। मनीष ने बताया कि सब्जी, मांस वगैरह चंबा के बाजार से मंगानीं पड़ती हैं। पत्नी और बिटिया रास्ते भर उल्टियां करने के कारण थके-हारे सो गए। 
उत्तर-पूर्व के पहाड़ ढलते सूरज की धूप से सुनहरे हो उठे। देवदार, रेंसुल, थुनेर के घने जंगल पर भी किरणों की स्वर्णिम आभा बिखरने लगी। ढलते सूर्य की छवि देखने के लिए काटेज के पीछे कच्चे रास्ते पर गया। ओह, अद्भुत दृश्य था। पश्चिम के पहाड़ों पर बादलों के साथ सूर्य लुका-छिपी खेल रहा था। कभी-कभी अपनी किरणों की बांहें बढ़ा कर पहाड़ों और नीचे घाटियों को छू लेता। जहां मैं खड़ा था, उसके नीचे सीढ़ीदार खेतों के बीच यहां-वहां मकान थे। नीचे मोटर रोड बन रही थी। मोटर रोड के बारे में जान कर कुछ बाहरी उद्यमी लोगों ने उसके आसपास रिजार्ट और हट्स बनाना शुरू कर दिया था। ढलते सूरज की तिरछी किरणें उनकी लाल, हरी छतों पर पड़ रही थीं। मैं कल्पना में भविष्य में जाकर वहां उग आए सीमेंट-कंक्रीट के जंगल को देख आया। वहां मोटर रोड के आसपास उभर आई दुकानों और वहां पनप रही फास्ट फूड संस्कृति को भी देखा और यहां-बिखरे पालिथीन के अंबार भी देखे। मोरू के पेड़ों की सरगोशियों से तंद्रा टूटी तो अपने आप को उस कच्ची सड़क पर खड़ा पाया। 
तभी हाथ में लैपटाप लिए मनीष आ गए। बोले, “यहां नेट कनेक्शन कुछ ही जगहों पर आता है, जैसे यहां इस कच्ची सड़क पर, रसोई के आगे और वहां सामने देखते हुए बोले, “वहां उस सबसे ऊंचे पहाड़ पर जहां टावर दिखाई दिखाई दे रहा है, सुरकंडा देवी का मंदिर है। वह देखिए भी देरहा है। वहां बड़ी संख्या में लोग आते हैं। सती की पौराणिक कहानी सुनी होगी आपने। शिव जब सती का शव लेकर रौद्र रूप में ब्रह्मांड में फिरने लगे तो विष्णु ने अपने चक्र से शव के टुकड़े कर दिए। मान्यता है कि सती का सिर इसी पहाड़ पर गिरा था।” मैंने उस ओर नमन किया। फिर ढलते सूरज की कुछ तस्वीरें लीं और आंगन में लौट आया। 
ज्यों-ज्यों शाम ढल रही थी, सरसराती ठंडी हवा चलने लगी। मोरू के दोनों पेड़ फिर से सरगोशियां करने लगे। मैंने किनारे से झांक कर देखा। वाह! वहां पश्चिम के आकाश में हीरा दमक रहा था। खूब चमकीला। उसे पहचानना कठिन नहीं था। वह था- वीनस यानी शुक्र ग्रह। सूर्य और चंद्रमा के बाद आकाश में सबसे तेज चमकने वाला पिंड। हाथ-पैर ठंडे पड़ने लगे। टोपी, मफलर और गर्म कपड़े पहन कर आंगन में आया। बेटा-बहू आ चुके थे। मनु ठंड से बचने के लिए कैंप फायर के लिए कह आया था। भरत ने आकर आंगन में आग धुधका दी। हम पेड़ के तने के टुकड़ों पर घेरा बना कर आग के चारों ओर बैठ गए।  
एकदम साफ आसमान के रंगमंच पर तारे उगने लगे। दक्षिण-पूर्व के आसमान में एक और हीरा चमकने लगा। नजरें उससे ऊपर उठीं तो वहां कतार में त्रिकांड के तीन तारे नजर आ गए। ओह, तो यह व्याध यानी ओरायन तारामंडल है! और, यह चमकता छोटा हीरा है- सिरिअस यानी लुब्धक नक्षत्र। फिर तो कई और सितारे भी पहचान में आने लगे-बेतलग्यूज यानी आद्र्रा नक्षत्र, राइगेल, अल्देबरान यानी रोहिणी नक्षत्र, प्लेइडीज यानी कृत्तिका पुंज। दूसरी ओर मिथुन राशि के तारे और उनसे ऊपर कैस्टर और पोलस्क यानी पुनर्वसु नक्षत्र। धीरे-धीरे पूरा आसमान सितारों से भर गया और दुधिया आकाशगंगा आरपार फैल गई। 
हम आग तापते रहे। आगे से हाथ-पैरों में आंच की चिसकाटी लगती तो पीठ बर्फ हुई जा रही थी। लगता था, तापमान शून्य से नीचे जा चुका है। मनु सामने जुते हुए खेतों की ओर देख रहा था। अचानक चौंक कर बोला, “अरे वह क्या है?” अभी-अभी बेटी पूछ रही थी कि यहां जंगल में बाघ तो नहीं होते? पता लगा, अंधेरे में चुपचाप कोई बाघ चला आया। देख कर खुश होगा कि आज तो भून कर खाने का भी इंतजाम है! 
