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नैनपुर अब कोई ट्रेन नहीं आएगी
सतीश जायसवाल
जबलपुर से नागपुर के बीच छोटी लाइन का खूबसूरत रेलवे स्टेशन-- नैनपुर इस पहली दिसम्बर से सूना हो गया। अब इस पर कोई ट्रेन नहीं आएगी। और अब तक जितनी ट्रेनों का आना-जाना यहां से होकर रहा है उनसे और उनके चलने से जुड़ा हुआ माल-असबाब यहाँ से हटाया जा रहा है। रेलवे की नज़र में जो माल-असबाब है, इतिहास की नज़र में वह धरोहर है। लेकिन यह ऐतिहासिकता विकास के नज़रिये से बाहर की बात है। और रेलवे का नजरिया भी यही दिखता है। उसकी अपनी पहली प्राथमिकता में माल का लदान और परिवहन होता है। यात्रियों का परिवहन तो रेल की अन्य प्राथमिकता है। इसके बावजूद यह भी एक तथ्य है कि रेलवे का अपना इतिहास है। और उसे सहेजा जाना जरूरी है। नैनपुर रेलवे स्टेशन का अपना इतिहास १०० बरसों से भी पुराना है। छोटी लाइन का यह रेलवे स्टेशन १९०२ ई० मेँ ट्रेनों के लिए खुला था।
यह -- " हउआ " -- किस भाषा का शब्द है, और इसका क्या मतलब होता है ? मुझे नहीं मालूम । लेकिन यह शब्द हमारे रोजमर्रा के व्यवहार में शामिल हो चुका है। और सब के साथ मैँ भी इसका उपयोग करता हूँ। दिलचस्प बात यह कि अर्थ जाने बिना भी, व्यवहार में इसका प्रयोग ठीक उसी जगह पर होता है जहां इसकी जरूरत होती है। और वहाँ यह अपने सही अर्थ में ही प्रयुक्त होता है। जबलपुर का  एक लोकल स्टेशन है -- हांऊबाग़ । सुनने और बोलने में कुछ ऐसा लगता है, जैसे इसकी उत्पत्ति इसी, 'हउआ' शब्द से हुयी हो । यह छोटी लाइन का रेलवे स्टेशन है।  यहाँ से छोटी लाइन की एक खूबसूरत ट्रेन चलती है -- ०००१ हाऊबाग़ - बालाघाट सतपुडा एक्सप्रेस। भोर में, ५ बज कर ३० मिनट पर। भोर में चली यह एक्सप्रेस ट्रेन , कोई ४ घंटों में नैनपुर पहुंचा कर आगे, बालाघाट के लिये, निकल जाती है जहां उसे पहुँचना होता है।
बीच के किसी स्टेशन पर उतर कर अपनी ट्रेन को जाते हुए देखना मुझे एक अजीब सी उदासी में छोड़ता है। ऐसे, जैसे किसी होटल या ' सराय ' में रात गुजारने के बाद दिन में अपना असबाब समेट कर खुद कहीं और के लिये निकल पड़ना। वैसे अब 'सराय' बचे ही कहाँ ? कहीं मिलते हैं तो, किन्हीं पुराने बयानों में। वैसे ही अब, यह खूबसूरत ट्रेन 'सतपुडा एक्सप्रेस' ही कहाँ बच जाने वाली हैं ? अब सभी छोटी लाइनों को बड़ी लाइनों में बदला जा रहा है। रफ़्तार बढ़ जायेगी, आमद-रफ्त बढ़ जायेगी। यह, रेल खंड भी बड़ी लाइन में बदल दिया जाना है। तब यह ख़ूबसूरत ट्रेन '०००१ हांऊबाग-बालाघाट सतपुडा एक्सप्रेस'' भी नहीं रहेगी। इसकी जगह कोई और नंबर, कोई और नाम और कोई दूसरी ट्रेन होगी जो, मालूम नहीं ऐसी ही खूबसूरत होगी कि नहीं ? यह विचार मेरी उदासी को गहराता है या मैं ही ऐसी किसी गहरी उदासी से रू ब रू मुलाकात के लिये इतने दिनों से यहाँ -- नैनपुर आने को बेताब था ?
