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प्रभाष जोशी की प्रासंगिकता

विभांशु दिव्याल

मालवा से निकल देश की राजधानी दिल्ली आकर समूची हिंदी पत्रकारिता के पितृ- पुरुष बन जाने वाले प्रभाष जोशी की प्रासंगिकता का प्रश्न उनके व्यक्तित्व-कृतित्व के प्रशस्तिवाचन और नई पत्रकार पीढ़ी को उनका अनुसरण करने का उपदेशामृत पिलाने जैसी विरुदावलि के साथ तो सरलता से निपट सकता है, लेकिन जब इस प्रश्न को निरंतर क्षरणकारी पत्रकारीय मूल्य और अर्वाचीन भारत की जटिल राजनीतिक- सामाजिक अंत:प्रक्रियों के समक्ष खड़ा किया जाए तो अनेकानेक प्रति-प्रश्न मुंह बाने लगते हैं। पहली बात यह कि प्रभाष जी न तो अजातशत्रु थे और न निर्विवाद। उनके समकालीन बहुत से कथित बड़े पत्रकार ऐसे थे, जो उन्हें पसंद नहीं करते थे। उनके लेखों को भरपूर पसंद करने वाले, चाहने वाले और सहमत होने वाले पत्रकारों- पाठकों की संख्या किसी भी अन्य की तुलना में बहुत बड़ी थी, जो उनकी लेखकीय सत्ता को हर समय मजबूत बनाए रखती थी मगर ऐसे राजनीतिक पाठकों की संख्या भी खासी बड़ी थी जो उनसे बाकायदा चिढ़ते थे, उनके आलोचक थे और निंदक भी। यह दीगर बात है कि उनके विरुद्ध ऐसे लोगों को प्रतिवार करने के लिए तार्किक और संगत भाषाई या वैचारिक औजार नहीं मिलते थे लेकिन उनका भावुक विरोध अपनी जगह कायम रहता था। वस्तुत: जो सर्वप्रिय हो, किसी की चेतना को कोंचता न हो, जिसे कोई भी अपना शत्रु न मानता हो, जिससे कोई भी असहमति नहीं रखता हो, वह कुछ भी हो सकता है पर बड़ा पत्रकार नहीं। इस दृष्टि से प्रभाष जी सचमुच बड़े पत्रकार थे, बहुत बड़े पत्रकार थे और सीधे कहें तो प्रभाष जोशी थे। दूसरी बात यह कि कुछ भी और होने से पूर्व प्रभाष जी अपने सभी रागद्वे षों सहित एक इंसान थे, इंसान यानी जो अपनी तमाम अर्जित विशिष्टताओं के बावजूद इंसान होता है- खूबियों और खामियों का पुंज। इसलिए प्रशस्ति और निंदा से परे उनके ‘प्रतिपक्षी’ रूप में गोता लगाया जाए तो जरूर कुछ संग्रहणीय मोती हाथ लगते हैं। वह संस्कारी हिंदू थे मगर पत्रकारीय धारा के प्रतिपक्ष थे। वह राजनीतिक विश्लेषक-चिंतक थे परंतु मौजूदा लोकतंत्र में विकसित संसदीय पक्ष और विपक्ष दोनों के प्रतिपक्ष थे। पत्रकार या लेखक के तौर पर एक व्यक्ति सबल प्रतिपक्ष तभी बनता है, जब उसके पास अपने समय को परखने के अपने निज के सैद्धांतिक मापदंड हों और उसके अंदर इतना साहस हो कि ऐसी परख करते हुए और उसको अभिव्यक्ति देते हुए अपनी कलम को सधा हुआ रख सके। प्रभाष जी के पास दोनों ही थे-मापदंड भी और साहस भी। साहस यानी बहुत कुछ खो देने की आशंकाओं के बीच अपने वैचारिक आग्रहों के साथ खड़े रहने की क्षमता और अपनी प्रखरता के बल पर सत्ता से बहुत कुछ पा लेने की असीम संभावनाओं के बीच स्वयं को लोभग्रस्त न होने देने की दृढ़ता। प्रभाष जी में यह साहस था, इसीलिए वह सबल और सचेत प्रतिपक्षी थे। अगर वह हिंदू थे तो उनकी आस्था उस गांधीवादी हिंदुत्व में थी जिसकी केंद्रीय शक्ति उदात्त, सर्वसमावेशी और सर्वकल्याणकारी है अपनी इसी उदात्त हिंदू मनीषा के बल पर वह उस हिंदुत्व के प्रतिपक्ष बने रहे जो व्यवहार में राजनीति से लेकर समाज-संस्कृति के हर स्तर पर या तो मानवीय विद्वेष को प्रश्रय दे रहा था या फिर अंधआस्थावादी जड़ता को। प्रभाष जी ने इस भ्रष्ट हिंदुत्व को लगातार अपनी कलम के निशाने पर रखा। प्रभाष जी अगर पत्रकार थे तो उनकी आस्था उन पत्रकारीय मूल्यों में अडिग रही, जिन्हें स्वस्थ और सरोकारी पत्रकारिता की नींव माना जाता है। तमाम तरह के विचलनों और दबावों के बावजूद वह अपने बूते आजीवन प्रयास करते रहे कि पत्रकारिता धंधा और दलाली का पर्याय न होने पाए। अपने अंतिम दिनों में वह पत्रकारिता में नव प्रविष्ट प्रवृत्ति, खबर की बिकवाली को लेकर बेहद क्षुब्ध थे और इसके विरुद्ध एक खासा अभियान चला रहे थे। इसी तरह, अगर वह राजनीतिक थे तो लोकतांत्रिक राजनीतिक के सैद्धांतिक विचलन, लोकतांत्रिक संस्थाओं की विफलता, राजनीतिक दलों की दिशाहीनता, राजनेताओं की भ्रष्ट अवसरवादिता, अंतिम व्यक्ति की बढ़-चढ़कर बात करते हुए भी समूचे लोकतंत्र को अंतिम व्यक्ति से छीनकर काली पूंजी की गोद में बिठाल देने की बेलगाम राजनीतिक कोशिशों जैसी प्रवृत्तियों के विपक्ष में पूरी शक्ति के साथ खड़े रहने की राजनीति की उन्होंने यानी प्रभाष जोशी एक आपाद प्रतिपक्ष। एक सरोकारी जनपक्षीय प्रतिपक्ष। सजग-सचेत लोगों के मन में सम्मान जगाने वाला प्रतिपक्ष।
 