लेकिन, मनु और अपर्णा ने खेत में क्या देखा? मैंने पूछा, “क्या था?” तो मनु ने बताया, “मोरू के पेड़ की तरफ से तैरती हुई सी कोई चीज आई और खेत में थोड़ी दूर तक पैरों पर चलने के बाद उड़ गई। बात कर ही रहे थे कि उसने कहा- वह देखो, वही तो है।” पलट कर देखने तक वह चीज पेड़ की तरफ तक जा चुकी थी। सवाल था कि आखिर वह था क्या? उस ओर मेरी पीठ थी, इसलिए मैं नहीं देख पाया लेकिन वर्णन सुन कर मैंने कहा, “वह फ्लाइंग फाक्स हो सकता है। पहाड़ों में होते हैं वे, मैंने बचपन में देखा है।” जो आकार मनु ने बताया, उसके अनुसार वह चमगादड़ या उल्लू नहीं हो सकता। बहरहाल, वह जो कुछ भी था, अब अंधेरे में मोरू के पेड़ में समा चुका था। 
रसोई की झोपड़ी के बाहर से किसी ने आवाज दी, “आइए, खाना तैयार है।” वहां पहुंचे तो मनीष ने परिचय कराया, “आपके लिए खाना ये बनाते हैं- खुशाल सिंह राणा। ये लोग मेरे साथी हैं। खेती के मेरे काम में भी मदद करते हैं।” राणा जी से पता लगा, इस गांव में राणा लोग रहते हैं। यह भमौरी गांव की चोटी यानी डांडा है-थुनेर, जहां 15-20 परिवार रहते हैं। बाकी परिवार नीचे मुख्य गांव में रहते हैं। भमौरी खाल गांव तिखोन ग्राम सभा में आता है। 
“कई परिवार यहां छोड़ कर देहरादून या दिल्ली भी जा बसे हैं,” मनीष ने कहा, “कोई जमीन बेच कर चला गया, तो कोई यों ही छोड़ कर या कोई बच्चों की नौकरी लग जाने के कारण उनके साथ चला गया। यहां कई जगह आपको उजड़ी हुई झोपड़ियां और मकान दिखाई देंगे। छोड़ कर गए हुए लोगों में कई तो कहते हैं- उनके खेतों में भी खेती कर ली जाए ताकि खेत उपयोग में रहें।”
“हमारे पूरे पहाड़ की यही दुखद कहानी है मनीष जी, गांव-गांव में यही हो रहा है,” मैंने कहा। 
भरत राणा ने खाना लगा दिया था। मोटे तने के ऊंचे टुकड़ों की मेजें और उससे कम ऊंचे टुकड़ों की कुर्सियां। थाली, कटोरी, गिलास पीतल के, खाना रखने के डोंगे घड़े जैसी मिट्टी के। चम्मच, पलटा लकड़ी के और तांबे का वाटर फिल्टर। ठंड में कंपकंपाते बातें करते हुए खाना खाया। बाहर आए तो झोपड़ी के पीछे उत्तर के आकाश में अंग्रेजी के ‘डब्लू’ आकार का कैसियोपिया यानी शर्मिष्ठा तारामंडल दिखाई दे गया। मैंने कहा, “मनीष जी, आइए आपको ध्रुवतारा दिखाता हूं। ‘डब्लू’ के बीच के तारे से उत्तर की ओर काल्पनिक लकीर खींचिए। और, लीजिए धुर उत्तर में वह रहा ध्रुवतारा।” मनीष के साथ ही श्रीमती जी और बच्चों ने भी ध्रुवतारा देखा। हालांकि, मैं और लक्ष्मी तो अपने विवाह के अवसर पर सेंतालिस वर्ष पहले भी उसे देख चुके थे। 
“एक और तरकीब है ध्रुवतारे को पहचानने की,” मैंने कहा, “उसमें सप्तर्षि के आगे के दोनों तारों की सीध में लकीर खींचें तो वह भी ध्रुव तारे के पास पहुंचती है।” अभी सप्तर्षि उग ही रहे थे। फिर भी अगले चार तारे नजर आ रहे थे। मैंने आगे के दोनों तारों की सीध में लकीर खींची और ध्रुवतारा खोज लिया। उसके एक ओर आसमान में कैसियोपिया का ‘डब्लू’ लटका था तो दाहिनी ओर सप्तर्षि की पतंग आसमान में ऊपर उठ रही थी। हम ठंड से ठिठुर रहे थे, इसलिए फिर काटेज के आंगन में कैम्पफायर के पास आकर आग तापने लगे। ऊपर तारों भरा आसमान था और नीचे रात के अंधेरे में सोई धरती पर हम। थके-मांदे थे, जल्दी ही सोने चले गए। 
मैं जमीन पर लगे बिस्तरे में लेट गया। पास के जंगल में कहीं काकड़ बोल रहा था- कांक...कांक्..कांक्! इसकी तेज आवाज सुन कर ही अंग्रेजों ने इसका नाम ‘बार्किंग डियर’ रख दिया होगा। बाहर बीच-बीच में सिहराने वाली सर-सर हवा बहने लगती। भरपूर बिस्तर के बाव़जूद मैं ठंड से सिहर रहा था। लक्ष्मी ने कहा भी था, नीचे ज़मीन और दीवारों से ठंड लगेगी, लेकिन मैं नहीं माना। कहा, “जमीन में सोना ज्यादा आरामदेह है।” अब समझ में आ रहा था। वाशरूम में नल का पानी छूते ही बरछी की तरह लग रहा था। सिहराती-ठिठुराती रात थी। निराला जी की ‘शिशिर की शर्वरी’ कविता याद आ गई जो हिंस्त्र पशुओं-सी आक्रामक हो उठी थी। डरने लगा कि कहीं हाइपोथर्मिया न शुरू हो जाए। रजाइयों में प्यूपा बनकर दुबक गया और धीरे-धीरे मुझे भी टुकड़ा-टुकड़ा नींद आने लगी। 
पौ फटने से पहले उठना चाहता था, इसीलिए अलार्म लगा लिया। पांच बजे उठा लेकिन बाहर गहरा अंधेरा और सन्नाटा था। झांक कर देखा तो सामने अंधेरे में पहाड़ों पर बिजली की रोशनियां चमक रही थीं और पहाड़ों से ऊपर तारों भरा आसमान जगमगा रहा था। मैं फिर रजाई में दुबक गया। छह बजे से पहले फिर उठा। सामने जैसे किसी चित्रकार ने क्षितिज के आर्ट पेपर पर हिमालय की चोटियों का साफ्ट पेंसिल से रेखाचित्र बना दिया था। पूर्व के आकाश में हंसिए-सा पतला फाल्गुन कृष्ण पक्ष त्रयोदशी का चांद चमक रहा था।     
   मैं सूर्योदय का इंतजार करने लगा। मैं सूर्योदय के बदलते रंग देखना चाहता था, इसलिए टकटकी लगाए हिमालय को देखता रहा। कनखियों से पूर्व में पहाड़ों के ऊपर बढ़ती उजास को भी देख लेता था। अचानक हिमालय की चोटियों पर शेडिंग होने लगी। प्रकाश और छाया का प्रभाव दिखाई देने लगा। सहसा चोटियों पर सफेदी पुतने लगी। और, पूर्व दिशा में पहाड़ों के बीच से आती स्वर्णिम उजास ने चोटियों पर भी सुनहरा रंग फेर दिया। फिर जल्दी ही उन पर सफेदी पुतने लगी और हिमालय की धवल चोटियां चमक उठीं। साथ ही उस रंगरेज सूरज ने पूर्व की पर्वतमाला से धीरे से अपना मुंह निकाल कर झांका। 
सूरज क्या निकला कि चारों ओर धूप की चादर फैल गई। चराचर जगत जाग उठा। मोरू के पेड़ों और आसपास की झाड़ियों पर नन्हीं चिड़ियां प्रभाती गाने लगीं। गौरेयों की टोली खनकते घुंघरूओं की आवाज में चहचहा रही थीं तो धानी रंग की नन्हीं चिड़िया अपनी साथिन के साथ गाने लगी- स्वीट....स्वीट...स्वीट! खेतों की मेंड पर झाड़ पर फुदकती स्ट्रीक्ड लाफिंग थ्रस यानी मुसिया चड़ी भी मधुर तान छेड़ने लगी। एक और चिड़िया गाती थी- स्वीहू...स्वीहू...स्वीहू! सूरज और उसकी धूप देख कर कितनी खुश थीं वे। तभी सामने की पहाड़ी पर दो-एक चकोर बोले- चाकुर....चाकुर...चाकुर! 