यदि वह उदासी केवल एक रेल खंड की छोटी लाइन के बड़ी लाइन में गुम जाने के अंदेशे की थी, तो नैनपुर रेलवे स्टेशन पर हमारा स्वागत करने वाली खिली-खिली धूप में उसे छंट जाना था। जब हम वहाँ पहुंचे तो सर्दियों के दिन की खिली - खिली धूप में नैनपुर का रेलवे स्टेशन चमक रहा था। और स्टेशन से ही दिखने वाली खूबसूरत सी रेलवे कालोनी किसी मशहूर चित्रकार के लैंडस्केप की तरह फ़ैली हुयी थी। लेकिन गुलाबी कवेलू और विक्टोरियन शैली की ढलवां छतों वाली चित्र-सदृश कालोनी किसी चित्र की तरह ही स्थिर थी। कोई गति या हलचल उसमेंनहीं थी सिवाय, सुबह के उस समय चल रही हल्की हल्की हवा के।  और हवा उस किसी चित्र में दिखाई नहीं पड़ने के बावजूद बदन को छू रही थी।  इसलिये उसे महसूस किया जा सकता था । विक्टोरियन शैली के,इसके मकानों के भीतर, ब्रिटिश दिनों के 'फायर प्लेस' अभी, बिलकुल कल की तरह बाकी हैं। उन दिनों के किसी 'फायर प्लेस' के पास ऐसा लगेगा कि, पिछली रात में ही यहाँ लोग रहे होंगे और देर तक इसके गिर्द बैठे आग तापते होंगे।
 
बाहर से देखने पर इन घरों की चिमनियाँ इस जीती-जागती बस्ती को किसी चित्र से भी अधिक सजावटी बनाती हैं। मेरे युवा मित्र तनवीर हसन का सौंदर्य बोध, पता नहीं क्यों और कैसे और कितने गहरे से, इन फायर-प्लेसों और उनकी चिमनियों के साथ जुडा हुआ है ? मुझे लगा कि ये चिमनियाँ उन्हें उदासी के बदले कोई लयात्मक उद्दीपन प्रदान करती होंगी। तनवीर, भारतीय रेल सेवा के एक बड़े अधिकारी हैं। लेकिन उनके साथ मेरी मित्रता उनके संवेदनशील इतिहास-बोध से है। ट्रेन के निकल जाने के बाद अब वहाँ हमारे अपने बोलने-बात करने की आवाजों से ही आवाज हो रही थी। स्टेशन किसी चित्र की तरह बिलकुल निशब्द था। और रेलवे कालोनी, मालूम नहीं कब से बिना किसी आवाज के गुजारा कर रही थी ?
