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तो बंजर हो जाएगा बुंदेलखंड

अंबरीश कुमार

एनडीए सरकार अपनी महत्वाकांक्षी नदी जोड़ो योजना की शुरुआत बुंदेलखंड में केन-बेतवा जोड़ परियोजना से करने जा रही है। यह परियोजना मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड अंचल में लागू की जाएगी, हालांकि इसके दूरगामी नतीजों को लेकर बहस अभी जारी है। भू वैज्ञानिकों, पर्यावरण विज्ञानियों और कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि छोटे स्तर पर इस योजना के नतीजों का अध्ययन करने के बाद ही इसे बड़े पैमाने पर लागू करना चाहिए। इसकी मुख्य वजह उन खतरों को बताया जा रहा है, जिनके चलते लोगों में यह डर फैल रहा है कि योजना से जितना फायदा होगा, उससे कहीं ज्यादा नुकसान ही न हो जाए।
खास बात यह है कि अभी तक नदी जोड़ो योजना को देश के किसी भी हिस्से में लागू कर कुछ वर्षों तक उसके प्रभाव का अध्ययन नहीं किया गया है। बुंदेलखंड में भू-जल का स्तर काफी नीचे है। यह क्षेत्र लगातार अकाल और सूखे से प्रभावित रहा है और बड़े पैमाने पर पलायन का दंश भी झेलता रहता है। इस क्षेत्र से संबंधित दो नदियों को जोड़ने वाली इस योजना के बाद अगर खेती-किसानी को कोई झटका लगा तो संकट और बढ़ जाएगा।
जमीन पर असर
नदी जोड़ो योजना को लेकर पर्यावरण के जानकार और भू वैज्ञानिक काफी चिंतित हैं। यह चिंता उन अध्ययनों के नतीजों के बाद सामने आई जिनमें नहरों का सर्वे कराया गया था। भारतीय भू सर्वेक्षण (जीएसआई) के पूर्व निदेशक वीके जोशी के मुताबिक नदी जोड़ योजना से खेती की हजारों एकड़ भूमि बंजर हो जाने की आशंका है। इसकी वजह नहरों के आसपास की भूमि का क्षारीयकरण या अम्लीयकरण है, जिसके बाद जमीन खेती लायक नहीं रह जाती। यह बात खुद जीएसआई के सर्वे से सामने आ चुकी है।
वर्ष 2001 से 2003 के बीच भारतीय भू सर्वेक्षण ने शारदा सहायक नहर और इंदिरा कैनाल समेत देश की छह बड़ी नहरों का सर्वेक्षण कराया था। इसमें उत्तर प्रदेश और राजस्थान की नहरों को शामिल किया गया था। सर्वे में पता चला कि नहरों की वजह से एक बड़े इलाके के किसान पानी मिलने के बाद खेती से समृद्ध हो गए, लेकिन कुछ इलाकों से किसानों का पलायन भी शुरू हो गया। इसका कारण जल रिसाव के चलते नहर के किनारे की जमीनों का धीरे धीरे अम्लीय हो जाना बताया गया। राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले में नहर के किनारे बसे तीस गांव इसी वजह से धीरे-धीरे पूरी तरह खाली हो गए।
दिक्कत यह है कि नदी जोड़ो योजना जब भी लागू होगी, नदियों को नहर के जरिए ही जोड़ा जाएगा। इससे जल रिसाव के चलते अम्लीयता बढ़ेगी, जिसका असर स्वाभाविक रूप से भूमि की उर्वरता पर होगा। बुंदेलखंड की नदियों पर काम कर चुके अरुण कुमार तो इसे समूचे पर्यावरण के लिए खतरनाक मानते हैं- खासकर उन हालात में, जब बुंदेलखंड का पर्यावरण संतुलन पहले ही बुरी तरह बिगड़ा हुआ हो। मध्य प्रदेश के किसान नेता डॉ. सुनीलम भी कहते हैं कि बिना किसी अध्ययन के इस जोड़ योजना को लागू करना बुंदेलखंड की समूची आबादी के हितों के खिलाफ है।
आधी शताब्दी पहले तक दोनों मानसूनों- बंगाल की खाड़ी और अरब सागर का मानसून- से इस अंचल को भरपूर पानी मिल जाया करता था। पचास और साठ के दशक में भोपाल से झांसी के बीच सौ सेंटीमीटर वर्षा रिकॉर्ड की जाती थी। पर कुछ ही दशक में जंगलों की अंधाधुंध कटाई के बाद बरसात इतनी कम होने लगी कि बुंदेलखंड पिछले डेढ़ दशक में कई बार सूखे और अकाल का शिकार हुआ। बेतवा जैसी सदानीरा नदी के पानी की धार भी अप्रैल आते-आते झांसी के आगे दम तोड़ देती है। वह भी तब, जब बुंदेलखंड जैसा ड्रेनेज सिस्टम विश्व में कहीं नहीं है। यह पर्यावरण के साथ खिलवाड़ का ही नतीजा है। नदी जोड़ योजना से यह ड्रेनेज सिस्टम बुरी तरह प्रभावित होगा, जिससे कहीं जल भराव तो कहीं सूखे की स्थिति पैदा हो जाएगी।
नफा-नुकसान
राष्ट्रीय नदी विकास अभिकरण (एनडब्लूडीए) ने देश में कुल तीस नदियों को जोड़ने की योजना प्रस्तावित की है। इसमें पहला नंबर केन-बेतवा का है। 10 फरवरी 2003 को नदी जोड़ो परियोजना के कार्यदल की पहली बैठक में निर्णय लिया गया कि उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जल संसाधन विकास से संबंधित मास्टर प्लान को कुछ महीने के अंदर पूरा किया जा सकता है। इस परियोजना के सामाजिक, आर्थिक पक्षों और कृषि पर पड़ने वाले प्रभाव के आकलन की जिम्मेदारी नेशनल कौंसिल फॉर एप्लाइड इकनॉमिक रिसर्च (एनसीएईआर) को सौंपी गई थी। इसके अध्ययन के आधार पर बांधों, नदियों के दक्षिण एशिया नेटवर्क (सैंडप) ने पाया कि यह योजना कई दृष्टि से बुंदेलखंड के लिए घातक होगी। इस पर जब स्थानीय लोगों से राय ली गई तो 49 फीसद किसानों ने लिफ्ट सिंचाई और 26 फीसद ने कुओं और नलकूपों को बेहतर विकल्प बताया। साफ है कि क्षेत्र के ज्यादातर लोग केन-बेतवा जोड़ के पक्ष में नहीं हैं। यह भी कहा गया है कि इस योजना पर आने वाली कुल लागत नदी घाटी में होने वाले असल लाभ के मुकाबले घाटे का सौदा है। सबसे बड़ी बात यह कि इस योजना को लेकर दोनों राज्यों में जल बंटवारे पर कोई सहमति बनने के भी आसार नहीं है।साभार -नवभारत टाइम्स 
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