अब तक हम सभी जाग चुके थे। अपर्णा कैमरा लेकर सामने की पहाड़ी की ओर निकल गई। वहां से आरपार पूरा हिमालय दिखता होगा। राणा जी के हाथ की बनाई चाय पीकर हम भी उस ओर निकले। आगे-आगे मैं था। सुबह की गुनगुनी धूप से शरीर में नई जान आ गई। खुद को विश्वास नहीं हो रहा था कि रात को कितनी ठंड थी। मैं चलता रहा। सामने स्लेटों की ढालू छत वाला, सफेदी पुता एक छोटा-सा घर दिखा। थोड़ा और ऊपर धार यानी चोटी थी। वहां पहुंचा ही था कि देखा मनीष भी आ गए हैं। चोटी पर उस घर के बारे में पूछा तो बोले, “एक बुजुर्ग महिला का है। आजकल वे नीचे गांव में रह रही हैं।”
“यहां अकेली रहती हैं?”    
“हां। घर के आसपास खेती भी करती हैं,” उन्होंने कहा तो मैं बोला, “मनीष जी, यह शांति और सुरक्षा यहीं हमारे पहाड़ों में संभव है, प्रकृति की संगत में। शहरों में तो उम्रदराज लोगों की कोई सुरक्षा ही नहीं है और न वे ‘बैठे ठाले’ की ज़िदगी में कोई शारीरिक मेहनत ही कर सकते हैं। पार्कों में नकली हंसी हंसते और ताली बजाते कितने दिन कट सकते हैं?”
हम दोनों उस समय अकेले थे। मैंने पूछ लिया, “आप कह रहे हैं कि गाजियाबाद के रहने वाले हैं। फिर, आपने यह कठिन जीवन क्यों चुना?”
“सच पूछिए तो मुझे लगा मुझे अपना पूरा मानसिक और शारीरिक रूपांतरण करना होगा। इसके लिए मुझे प्रकृति की गोद में लौटना होगा। मैंने यही किया। यहां आया, लोगों से मिला। शुरू में मैं ‘बाहरी’ और ‘देसी’ आदमी माना गया। यह स्वाभाविक भी था। लेकिन, जब मैं यहां थोड़ा जमीन खरीद कर यहीं के लोगों की तरह, उनके साथ जीने लगा तो लोगों ने मुझे अपना लिया, अपना मान लिया,” मनीष ने बताया। 
“आप यहां क्या करना चाहते थे?”
“खेती और ग्रामीण पर्यटन’। उद्देश्य एक ही रहा और रहेगा कि जो लोग प्रकृति से दूर हो गए हैं, शहरों में फ्लैटों के बंद कमरों में रह रहे हैं, उन्हें फिर प्रकृति में लाने की कोशिश करूं। भले ही, कुछ ही दिन सही, लेकिन उन्हें लगे कि प्रकृति की गोद में रहने का अर्थ क्या है। यहां जीए हुए उनके दिन, उन्हें सदा प्रकृति की याद दिलाते रहेंगे। वे प्रकृति से प्रेम करते रहेंगे,” मनीष ने कहा। 
“इसीलिए जीरो-स्टे नाम दिमाग में आया कि शहरों की आपाधापी से जीरो डाउन करके कुछ दिन प्रकृति की गोद में आइए। यहां आकर शहरों की भौतिक सुविधाओं से दूर न्यूनतम प्राकृतिक सुविधाओं में रहिए। प्रकृति का स्नेह, उसकी याद लेकर लौटिए।” 
ऊपर चोटी में पथरीली मिट्टी और पत्थरों का एक अनगढ़ सा, आधा खोदा गया गड्ढा दिखाई दिया। पता लगा, किसी सरकारी योजना का रेन हार्वेस्टिंग पिट है। कागजों पर हो सकता है पक्का और भरपूर गड्ढा हो। चारों और पहाड़ों पर दूर-दूर माचिस की डिबिया जैसे मकान दिखाई दे रहे थे। चोटी से ठीक नीचे भमौरीखाल गांव के सीढ़ीदार मगर अधिक चौड़े और चपटे मकान भी दिखाई दे रहे थे। हम चीड़, अंयार, बांज, बुरांश के छोटे-छोटे पेड़ों और किलमोड़े की झाड़ियां पार कर थोड़ा नीचे उतरे और सामने का दृश्य देख कर, देखते ही रह गए। बाएं से दाएं जहां तक नजर जाती थी, वहां तक भव्य हिमालय खड़ा था। दिनकर की पंक्तियां गूंज गई दिलो-दिमाग में: ‘मेरे नगपति! मेरे विशाल! साकार, दिव्य, गौरव विराट!’ 
“चोटियों को पहचान रहे हैं?” मनीष ने पूछा। 
मैंने कहा, “सामने दाहिनी ओर चैखंबा की चोटी तो साफ पहचान में आ रही है।”
“वह देखिए, उसके एक ओर नीलकंठ और कामेट हैं। बाईं और केदारनाथ और कीर्तिस्तंभ। उधर गंगोत्री ग्रुप की चाटियां हैं। इधर आगे बाईं और बंदरपूंछ। और, बंदरपूंछ के पास ही कालानाग और फिर सीढ़ियों जैसी स्वर्गारोहण चोटी। यहां से चार ही सीढ़ियां दिखाई दे रही है। कहते हैं, सात हैं। महाभारत की वह कथा आपने सुनी होगी कि अंत में धर्मराज युधिष्ठिर ने हिमालय में जाकर स्वर्गारोहण किया था,” मनीष ने बताया। 
भव्य हिमालय के ऐन सामने की ठंडी हवा, पानी और चलते-फिरते रहने के कारण हमें खासी भूख लग जाती थी। नाश्ते का समय हो गया था। हम चोटी से उतर कर रसोई की ओर आए। सामने दक्षिण में सुरकंडा का ऊंचा पहाड़ सिर उठाए खड़ा था। पैताने से ही लगता था, जैसे विशाल चट्टानों से बना हो वह। कहीं-कहीं तो सिर्फ चट्टानें दिख रही थीं, जिन पर न घास उगी थी, न पे़ड़-पौधे। आधे पहाड़ पर सुबह की धूप की चादर फैल चुकी थी। 
नाश्ता लग चुका था। मैं लकड़ी के गोल टुकड़े पर बैठ कर नाश्ता करने लगा। मनीष ने मेरे सामने अपने मोबाइल से जोड़ कर उड़नतश्तरीनुमा एक छोटा-सा सुर्ख स्पीकर रख दिया। पहला ही कौर मुंह में लिया था कि धीरे-धीरे एक भारी गहरी आवाज हवा में गूंज उठी।  
लगता था नीचे कहीं घाटियों से ऊपर उठ कर आ रही है वह गूंजती हुई आवाज और पहाड़ों की इन वादियों में गूंज रही है।....मैंने आंखें बंद कर लीं और उस आवाज को सुनने लगा... 