 
भारतीय रेल के हिसाब-किताब में नैनपुर अभी दक्षिण-पूर्व-मध्य रेलवे, बिलासपुर के अंतर्गत आने वाले नागपुर डिवीजन का हिस्सा है। पहले यह नैनपुर , छोटी लाइन का एक स्वतंत्र और महत्वपूर्ण रेल-डिवीजन था। चारों दिशाओं के आदिवासी इलाकों --जबलपुर, मंडला, छिंदवाडा और बालाघाट-- को रेल संपर्क से जोड़ने वाला रेल मंडल। अब यह बड़ी लाइन का एक छोटा स्टेशन बन कर रह जाने वाला है। एक महत्वपूर्ण डिवीजन का उसका ओहदा अब बिखर कर, कुछ नागपुर डिवीजन में समा जाएगा और बकाया के हिस्से भी, ऐसे ही टुकड़ों-टुकड़ों में कहीं ना कहीं पुनर्वास पा जायेंगे । यह, विस्थापन और पुनर्वास की एक ऐसी दारुण प्रक्रिया है, जिस पर अभी किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। और, शायद जाएगा भी नहीं , क्योंकि यह विकास की अनिवार्य परिणति है। देखने और सोचने वालों के ध्यान तो विकास पर ही  केन्द्रित होते हैं।
 
लेकिन  नैनपुर में तो इस प्रक्रिया के समानांतर, एक पूरी की पूरी मनुष्य जाति के होने के निशानों को मिटाने का काम भी चल रहा है। कभी यह नैनपुर ५०० घरों की एक खूबसूरत ऐंग्लो-इंडियन कालोनी वाली गुलज़ार बस्ती रही है। अब, यहाँ एक भी ऐंग्लो-इंडियन परिवार नहीं बचा।  रेलवे की नौकरियों से रिटायर होने के बाद कुछ परिवार तो अपने पैतृक-कुल से मिलने की आस लिये हुए इंग्लैण्ड या आस्ट्रेलिया या उन किन्हीं देशों की तरफ निकल गए जहां,मालूम नहीं, उन्हें उनका कुल मिला या नहीं ? और बकाया के, जो कहीं नहीं जा सके होंगे अब कहाँ हैं , किस हाल में हैं और क्या-- हैं भी या नहीं ? किसी को नहीं पता। ना ही कोई यह पता करना चाहता। एक पूरी की पूरी मनुष्य-जाति, जिसके पास उसके अपने किस्म का ऐसा सौंदर्य-बोध था, जो आज के दिन तक अपनी दर्शनीयता में हमारे पास बचा हुआ है वह इस तरह लापता हो जाए ! और कहीं भी उसके बारे में पता करने की कोई कोशिश ना नजर आये। यह कितना अमानवीय है ? यह अमानवीयता नैनपुर में उन दिनों की स्मृतियों में जगह पाकर रह रही है, जो सचमुच में खूबसूरत दिन थे। लेकिन दुर्भाग्य से हमारे अपने इतिहास के बदसूरत दिनों का हिस्सा थे। इसलिए, यहाँ उनसे छुटकारा पाने की कोशिशें चल रही हैं। ये कोशिशें दुर्भाग्य से छुटकारा पाने के लिये हैं या इतिहास के उस हिस्से से छुटकारा पाने के लिये हैं जिसे हमारी अपनी समझ ने एक ऐसी बदसूरत शकल दे दी जिससे छुटकारा पाने के लिये बाद के दिनों में मशक्कत करनी पड़े ? उसकी एक लाचार कोशिश यहाँ चल रही है। क्या अपने ही इतिहास से छुटकारा पाया जा सकता है ? 
 
अंग्रेजों ने यहाँ, अपने लिये एक यूरोपियन क्लब बनवाया था , जैसा वो अन्य बड़े और अपने पसंदीदा रेलवे स्टेशनों में किया करते थे । उस क्लब की ईमारत, कुछ बरस पहले ढहा दी गयी क्योंकि वह 'यूरोपियन क्लब' था। औपनिवेशिक दिनों की निशानी ? अलबत्ता,उस क्लब का 'बिलियर्ड्स टेबल' अभी बचा हुआ है और अपने दिनों की तरह शानदार है। पता नहीं इस टेबल पर खेलने वाले लोग अब यहाँ, नैनपुर में हैं या नहीं और क्या वो इस टेबल की तरह शानदार लोग हैं ? बाद में, सन १९२२ में यहाँ भी हिन्दुस्तानियों ने 'यूरोपियन क्लब' के मुकाबले मे अपने लिये 'नार्थ ईस्ट इंस्टीटयूट ' बना लिया था। इसमें उनकी अपनी एक लायब्रेरी भी है।  