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पत्थरों पर रोशनी ,धरोहर पर अँधेरा

 लखनऊ , अगस्त। मूर्तियों ,पार्कों और और स्मारकों पर अरबों रुपये खर्च करने वाली सरकार ऐतहासिक धरोहरों को भगवान् भरोसे छोड़े हुए है। आज लखनऊ से लेकर जिलो जिलों  में आजादी की सालगिरह की पूर्व संध्या पर  रोशनी की जा रही है पर आजादी की लडाई की बहुत सी धरोहर अँधेरे में डूबी हुई है  ।  पृथ्वीराज कपूर के मार्गनिदेशन आजमगढ़ में जो कला भवन बना उसको राहुल सांकृत्यायन  ने  तिब्बत से लाई  अपनी उन दुर्लभ ऐतिहसिक महत्तव की वस्तुओं को इस  भवन को देकर और समृद्ध कर दिया था ,उस कला भवन का ताला आज आजादी की सालगिरह की पूर्व संध्या पर टूटा मिला  । आस पास के भवनों पर आजादी की सालगिरह के मोके पर रोशनी की जा रही है और  यह भवन अँधेरे में डूबा है  । राहुल सांकृत्यायन तिब्बत से जो पत्थर लाए थे उनका एक बक्सा खाली हो चूका है और कुछ दुर्लभ पांडुलिपियाँ भी नदारत है   ।   पूरा प्रदेश इस समय पत्थरों की वजह से नई  पहचान बना रहा  और दूसरी ओर जिलों जिलों में मौजूद इतिहास के पन्ने बिखरते जा रहे है  । उदाहरण  है आजमगढ़ में साहित्य, संस्कृति और कला को संजोने वाले हरिऔध कला भवन  । यह भवन 1857 के कंपनी बाग जो आज कुंवर सिंह उद्यान के नाम से जाना जाता है उसके  परिसर  स्थापित है ।

इस कला भवन के वे दरवाजे आजादी की पूर्व संध्या पर खुले मिले जिन पर प्रशासन ने ताले लगवाए थे। इस संग्राहालय में जहां राहुल सांकृत्यायन ने अपनी दुर्लभ पांडुलिपियों और पुरातत्व की महत्व की वस्तुओं को दान किया था उसकी सुरक्षा के लिए कोई इन्तजाम नहीं है।        हरिऔध कला भवन के संरक्षण के लिए लंबे समय से लड़ रहे स्थानीय रंगकर्मी अभिषेक पंडित ने बताया कि कुछ महीने पहले यहां किताबों और पांडुलिपियों के चोरी हाने का मामला सामने आया था। जिस पर लंबे आदोलन के बाद प्रशासन ने सिर्फ ताला लगवाने का काम किया। प्रशासन ने इसके संरक्षण के लिए एक बैठक बुलाने का आश्वासन दिया था जो अब तक नहीं हुयी। यहां गौरतलब है कि इस कला भवन का निर्माण 1954 में जनता के पैसे से स्थानीय कलाकारों द्वारा करवाया गया था। जिसका पृथ्वीराज कपूर ने मार्गदशन किया था। दक्षिण एशिया का इतिहास और घुमक्कड़ शास्त्र के रचयिता राहुल सांकृत्यायन जो आजमगढ़ के ही रहने वाले थे ने  तिब्बत से लायी गयी अपनी उन दुर्लभ ऐतिहसिक महत्तव की वस्तुओं को इस कला भवन को देकर और समृद्ध कर दिया। आजादी की पूर्व संध्या पर इस खंडहर नुमा कला भवन पर बैठे रंगकर्मी राघवेंद्र मिश्रा, सुग्रिव विश्वकर्मा और बब्लू श्रीवास्तव ने कहा कि कला जो समाज में प्रतिरोध की भावना का विस्तार करती है उस चेतना को कुंद करने की यह कोशिश है। जिलाधिकारी कार्यालय से मात्र कुछ फर्लांग  की दूरी पर स्थित होने के बावजूद जिलाधिकारी इसका हाल जानने के लिए कभी नहीं आते जबकि जिलाधिकारी इस हरिऔध कला भवन के अध्यक्ष हैं। कल स्वतंत्रता दिवस है पर यहां कोई सफाई नहीं की गयी है। आज हम लोग यहां की खुद सफाई कर रहे हैं। 
     पीयूसीएल के राजीव यादव और तारिक शफीक ने कहा कि जिले में कला, साहित्य और संस्कृति के लिए हरिऔध कला भवन की एक मात्र संस्थान हैं। पर इसको जिस तरह उपेक्षित किया जा रहा है वह हमारी सरकारों की मनोस्थिति को भी बताता है कि वे कला, साहित्य और संस्कृति से कितना डरती है। कई दशक से इस हरिऔध कला भवन संस्था का नवीनीकरण नहीं हुआ जिसका पदेन अध्यक्ष जिलाधिकारी है। यह तथ्य इस बात को दर्शाती है कि हमारी केंद्र और राज्य सरकारों के पास कला, साहित्य और संस्कृति को लेकर जिले स्तर पर कोई नीति नहीं हैं। कभी इस कला भवन में कैफी आजमी, बादल सरकार और अशोक भौमिक जैसे नामी लोगों के बैठके यहां हुआ करती थीं। इस कला भवन का कुछ हिस्सा डह गया है। जहां एक तरफ रवींद्र नाथ टैगोर की डेढ़ सौवीं वर्षगांठ मनायी जा रही है वहीं इस कला भवन के ओपेन थिएटर में रवींद्र नाथ टैगोर सहित अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध जैसी हस्तियों के आदम कद तैल चित्र के चीथड़े दीवारों पर टंगे हैं तो वहीं महात्मा गांधी और अशोक की लाट धूल फांक रही हैं। कला भवन के पुस्तकालय के आलमारियों के शीशे टूटे हुए हैं जिनमें अब भी बहुमूल्य किताबें हैं जो अपने चोरी होनी की बाट जोह रही हैं। अब यह कला भवन कुछ युवा रंगकर्मियों के भरोसे है जो इसे फिर से कला, साहित्य और संस्कृति के केंद्र के रुप में स्थापित करने में लगे हैं। 
 जनसत्ता में अंबरीश कुमार की रपट 
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