रात के रंग देखने हों तो 
कभी पहाड़ों पर चलो
रात पहाड़ों पर कुछ और ही होती है....
मैं ‘वाह’ कहता सुनता रहा, और सोचने लगा, मनीष ने आखिर ठीक इस समय यह शानदार नज़्म क्यों लगा दी होगी? नज़्म भी उसी शायर की आवाज़ में। और गा भी कौन सकता था इन्हें इतनी शिद्दत के साथ? 
समझा, मनीष ने मुझे रात को पूरी शिद्दत और मोहब्बत के साथ आकाश को निहारते हुए देखा था, तभी इसे लगाया होगा। वे गुलजार थे और सुरमई रात पर उन्हीं की नज़्म थी यह। हवा में नज़्म गूंज रही थी और मुझे अपनी बंद आंखों के आकाश में कल रात का पूरा मंजर दिखाई दे रहा था। मैं सुबह के उजाले में आंखें बंद करके रात को जीने लगा। फिर उठा और बाहर धूप में आकर मनीष से कहा, “मुझे ये चंद लाइनें नोट करनी हैं। मैं आज रात गीतकार गुलज़ार के शब्दों के साथ आसमान देखना चाहता हूं।” वहीं बैठ कर मैंने नज़्म की वे लाइनें अपनी डायरी में नोट कर लीं। 
हमने तय किया कि आज दोपहर को खाना खाकर जंगल में पानी के उस स्रोत को देखने चलेंगे, जहां से पीने का पानी लाते हैं। तब तक हम आसपास चिड़ियों और तितलियों को देखेंगे। रसोई के पीछे झाड़ी पर बुलबुलें चहक रही थीं और धूप में काटेज के पास पेड़ पर गौरेयों की टोली एक-दूसरे का पीछा कर रही थीं। एक टहनी पर बैठी गौरेया को देख कर बेटी ने पूछा, “यह गौरेया लगती है लेकिन सिर और पीठ गेरूवा रंग से रंगे हैं?”
शायद उसने भी गाया होगा- ‘रंग दे तू मोहे गेरूवा!” मैंने हंसते हुए कहा। फिर बताया, “ये गौरेया की ही वनवासी बिरादर हैं। घरों के आसपास पाई जाने वाली गौरेया को जीव विज्ञानी पासेर डोमेस्टिकस कहते हैं यानी मनुष्यों से हिली-मिली, घरेलू गौरेयां। लेकिन, वनवासी गौरेया का नाम है- पासेर रुटिलेंस। लैटिन भाषा में रुटिलेंस का अर्थ होता है ललछोंह यानी गेरुवा। प्रकृति ने इन वनवासी गौरेयों को गेरुवा रंग दिया है। ये यहां हिमालयी क्षेत्र में पाई जाती हैं और घरेलू गौरेयों के साथ भी हिल-जुल कर रह लेती है। मैंने तो नैनीताल में जोशी विला के आंगन में दस-पंद्रह घरेलू गौरेयों के झुंड में एक अकेली गेरुवा गौरेया को कई बार देखा है।”
हम काटेज के आंगन में आकर धूप में बैठे और चारों ओर का नजारा देखने लगे। ऋचा कैमरा खेतों की ओर साध कर फोटो लेने लगी तो मैंने पूछा, “वहां क्या है?” 
“वह नीली चिड़िया,” उसने खेत की ओर इशारा करते हुए कहा। वहां नीली चिड़िया यहां-वहां देखती-रुकती आगे बढ़ रही थी। “वाह कलचुड़िया!” मैंने कहा, “हमारे गांव में इसे कलचुड़िया कहते हैं और अंग्रेजी में ब्लू ह्विसलिंग थ्रस। क्री ई ई ई की मधुर सीटी-सी आवाज में चहकती है।” पास जाने पर उड़ जाती, इसलिए बेटी ने दूर से ही उसका फोटो खींचा। वह गई तो वहीं आसपास घास में फुदकती मुसिया चड़ी दिखाई दे गई। चूहे की तरह भूरे रंग की और चूहे की ही तरह चूं-चूं करती, चट-पट फुदकती इस चिड़िया को इसीलिए मुसिया चड़ी कहते हैं। पहाड़ में चूहे को मुस कहते हैं। 
“लेकिन सूर्योदय के बाद सुबह तो यह बड़ी मधुर आवाज में गा रही थी?”