इस लाइब्रेरी में कुछ पुरानी किताबें अभी बची हुयी हैं।लेकिन इन पुरानी पुस्तकों में ''नैनपुर नैन'' मुझे नहीं मिली  जो नैनपुर के उन दिनों पर केंद्रित एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ मानी जाती है। कटनी के राय बहादुर हीरा लाल ने निमाड़ के इतिहास और उसके वैभव पर केंद्रित महत्वपूर्ण गवेषणात्मक कार्य किया था। और तीन पुस्तकें लिखी थीं।  ''नैनपुर नैन'' उस त्रयी की एक पुस्तक है। वह इसी नैनपुर से सम्बंधित है इसलिए, मेरा अनुमान था कि अब दुर्लभ हो चुकी वह पुस्तक मुझे यहाँ देखने मिल जायेगी। लेकिन मेरा अनुमान गलत साबित हुआ। किसी के लिए भी यह समझ पाना मुश्किल होगा कि यहाँ  के लोग अपने अंचल के एक महत्वपूर्ण इतिहासविद और साहित्यकार के अवदान के प्रति इतने उदासीन कैसे हो सकते हैं ? मुझे इस बात पर संतोष करना पड़ा कि नैनपुर की रेलवे कालोनी में एक लाइब्रेरी है और उसका नामकरण महादेवी वर्मा के नाम पर किया गया है।  
 
नैनपुर रेलवे स्टेशन १९०२ में प्रारम्भ हुआ था। यहाँ रेलवे का अपना एक 'हेरिटेज हाउस' है, जहां १९०२ में  प्रारंभ हुए इस स्टेशन का क्रमिक विकास कुछ खूबसूरत पेन्टिंग्ज़ में चित्रित है।  एक पेंटिंग में हाथी हैं जो ईमारती लकड़ियों के भारी - भारी लट्ठों को अपनी सूंड से लपेट कर मालगाड़ी के डिब्बों में लाद रहे हैं। उन दिनों, नैनपुर चारों तरफ घने जंगलों से घिरा हुआ था। और इन जंगलों से कीमती ईमारती लकडियाँ काटकर बाहर भेजने का काम इस खूबसूरत रेलवे स्टेशन से किया जाता था। अब नैनपुर के चारों तरफ के वो जंगल पर्याप्त विरल हो चुके हैं। और हाथी भी यहां नहीं रहे। 
 
उन दिनों की निशानियों को इस ''हेरिटेज हाउस'' में धरोहर की तरह सुरक्षित रखा गया है। यहां वो निशानियाँ इतने करीने से सजा कर रखीहुयी हैं कि उनके सहारे उन दिनों में पहुँच जाने का आभास होने लगता है जो दिन अब १०० बरस से भी पहले की बात हो गए। सन १९०२ में, जब यहाँ बिजली नहीं थी तब, जिन किरासीन लैम्पों से यहाँ रोशनी की जाती थी वो लैम्प और उनके साफ़-सुथरे कांच अभी भी उन दिनों का झरोखा बने हुए हैँ। उन दिनों यह छोटा सा पहाडी रेलवे स्टेशन चारों तरफ से घने जंगलों से घिरा हुआ रहा होगा। और उन जंगलों की छाया यहाँ की रातों पर पड़ती होगी। तब यहाँ कितना घना अन्धेरा हुआ करता होगा ? उस घने अंधेरे में किरासीन वाले इन लैम्पों की रोशनी में जितनी दूर तक दिखाई पड़ता होगा, उस से अधिक दूर तक दिखाई नहीं पड़ने वाला फैलाव होता होगा। दिखाई नहीं पड़ने वाले उस फैलाव में दिलकश रूमानियत के लिये खूब जगह रही होगी । तब यह नैनपुर, अपने होने से अधिक एक रूमान में बसर करता हुआ होगा। तब उस एक मनुष्य जाति के लोगों का भी बसर यहाँ रहा होगा जिनका अब यहाँ नहीं होना नैनपुर को स्मृतिजीवी बनाता है -- नोस्टेलजिक। एक उदास स्मृति-जीवन यहाँ वास करता है।
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