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साफ़ हवा के लिए बने कानून नेहरू से कौन डरता है? चालीस साल पुराना मुकदमा ,और गवाह स्वर्गवासी चार दशक बाद समाजवादी चंचल फिर जेल में
सौ सालों का फासला है
एमजे अकबर 
न्यायपालिका किसी भी न्यायिक फैसले से ज्यादा अहम है। हरेक संस्था को उसके सभी सदस्यों के कुल जोड़ से बड़ा और ऊपर होना ही होता है। यह किसी भी संस्था के बारे में सच है, लेकिन लोकतंत्र के दो स्तंभों - संसद और न्यायपालिका के बारे में और भी ज्यादा सच है।
हम किसी भी कानून के निर्माण की वैधता पर इसलिए सवाल नहीं उठाते क्योंकि हम किसी सांसद से असहमत हैं या कुछ सांसदों का बर्ताव मर्यादापूर्ण नहीं रहा है। 2009 में न्यूक्लीयर विधेयक के पारित होने से हमारे कई देशवासी सहमत नहीं थे और तब इस मामले में रिश्वत के लेन-देन के प्रमाण बहुत नाटकीय ढंग से संसद की कार्यवाही के दौरान प्रस्तुत किए थे। 
इसका यह मतलब नहीं था कि नए कानून को खारिज कर दिया गया। सुन्नी वक्फ बोर्ड और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के वकीलों और नेताओं ने बार-बार जोर देकर यह बात कही है कि वे अदालतों के फैसलों को मानेंगे और उनका पालन करेंगे। 
यह विवेकपूर्ण भी था और स्वीकार्य भी। (हालांकि अयोध्या में एक मस्जिद पर लंबे समय से चले आ रहे विवाद के दौरान प्रतिक्रियाएं हमेशा विवेकपूर्ण रही हों, जरूरी नहीं।) जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगभग एक हफ्ते के लिए टाल दिया गया, तब मुस्लिमों में थोड़ी-सी व्यग्रता साफ देखी जा सकती थी, क्योंकि वे चाहते थे कि फैसला सुना दिया जाए। 
बिल्कुल संभव है कि फैसले के प्रति ऐसा उत्साह कहीं भीतर इस गहरे यकीन से फला-फूला हो कि फैसला मस्जिद के हक में होगा। मस्जिद के हक में चल रहे आंदोलन के वकीलों और प्रवक्ताओं ने खासा आत्मविश्वास प्रदर्शित भी किया था। 
हो सकता है वे भूल गए हों कि उनका पक्ष कितना भी मजबूत क्यों न हों, उसे खंडपीठ के सामने तथ्यों व तर्को से साबित करना पड़ता है और कानूनी टीम के भीतर थोड़ा भी आत्ससंतोष घातक कमजोरी हो सकता है। अगर कोई पार्टी प्रतिकूल फैसले की संभावना को सामने रखकर तैयारी कर रही थी, तो वह भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) थी। 
उसके नेता लालकृष्ण आडवाणी ने फैसले से पहले अपनी पार्टी से बार-बार कहा था कि किसी भी किस्म का अफसोस या पश्चाताप निजी मामला होना चाहिए और यह भी कि हिंसा नामंजूर होगी। विवाद में शामिल कोई भी पक्ष सिर्फ इस वजह से कि फैसला उसके खिलाफ चला गया, न्यायिक प्रक्रिया की वैधता से या फैसले की विश्वसनीयता से इनकार नहीं कर सकता। 
इसके उलटे नतीजे तो होंगे ही, यह खतरनाक भी होगा। इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला बहरहाल अर्ध-विराम है, पूर्ण विराम नहीं। पूर्ण विराम तब आएगा जब सुप्रीम कोर्ट इस पर फैसला सुनाएगा। मुस्लिम सर्वोच्च अदालत में अपील करेंगे, जिसका उन्हें पूरा हक भी है। 
यह बात भी भूलनी नहीं चाहिए कि 1993 में संसद ने साफ तौर पर अदालतों को पूजा स्थल को लेकर किसी भी विवाद पर सुनवाई से रोकने की व्यवस्था कर दी थी। अयोध्या इस किस्म का आखिरी मुकदमा है। बाबरी-अयोध्या विवाद के चार केंद्रीय पड़ाव माने जा सकते हैं। 