“हां, गा रही थी। गा क्या रही थी, जैसे मीठी आवाज़ में खिलखिला रही थी। तभी तो अंग्रेजी में यह लाफिंग थ्रस कहलाती है। यह भी यहां हिमालय क्षेत्र में पाई जाती है। ”
तभी मनीष आ गए। साथ में राणा जी का छोटा-सा बेटा नितिन और उसका दोस्त। हम लोग जंगल में पानी का स्रोत देखने निकल गए। देवदार, रैंसुल, थुनेर, अंयार और बुरांश के पेड़ों के बीच एक संकरी पगडंडी पर चलते हुए हम घने पेड़ों के बीच कभी धूप, कभी छांव में चलते स्रोत तक पहुंच गए। वहां पानी की अंगूठे बराबर मोटी धार गिर रही थी, जिस के नीचे कनस्तर या जरीकेन लगा कर उसे भरते हैं। पानी के इसी स्रोत पर सरकार ने किसी योजना के तहत सीमेंट-कंक्रीट की छोटी-सी डिग्गी बना कर पाइप लाइन से भमौरीखाल गांव में पीने का पानी पहुंचाया है। बेहद ठंडा मगर मीठा पानी था। देवदार वन के सभी पेड़ों ने अपनी गहरी जड़ों और उस वन की माटी ने जैसे अपनी पूरी मिठास और खनिज उस पानी में घोल दिए थे। मैंने मन ही मन उन पेड़ों और पहाड़ को नमन किया जिन्होंने उस सूखे पहाड़ को अपनी छांव से शीतल बना कर पानी की अमृत धार भी दी है। वहां भमौरीखाल गांव के एक राणा जी बैठे है। उनसे बातें हुई तो मैंने कहा, “जब तक यह जंगल है, यह हरियाली है, तभी तक यहां यह अमृत धार भी बहेगी।”
बोले, “ यह तो सच बात है।”
वहां से हम लौटे। मनु, अपर्णा और गांव के दोनों बच्चे मनीष के साथ नीचे भमौरीखाल गांव देखने निकल गए। मैं, बेटी और लक्ष्मी पगडंडी से वापस लौटे। रास्ते में कुछ खूबसूरत जंगली फूल देखे, खिले हुए, सुर्ख बुरांश भी देखे और पेड़ों पर यहां-वहां चहकती नन्हीं चिड़ियों को देखा। पेड़ों पर मौस और लाइकन भी काफी थे। राह में किसी सूखी, टूटी हुई टहनी के टुकड़े पर एक मनमोहक लाइकन मिला। मौस देख कर इसलिए खुशी होती है कि यह स्पंज की तरह नमी बनाए रखता है और नन्हे कीटों को आश्रय देता है। लाइकन एल्गी यानी शैवाल और फंगस की अटूट दोस्ती का प्रतीक है। इन दोनों की दोस्ती है, इसलिए लाइकन है अन्यथा तो ये दो अलग वनस्पतियां हैं। दूसरी खासियत इनकी यह है कि ये वहीं पनपते हैं, जहां प्रदूषण न हो। यानी, इस इलाके में हवा में कोई प्रदूषण नहीं है।
हम धीरे-धीरे बातें करते, पगडंडी पर आगे बढ़ते जा रहे थे कि मेरे दाहिनी ओर बहुत पास में अचानक ‘भद-भद-भद’ की आवाज हुई और एक झाड़ में छिपा चकोर पंख फड़फड़ा कर नीचे जंगल की ओर उड़ गया। इस आवाज को बचपन से पहचानता हूं इसलिए अचानक आई आवाज से अचकचाया नहीं। चकोर छिपने में माहिर होते हैं। बिल्कुल पास पहुंच जाने तक भी उनका पता नहीं लगता और बहुत पास पहुंचने पर वे अचानक पंख फटफटा कर उड़ जाते हैं। 
पगडंडी पार कर हम खेतों में पहुंचे तो देखा ठीक ऊपर के खेत में आलू बोया जा रहा है। लक्ष्मी बोली, “चलो, हम भी आलू लगाते हैं।” हम उनके पास गए। लक्ष्मी ने उनसे बातचीत शुरू की। वहां अम्मा यमला देवी थीं, उसकी बहू यशोदा और दो पोतियां थीं। 
“क्या मैं भी आपके साथ आलू बो सकती हूं? हम अपने गांव में भी बोते हैं,” लक्ष्मी ने कहा। 
“हां, हां क्यों नहीं। आओ लगाओ,” अम्मा बोली। लक्ष्मी ने आलू के बीज काटने में मदद की। फिर दो कतारों में आलू के टुकड़े बो कर कहा, “अम्मा, जब आलू की फसल तैयार हो जाए तो इन दो लाइनों के आलू रख देना। हम आएंगे और उनकी सब्जी खाएंगे।”
अम्मा खुश हो गईं। बोली, “हम जरूर रख देंगे। तुम लोग आना।” फिर प्यार से पूछा, “बच्चे कितने हैं?”
“तीन बेटियां, एक बेटा,” लक्ष्मी ने कहा। 
“अच्छा। बेटियां बहुत अच्छी होती हैं। दिन भर काम में लगी रहती हैं,” अम्मा ने कहा। इस बीच मैं आकर नीचे काटेज के आंगन में बैठ गया था। लक्ष्मी ने बाद में हंसते हुए बताया, “तुम आ गए तो अम्मा ने तुम्हारी ओर इशारा करके पूछा, “अच्छा, वो तुम्हारा बुड्डा है?”
“तो तुमने क्या कहा?” मैंने पूछा। 
“मैंने कहा ‘हां’।”
“ठीक है, ठीक है, कल मैं जाकर उनको बताऊंगा तुम मेरी बुड्डी हो!” और, हम दोनों ठठा कर हंसे।        
हम फर्सत से आंगन में और बगल के बिना जुते हुए खेतों में बैठ कर, बातें करते धूप तापते रहे। भोजन कक्ष की बगल में सौर कुकर हमारे लिए कुकर में भात-दाल बना चुका था। राणा जी की आवाज सुनाई दी, “खाना तैयार है। आइए, रोटियां बना रहा हूं।” हम गए और तने के गोल टुकड़ों की मेज-कुसियों पर बैठ कर खाना खाया। बातें करते-करते थोड़ा विश्राम किया। मनीष ठीक ही कहते थे, यहां आपस में बातें करने के लिए हमारे पास सचमुच कितना समय था! दिल्ली की ज़िदगी में तो लगता है किसी के पास कोई समय ही नहीं है। थोड़ा समय था भी तो वह अब मोबाइल फोन ने छीन लिया है। यहां अच्छा था कि नेटवर्क कभी-कभी ही मिलता था। 
देर दोपहर चाय पीकर हम फिर पास की छोटी पहाड़ी की ओर निकल गए। सूरज सुरकंडा की पर्वतमाला की ओर उतरने की तैयारी कर रहा था। ढलते सूरज के साथ खेलने के लिए दो-चार छोटे बादल भी चले आ रहे थे। दिन भर चटख धूप थी। अब वह पश्चिम की ओर से पेड़ों-पहाड़ों पर तिरछी पड़ने लगी। बाईं ओर घने जंगल के पेड़ों की फुनगियों पर सुनहरी धूप खेलने लगी। हरिऔध के ‘प्रिय प्रवास’ की शुरूआती पंक्तियां साकार होने लगीं: ‘दिवस का अवसान समीप था/गगन था कुछ लोहित हो चला/तरु शिखा पर थी अब राजती/कमलिनी-कुल-वल्लभ की प्रभा!’ 