किस खांचे में समायोजित करें उनके अवदान को?
 
एक लेखक-विचारक-पत्रकार के तौर पर प्रभाष जोशी की यह भूमिका, उनका अवदान निस्संदेह अप्रतिम और अविस्मरणीय है। लेकिन इससे आगे? प्रभाष जोशी के पत्रकारीय अवदान और उनकी अविस्मरणीयता का क्या करें? और क्या सचमुच इनका कुछ हो सकता है? क्या इन्हें वर्तमान के किसी खांचे में समायोजित किया जा सकता है? या सीधी बात यह कि क्या प्रभाष जोशी को आगे के किसी मूल्यचेता पत्रकारीय संघर्ष के लिए किसी अचूक औजार की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है? यानी क्या आज ईमानदारी से पत्रकारों का आह्वान किया जा सकता है कि वे प्रभाष जोशी जैसा बनकर दिखाएं और उनका अनुसरण करें? इन सवालों के जवाब प्रभाष जोशी की प्रासंगिकता का भी निर्धारण कर सकते हैं और हिंदी पत्रकारिता के भविष्य का भी। प्रभाष जोशी प्रखर बौद्धिक प्रतिभा, गांधीवादी विचार की उत्प्रेरणा और राष्ट्रवादी नैतिकता के समांतर विकसित ऐतिहासिक परिस्थितियों की निर्मिति थे। इस निर्मिति के लिए ऐतिहासिक तौर पर स्थान उपलब्ध था। जिस पत्रकारिता का अभ्युदय आजादी के संघर्ष और उससे संबंद्ध राजनीतिक-सामाजिक मू्ल्यों के बीच हुआ था और जिसे राष्ट्रवादी धनपतियों का प्रश्रय प्राप्त था, वह प्रभाष जोशी के काल तक लगातार क्षीण होते जाने पर भी स्वीकार्य और स्वागतेय बनी हुई थी। उसने प्रभाष जोशी को अपना सरोकारी प्रतिपक्ष रचने का भरपूर अवसर दिया। प्रभाष जोशी ने अखबार में लिखा तो अखबार का पाठक उनका बना, टेलीविजन पर वक्तव्य दिया तो दर्शक उनका बना और जब कभी सभा में श्रोताओं को संबोधित किया तो श्रोता उनका बना। इस पाठक दर्शक-श्रोता ने उनकी अपनी एक जनसत्ता स्थापित कर दी थी और साथ ही उनका एक ब्रांड बाजार मूल्य भी तैयार कर दिया था, जिसके सहारे वह अपने प्रतिपक्ष का प्रभावी निर्वाह कर सके। लेकिन उनकी प्रतिपक्षी की भूमिका की परिणति क्या हुई?
 