ये हैं - 1949 में ब्रितानी हुकूमत के तालों को खोलना और मूर्तियों की स्थापना, 1989 में मंदिर के लिए शिलान्यास, 1992 में बाबरी ध्वंस और अब 2010 में यह फैसला। इन चारों अहम पड़ावों के समय कांग्रेस सत्ता में रही है। वही कांग्रेस अब एक ‘सौहार्दपूर्ण’ समाधान की तलाश में है। 
यह खेल जितना पुराना है, उतना ही जाना-पहचाना है। विवाद को लेकर कांग्रेस की नीति एक ही धुरी पर घूमती रही है और वह है : मुस्लिम वोटों को गंवाए बगैर मंदिर का निर्माण कैसे किया जाए। भाजपा के पास खोने के लिए मुस्लिम वोट नहीं हैं, लेकिन ऐसी एक दबी-छिपी कोशिश का वह समर्थन करेगी, क्योंकि जाहिर तौर पर वह जितनी जल्दी हो सके मंदिर का निर्माण चाहती है।
अगर अयोध्या इस किस्म का आखिरी मुकदमा है, तो शायद हमें इसकी कानूनी प्रक्रिया को भी अंतिम परिणति तक पहुंचने देना चाहिए। हमने छह दशकों तक इंतजार किया है। फिर भला और दो या तीन साल इंतजार क्यों नहीं? अव्वल तो कोई भी ‘सौहादर्पूर्ण’ समाधान हरेक व्यक्ति व पक्ष के लिए पर्याप्त सौहार्दपूर्ण हो सकेगा, इसकी संभावना नहीं है।
इससे बढ़कर यह एक ऐसा ‘राजनीतिक’ समझौता हो सकता है, जिससे समुदायों के बीच रिश्ते बेहतर होने के बजाय तनावपूर्ण हो सकते हैं। अगर हम अपनी संस्थाओं पर भरोसा करते हैं, तो हमें उन पर पूरी तरह भरोसा करना ही चाहिए।
ऑस्कर वाइल्ड की एक बात को थोड़ा बदलकर कहें तो धार्मिक लबादे में छद्म-राजनीतिज्ञ प्रलोभन या लालच के अलावा हर चीज को ठुकराने में समर्थ जान पड़ते हैं। लिहाजा ताज्जुब नहीं कि मुस्लिम समुदाय के एक-दो आग उगलने वाले पेशेवरों ने मंच से उकसाने वाली लफ्फाजी में मुब्तिला होकर गैरजिम्मेदार होने की अपनी प्रतिष्ठा को कायम रखा। उन्होंने चौथाई सदी के अनुभव से कोई सबक नहीं सीखा कि उकसावे की क्या कीमत अदा करनी पड़ सकती है। वजह यह है कि यह कीमत खुद उन्हें कभी अदा नहीं करनी पड़ती।
कुछ अच्छी खबर भी है। जो सोचते हैं कि वे अब भी उन्माद का लाभ उठा सकते हैं, ऐसे लोग भारत में आए एक असाधारण परिवर्तन को देख नहीं पाते हैं। लोग, हिंदू भी और मुसलमान भी, सांप्रदायिक टकराव की नकारात्मक राजनीति से ऊपर उठ चुके हैं। वे विकास की सकारात्मक राजनीति चाहते हैं। 
आस्था और इबादत का हिंदुस्तानियों के लिए अब भी महत्व है और यह दिल्ली तक सीमित नितांत कुलीन धारणा है कि हमारे युवाओं ने धर्म से मुंह मोड़ लिया है। वास्तव में ऐसा नहीं है। लेकिन हां, अपने लक्ष्यों को हासिल करने के साधन के रूप में हिंसा को जरूर उन्होंने तिलांजलि दे दी है। 
गरीब-गुरबों ने एक सीधी-सादी, अहम और सबसे ताकतवर बात समझ ली है कि गरीबी सांप्रदायिक नहीं है। हमारे देश में पूजा या इबादत के स्थलों की कमी नहीं है। कमी है तो आत्मसम्मान की, क्योंकि हमारे देश का हरेक खाली पेट आइडिया ऑफ इंडिया के मुंह पर जोरदार तमाचा है। 1992 से 2010 के बीच सौ सालों का फासला है।
- लेखक द संडे गार्जियन के संपादक और इंडिया टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं।
 
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