पहाड़ों के पार सूरज विदा हुआ। उसे गया हुआ जानकर हवा भी ठंडक लेकर लौट आई। मोरू के पेड़ धीरे-धीरे हवा से बातें करने लगे। चिड़ियां भी लौट आईं। वनवासी गौरेयां आसपास की झाड़ियों पर बैठ कर चहकने लगीं मानों रात का अंधेरा घिरने से पहले-पहले दिन भर की बातें पूरी कर लेना चाह रही हों। 
लेकिन, मुझे तो आज शिद्दत से रात का इंतजार था। अंधेरी, तारों भरी रात का इंतजार। आज मैं सितारों की उस दुनिया को अपने शब्दों में उतार लाने वाले गुलजार की नज़्म को पढ़ते-पढ़ते आसमान को देखना चाहता था। तो, धीरे-धीरे अंधेरा गहराने लगा। पश्चिम के आकाश में आज फिर वीनस यानी शुक्र ग्रह जगमगा उठा और चमकीले लुब्धक तारे के आते ही एक-एक कर फिर से तारों की बारात सज गई। हमारे चारों ओर नीम अंधेरे में डूबे पहाड़ थे। कहीं-कहीं रोशनियां जगमगा रही थीं। खाना बन गया था। हम खाना खाकर काटेज में चले आए। 
ठंडक बढ़ने लगी तो भरत आकर आंगन में कैंपफायर जला गया। आग तापते हुए मैंने जेब से अपनी छोटी डायरी निकाली, आंगन के कोने में जाकर भर-नज़र तारों भरे आसमान को देखा और डायरी के पन्नों से गुलज़ार की नज़्म उभरने लगीः 
रात हमेशा स्याह नहीं होती है 
वो ज़र्द भी होती है, खाकिस्तरी भी, सुरमई भी। 
रात के रंग देखने हों तो 
कभी पहाड़ों पे चलो
रात पहाड़ों पर कुछ और ही होती है।...... 
हम पांचों सुन रहे थे नज़्म का शब्द-शब्द। रात घिरने के बाद से ही रात के रंग भी देख रहे थे और आसमान को भी। यह भी देख रहे थे कि कविता किस तरह आसमान के अद्भुत मंजर को शब्दों में उतार रही थी और वे शब्द कानों की राह भीतर जाकर कैसे हमारे मन के कैनवस पर आकाश की हू-ब-हू उसी तस्वीर में तब्दील हो रहे थेः 
आसमान बुझता ही नहीं
और, दरिया रौशन रहता है
इतना जरी का काम नज़र आता है
फलक पर तारों का 
जैसे रात में प्लेन से रौशन शहर दिखाई देते हैं।..... 
हम कभी उस पहाड़ी गांव के आसमान में आर-पार फैले रौशन दरिया ‘आकाशगंगा’ को देखते और कभी आसमान के आंचल में ज़रदोजी से जड़े सलमे-सितारों के काम को देख कर हवाई जहाज से दिखती किसी शहर की जगमगाती रोशनियों की कल्पना करने लगते। 
देर रात तक नज़्म में तारों भरा आसमान उतरता रहा और जब गुलज़ार के शब्दों में नज़्म भी आधी आंखें खोल कर सोने लगी तो हम भी अधमुंदी आंखों से अपने कमरे में सोने चले गए।  
ठंड तो थी लेकिन रात कल की तरह सिहराने-कंपाने वाली शिशिर की रात नहीं थी। आग तापते बातों-बातों में हम लोगों ने पहले ही तय कर लिया कि कल मनु-अपर्णा तो मनीष के साथ जंगल के रास्ते ऊंचे सुरकंडा पहाड़ पर चढ़ेंगे और मैं, लक्ष्मी और ऋचा जंगल की सैर पर जाएंगे। मुझे शरीर की ऊर्जा बचा कर रखनी थी। यह ध्यान रखना था कि मांसपेशियां हद से अधिक न थक जाएं क्योंकि एक दिन के बाद दिल्ली लौट कर मुझे राजस्थान के अजमेर जिले की ओर कूच करना था।    
दिल्ली से लगभग 300 किलोमीटर दूर, टिहरी गढ़वाल के ऊंचे पहाड़ पर बसे इस गांव में सुबह के दृश्य भी बड़े मनमोहक लगते थे। इसलिए रोज सुबह का इंतजार रहता था। मुंह अंधेरे उठने का लाभ यह था कि आकाश के रंगमंच पर रोमांचक परिवर्तनों को देख सकते थे। धीरे-धीरे रात की काली यवनिका हटती और उसके साथ ही रंगमंच के जगमगाते सितारे विदा हो जाते। चांद के घटने के दिन थे, इसलिए इन दिनों वह सुबह की वेला में ही पूर्व के आसमान में बारीक-सा नजर आता था। आज तीसरे दिन भी फाल्गुन कृष्णपक्ष चतुर्दशी का बारीक चांद बमुश्किल ही पूर्व में नजर आया लेकिन बेटी ने कैमरे में उसकी छवि उतार ही ली। अच्छा हुआ, अगले दिन तो चांद को छुट्टी पर रहना था और हमें वापस लौटना था। 
तारे विदा हुए और आसमान के रंगमंच पर चमकता सूर्य निकल आया। कल की तरह आज भी पहाड़ों पर गुनगुनी धूप खिल उठी  हालांकि हवा में ठंडक थी। चाय पीते-पीते सुबह की धूप का आंनद लेने के लिए हम रसोईघर के पास जाकर लकड़ी के टुकड़ों पर बैठ गए। मैं मनीष को देख रहा था जो केवल एक पतली टी-शर्ट, नेकर और चप्पल में यहां-वहां आते-जाते नहाने की तैयारी कर रहे थे। उन्हें देख कर ध्यान आया, अरे हमें तो यहां नहाने का ख्याल ही नहीं आया! मैंने मनीष से कहा, “नहा रहे हैं क्या?”
वे बोले, “हां, सुरकंडा जा रहे हैं, सोचा नहा कर चलें।” मैं सोच रहा था, प्रकृति अपनी गोद में पलने वाले प्राणियों को सहने की कितनी क्षमता दे देती है? इस ठंड में भी मनीष इतने कम कपड़ों में आराम से चल-फिर रहे हैं, नहा रहे हैं?
उनसे पूछा, “आपको ठंड नहीं लगती?”