बस औपचारिक स्मरण
 
प्रभाष जी निज की पत्रकारीय सत्ता के बूते या बावजूद न तो उस विपथगामी हिंदुत्व के प्रभाव में कोई बाधा खड़ी कर पाए जिसका उन्होंने भरपूर विरोध किया, न उस लंपट राजनीति की देह पर एक खरोंच बना पाए जिस पर वह आजीवन तीखे प्रहार करते रहे और न उस बिकाऊ पत्रकारिता की बिकवाली रोक सके, जिसके विरुद्ध अपने अंतिम दिनों में उन्होंने अभियान ही चला रखा था। कथित उदार अर्थतांत्रिक लोकतंत्र ने ऐतिहासिक तौर पर पत्रकारिता की मुख्यधारा में प्रभाष जी जैसे पत्रकारों की भूमिका निषिद्ध कर दी है। मुख्यधारा की पुंश्चली पूंजी नियंत्रित पत्रकारिता और उसके अलमबरदार पत्रकार इस पूंजी और राजनीतिकारों के बीच सुदृढ़ सेतु का काम तो कर सकते हैं लेकिन प्रभाष जोशी की तरह चिंतातुर प्रतिपक्ष नहीं रच सकते। अगर कोई सिराफिरा ऐसी हिमाकत करने का दुस्साहस करता भी है तो उसे कान पकड़कर बाहर कर दिया जाएगा। वह एकाकी पल्राप तो करते रह सकता है लेकिन प्रभाष जी की तरह अपनी पाठकीय सत्ता स्थापित नहीं कर सकता यानी कोई प्रभावी प्रतिरोध पैदा नहीं कर सकता। समय की बेहूदगी से मुठभेड़ करने के लिए प्रभाष जोशी जैसे पत्रकारों को होना चाहिए, यह उनकी छायावादी प्रासंगिकता है। समय की बेहूदगी इतनी व्यापक और सर्वग्रासी है कि कोई अगला प्रभाष जोशी पैदा नहीं हो सकता, यह उनकी यथार्थवादी अप्रासंगिकता है। वर्तमान में हम उनका केवल औपचारिक स्मरण भर करते रह सकते हैं, इससे अधिक कुछ नहीं।
 
पत्रकार या लेखक के तौर पर एक व्यक्ति सबल प्रतिपक्ष तभी बनता है, जब उसके पास अपने समय को परखने के अपने निज के सैद्धांतिक मापदंड हों और उसके अंदर इतना साहस हो कि ऐसी परख करते हुए और उसको अभिव्यक्ति देते हुए अपनी कलम को सधा हुआ रख सके। प्रभाष जी के पास दोनों ही थे- मापदंड भी और साहस भी। साहस यानी बहुत कुछ खो देने की आशंकाओं के बीच अपने वैचारिक आग्रहों के साथ खड़े रहने की क्षमता और अपनी प्रखरता के बल पर सत्ता से बहुत कुछ पा लेने की असीम संभावनाओं के बीच स्वयं को लोभग्रस्त न होने देने की दृढ़ताsahara
 
     
 
    
   
 
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