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शर्मनाक है नामवर सिंह की खामोशी

 अशोक वाजपेयी

यह दुखद और किसी हद तक शर्मनाक है कि नामवर सिंह जैसे ‘भद्र’ और वरिष्ठ आलोचक ने अभी तक इस मसले पर न तो कुछ कहा है, न ही कुलाधिपति पद से इस्तीफा दिया है।उन्होंने कुलाधिपति की हैसियत में कुलपति से कोई जवाब तलब तक नहीं किया है, जबकि केंद्रीय मंत्री ने इस मामले में हस्तक्षेप किया है। 
 
अज्ञेय, शमशेर, नागार्जुन, फैज जैसे मूर्धन्यों की जन्म-शतियों का वर्ष चल रहा है, जिसमें एक बार फिर अपने समाज और भाषा में साहित्य की जगह और भूमिका पर अनेक स्तरों पर व्यापक पुनर्विचार की शुरुआत हो चुकी है। बहुत दिनों से साहित्य में प्रतिमानों की बात नहीं उठ रही है। स्वयं ये महान पूर्वज प्रतिमानों की तरह देखे जा रहे हैं। पर इसी के समांतर साहित्य-विमर्श, हिंदी की साहित्य-संस्कृति और शिष्टता के सभी प्रतिमानों को लतियाता-रौंदता छिछोरेपन का एक दौर भी चल निकला है। साहित्य साहस और कई बार दुस्साहस के बिना, बेबाकी और सच बोलने के जोखिम के बिना संभव नहीं होता : कम से कम वह साहित्य जो स्मरणीय होता है। ऊपर बताये सभी साहित्यकार ऐसे साहस और दुस्साहस के प्रतिमान रहे हैं।
हिंदी लेखिकाओं को ‘छिनाल’ कहना, ‘कितनी नावों में कितनी बार’ (अज्ञेय का ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त कविता संग्रह) के वजन पर ‘कितने बिस्तरों पर कितनी बार’ जैसी उक्ति कर उनके बीच छिनालपन की होड़ का आरोप लगाना और ऐसे इंटरव्यू को छापते हुए ‘नया ज्ञानोदय’ के संपादक का उसे प्रकाशित सामग्री में सबसे बेबाक कहना किसी भी प्रतिमान से आलोचना नहीं, गाली देना ही कहा जा सकता है। सरकार के दबाव में विभूति नारायण राय ने माफी मांगकर अपनी नौकरी तो बचा ली, लेकिन उनकी इज्जत घूरे पर पड़ी है। उन्हें लेखकीय स्वतंत्रता का अधिकार है, लेकिन अगर वे मानते हैं कि उसका ऐसा अतर्कित दुरुपयोग कर वे निष्कलंक निकल जाएंगे तो इसे मूर्ख विश्वास ही कहा जा सकता है। ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करना सिर्फ स्त्रियों का नहीं, समूचे साहित्य-जगत का अपमान करने के बराबर है। यह थोड़े खेद की बात है कि इस छिछोरी हरकत का विरोध लेखिकाओं ने पहले पहल किया और लेखक बाद में उसमें जुड़े।
निजी प्रसंग को इस बीच में लाने के लिए क्षमा चाहते हुए यह बताना चाहूंगा कि इसी हिंदी विश्वविद्यालय का संस्थापक-कुलपति रहते हुए मैंने गुजरात के नरसंहार के विरोध में लेखकों-कलाकारों को एकत्र किया था, सार्वजनिक वक्तव्य दिये थे और राष्ट्रपति को ज्ञापन आदि सौंपे थे। इसी मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा सफाई मांगने पर मैंने लेखक के रूप में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार पर इसरार किया था और एक मुंह-तोड़ जवाब मंत्रालय को दिया था। जाहिर है कि ऐसे अधिकार का उपयोग किसी व्यापक सामाजिक मुद्दे पर करें तो उसका औचित्य बनता है। पर अगर आप ऐसे पद पर रहते हुए अपनी निजी साहित्यिक भड़ास निकालने या अपनी कोई कल्पित वीरगाथा लिखने के लिए करते हैं तो यह अनैतिक है। ऐसा आपने भाषा के नाम पर बने एक विश्वविद्यालय के कुलपति के पद पर रहते हुए किया है तो आप कानूनन भले उस पद पर बने रहें : उस पर रहने का नैतिक अधिकार आप खो चुके हैं।
यह दुखद और किसी हद तक शर्मनाक है कि नामवर सिंह जैसे ‘भद्र’ और वरिष्ठ आलोचक ने अभी तक इस मसले पर न तो कुछ कहा है, न ही कुलाधिपति पद से इस्तीफा दिया है। उन्होंने कुलाधिपति की हैसियत में कुलपति से कोई जवाब तलब तक नहीं किया है, जबकि केंद्रीय मंत्री ने इस मामले में हस्तक्षेप किया है। अगर नामवर जी ने किया है, तो उसे सार्वजनिक करना चाहिए।
भारतीय ज्ञानपीठ अपने निदेशक-संपादक के साथ क्या करे, यह उसके अधिकार का मामला है। पर उसके द्वारा प्रकाशित उन सभी लेखकों को, जिन्हें लेखकों के अपमान और इस बढ़ते छिछोरेपन की चिंता है, ज्ञानपीठ से अपनी पुस्तकें वापस ले लेनी चाहिए। इसी तरह हिंदी के सभी ऐसे लेखकों और बुद्धिजीवियों को हिंदी विश्वविद्यालय से तत्काल अपना संबंध तोड़ लेना चाहिए। हिंदी की दो शीर्ष संस्थाओं को ऐसी छिछोरी हरकतों द्वारा पददलित किये जाने पर अगर हम चुप बैठते हैं तो यही साबित होगा कि अपनी भाषा और साहित्य के अपमान और अवमूल्यन की हमें कोई परवाह नहीं है। (जनसत्ता से  )
 
 
         
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