वे बोले, “पहले लगती थी। धीरे-धीरे ठंड सहने की आदत पड़ गई। यहां तो रोज नहाने की जरूरत भी नहीं पड़ती। हफ्ता-दस दिन में नहा लें, तब भी चलता है।”
बेटी झाड़ियों पर बैठी चिड़ियों के फोटो खींच रही थी। उसने आकर एक फोटो दिखाया। झाड़ी पर छोटी-सी खूबसूरत काली-सफेद टिट् बैठी हुई थी। दूसरे फोटो में एक शाख पर यलो वेंटेड बुलबुल बैठी धूप का आनंद ले रही थी। लक्ष्मी ने हमें बताया, “अभी रसोई के पीछे, एक ही झाड़ी पर दस-पंद्रह बुलबुलें खेल रही थीं।”
रसोई में पराठे बनाने की तैयारी चल रही थी। लक्ष्मी ने कहा, “चलो, आलू के पराठे मैं बनाती हूं।” राणा जी मूली के पराठे बनाने की तैयारी में जुट गए। पराठे बने, खाए और और हम अपने-अपने गंतव्य की ओर चल पड़े यानी सुरकंडा पहाड़ और जंगल की सैर पर। मैंने चलते-चलते लक्ष्मी और ऋचा से कहा, “हम जंगल से मिलने जा रहे हैं, इसलिए वहां हर चीज को गौर से देखेंगे और महसूस करेंगे। खेतों को पार करते हुए सामने भव्य हिमालय के के दर्शन हुए। जंगल शुरू होते ही दो-एक लाफिंग थ्रस झाड़ी में फुदकती दिखीं। तिरछी पगडंडी के दोनों ओर इस जंगल के बहुत पुराने और आसमान को छूते एबीज पिंड्रो यानी रेंसुल के मोटे पेड़ थे। हम उन्हें छूते, उनसे मिलते आगे बढ़ते रहे। मुझे रिटायर्ड वन अधिकारी जीवन मेहता जी के शब्द याद आ गए कि कभी वे यहां कानाताल के जंगलों में आया करते थे। मैं तो तय करके ही आया था कि बुजुर्ग पेड़ों को उनकी याद दिलाऊंगा। इसलिए मैंने कुछ उम्रदराज पेड़ों से उनके बारे में बात की- रैंसुल से, देवदार और बुरांश से भी। मैंने कहा, “याद है आपको, पचास-साठ वर्ष पहले आपसे मिलने एक वन अधिकारी आया करते थे-जीवन सिंह मेहता? वे अब भी आपको याद करते हैं।” मैं तने पर हाथ लपेटे उनकी बात सुनने की कोशिश करता। वे अपने ऊंचे सिर से सांय-सांय की भाषा में कुछ कहते थे। शायद कहते हों कि हां, उन्हें भी याद है। एक बुजुर्ग बुरांश की तो गोद में बैठ कर मैंने ये बातें कीं। 
पगडंडी अब ऊपर चढ़ने लगी। हमने धीरे-धीरे उसे पार किया और ऊपर समतल में पहुंचे। यह वही जगह थी जहां परसों आते समय हमने बर्फ की सफेद कालीन देखी थी। आज हम वहां देवदारूओं की छांव में गए और बर्फ के पास बैठे। इस जगह से आगे मिश्रित जंगल था। उसमें कई प्रजातियों के छोटे-बड़े पेड़ प्रेम से रहे थे। वहां देवदार के वृक्ष तो थे ही, थुनेर, बुरांश, अंयार, कांचुला (एसर) या किरमोली, बांज (ओक), मोरू या तिलौंज, खर्सू आदि के भी पेड़ थे। बीच-बीच में खिले बुरांश हरियाली में लालिमा बिखेर देते थे। हमने वहां कई पेड़ों से  मुलाकात की। पेड़ों के साथ खड़े होकर कई बार हिमालय के मनोरम दृश्य देखे। 
मुझे बार-बार तोरण द्वार-सा वह बुरांश का वृक्ष याद आ रहा था जो परसों देखा था। बांटुली (हिचकी) लग रही थी। मुझे लगा, जरूर वही बुरांश याद कर रहा होगा। इसलिए हम कानाताल की पहाड़ी के ऐन सामने, गांव के सिरहाने उस जगह आज फिर पहुंचे। सुर्ख फूलों की भाषा में खिलखिलाता बुरांश वहीं विशाल हिमालय को देखता हुआ खड़ा था। उसकी संगत में फिर फोटो खींचे। लौटे तो उस कच्ची पगडंडी से ऊपर खड़ी चढ़ाई में एक बुरांश पर आई बहार दिखाई दी। थके तो थे लेकिन मन नहीं माना और उससे मिलने चले गए। 
उससे नीचे एक मकान था जिसके आंगन से सटे दो पर्णविहीन पेड़ अब भी शीत समाधि में ही खड़े थे। उन्हें पता ही नहीं था कि वसंत आ गया है और बुरांश खिल चुके हैं। 
ऊपर जाकर देखा, वहां चौरस खेत था जिसके किनारे मेंड़ पर वह बुरांश खिला था। बुरांश के उस वृक्ष ने जैसे सुर्ख फूलों का मुकुट पहना हुआ था। केवल दो फुनगियों पर ही फूल खिले हुए थे। उसी की कतार में हिमालय को ताकते कुछ और पेड़ खड़े थे जिन्होंने उस चोटी पर मौसम की मुश्किलें झेली थीं। उनकी कद-काठी कठिन समय को साहस के साथ झेलने की कहानी बयां कर रही थी।   
हम उनसे मिल कर वापस लौटे। कितना सुकून था वहां की शीतल हवा और पेड़ों की छांव में। कई जगह धानी रंग की नन्हीं चिड़ियां शाखों पर भागती-खेलती चहक रही थीं। काश, हम उनकी भाषा समझते। हो सकता है, वे उन पेड़ों और उस जंगल के बारे में ही गीत गा रही हों। कौन जाने?
पगडंडी के उतार में उतर ही रहे थे कि अचानक लगा जैसे तेज आंधी आ गई हो। चारों ओर देखा, लेकिन कहीं कुछ नहीं। जैसे अंधेरे में लहरों का शोर आ रहा हो या जैसे किसी पहाड़ी नदी में ऊपर कहीं बाढ़ आ गई हो। वही सुसाट-भुभाट। वही हू...हू...हू...सांय...सांय। कहां से आ रही थी वह धीरे-गंभीर आवाज? तभी लक्ष्मी ने कहा, “वहां ऊपर देखो, आकाश की ओर।” 
हमने देखा, वहां ऊंचे रैंसुल और देवदार के पेड़ों के सिरे यहां से वहां झूम रहे थे। वे हवा के साथ ऊंची आवाज में बातें कर रहे थे जबकि नीचे माहौल बिल्कुल शांत था। हम तेजी से आगे बढ़ते रहे और काटेज के पास चले आए। देखा, मनु और अपर्णा भी आ चुके हैं। पता लगा, वे काफी ऊंचाई तक सुरकंडा पहाड़ पर चढ़े। आगे एक बड़ा पेड़ गिरा था जिससे रास्ता पार करना कठिन लगा और वे लौट आए। 
खाना खाकर बाहर आए तो देखा खेतों में जुताई और पटेला लगाने की तैयारी चल रही है। खुशाल राणा दोनों बैलों को खेत में लाए और पाटा चलाने लगे। सधे हुए बैल थे। उनके नाक छेद कर उनमें लंबी रस्सी फंसाई हुई थी। राणा एक पैर और कभी-कभी दोनों पैर पटेले पर रख कर खड़े हो जाते। उनके और पटेले के भार से ढेले फूट कर जमीन समतल होती जा रही थी। वे थोड़ा रूके तो मैंने पूछा, “इन बैलों का नाम क्या है?”
वे चौंके, “नाम? हम तो ‘ब’ कहते हैं इन्हें।” वे पटेला चलाते हुए ‘ब’, ‘ब’ कहते थे और दोनों बैल सधे हुए कदमों से सीध में आगे चलते रहते। खेत के अंत में राणा कहते, “ह” और दोनों बैल एक साथ वापस मुड़ जाते। वे फिर रूके तो मैंने पूछा, “जब आप उनसे चलने के लिए ‘ब’ कहते हैं, तो उन्हें भ्रम नहीं होता कि आपने किससे कहा है? हमारे यहां तो दोनों बैलों के नाम होते हैं, जैसे इनमें एक काला-सफेद है और एक भूरा तो, हम नाम रखते कजारा और भूरा। नाम लेने पर उन्हें पता लग जाता कि किससे क्या कहा जा रहा है।”
राणा बोले, “सुना है, हमारे पुरखे भी नाम रखते थे। लेकिन, अब कोई नहीं रखता। ‘ब’ कह कर ही काम चल जाता है। वे समझ जाते हैं।”
“तब तो आप गायों को भी ‘ग’ कहते होंगे?” 
वे बोले, “हां। नाम तो उनके भी नहीं रखते।”
मैंने कहा, “आप इनके नाम रख कर देखिए। ये आपकी बात और अच्छी तरह समझने लगेंगे।
मौसम को शायद पता लग गया था कि अगली सुबह हम वापस लौट रहे हैं। वह पहले दिन की ही तरह रंग में आ गया। दोपहर बाद आसमान पर बदली छाने लगी और धीरे-धीरे आसमान बादलों से भर गया। शाम होते-होते सांय-सांय हवा चलने लगी। मोरू के पेड़ आज फिर सरगोशियां करने लगे। हम गर्म कपड़ों में लदे-फंदे बैठे बातें करते रहे। बीच-बीच में ठंडी हवा दरवाजे पर दस्तक दे जाती। बाहर खट-पट सुनी तो देखा भरत कैम्पफायर के लिए लकड़ियां लाया है। हमने दरवाजे से मुंह निकाल कर कहा, “नहीं भरत, नहीं। आज कैम्पफायर नहीं चाहिए। इस हवा में बाहर बैठ ही नहीं सकते।” वह चला गया। बाद में खाना खाने के लिए बुलाने आया। कांपते-ठिठुरते खाना खाया और लौट कर बिस्तरे में दुबक गए। मोरू के पेड़ रात भर जोर-जोर से बोलते रहे और मदमस्त हवा सीटियां बजाती रहीं। 
सुबह हवा शांत थी। अपर्णा ने कहा, “रात भर तेज ठंडी हवा चल रही थी, फिर भी कोई बाहर बरामदे की लाइट को कभी आन करता और कभी आफ।” लक्ष्मी ने समझाया, “यह काम भी तेज हवा ही कर रही थी। बल्ब ढीला है, वह उसे हिलाती थी। इसलिए कभी वह जलता और कभी बुझता जाता था।” खैर, धूप खिली। हम चाय पी ही रहे थे कि देखा, तमाम अबाबीलें मस्त होकर हवा में गहरे गोते लगा रही हैं। उनमें से दो-एक खाना खाने के कमरे के भीतर भी आकर छत की लकड़ियों पर बैठतीं और चहक कर उड़ जातीं। मैंने मनीष से कहा, “गांव में मेरे पिताजी अबाबीलों को इस तरह गोते लगाते हुए देखते तो कहते थे- अब वर्षा होगी। वे इन्हें ‘गोंतली’ कहते थे। लगता है, यहां भी वर्षा होगी।” 
हमने नाश्ता किया और चलने की तैयारी करने लगे। तभी पास की पहाड़ी से चकोरों की तेज आवाज आने लगी। ऋचा और अपर्णा कैमरा लेकर उनके फोटो खींचने की कोशिश करने लगीं। वे उस ओर देख ही रही थीं कि पत्थरों की दीवार पर एक चकोर आकर बोलने लगा- चाकुर...चाकुर...चाकुर! तभी दूसरा चकोर भी उसके पास आ खड़ा हुआ। लगता था, उन्हें पता लग गया है कि हम वापस लौट रहे हैं। कल तक तो वे छिपे ही रहते थे। आज बाई-बाई करने आ गए! हमने उनकी छवि हमने अपने मन और कैमरे में सहेज ली। फिर हम जंगल से होकर वापसी यात्रा पर निकल पड़े। हमें विदा करने के लिए मनीष के साथ ही खुशाल राणा, उनका बेटा नितिन और भरत साथ चले। 
जंगल पार करके बुरांश के तोरण द्वार से आगे बढ़ ही रहे थे कि रोज आसपास चहकने वाली छोटी-सी धानी रंग की चिड़िया बिल्कुल पास में तेज-तेज चहकने लगी- स्वीह्...स्वीह्...स्वीह्! हम पेड़ की शाख पर देखने लगे कि वह कहां बैठी है, कि तभी पीछे से मनीष तेजी से आकर यह बोलते हुए आगे बढ़ गए, “वह कह रही है कि कुछ दिन और रूकिए, अभी क्यों जा रहे हैं!” हम कुछ जवाब देते, तब तक मनीष मुख्य मार्ग पर खड़ी टैक्सी तक पहुंच गए। हमने उन सभी साथियों के साथ दो-एक यादगार तस्वीरें लीं जिनकी पृष्ठभूमि में विशाल हिमालय खड़ा था। 
फिर उन सभी साथियों को, उन पेड़ों, पहाड़ों और चिड़ियों को, बुरांश के खिले फूलों, शीतल हवा और हिमालय की धवल चोटियों को अलविदा कहा और वापसी यात्रा शुरू की। हद है, सिर्फ तीन दिन वहां रहे, फिर भी उस जगह को छोड़ने पर निशाश जैसा जाने क्यों लग रहा था। हम भावुक हो रहे थे, इसलिए काफी दूर तक आपस में बिना बोले, चुपचाप चलते रहे।
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