हृदयनारायण दीक्षित
मनुष्य आदिम काल से आनंद का प्यासा है। प्रकृति आनंद से भरी-पूरी है। प्रकृति सुन्दर है, यहां रूप हैं, गुण हैं, गंध है, रंग हैं, स्वर हैं, रस हैं। समूचा जगत सौन्दर्य से भरा पूरा है। प्रकृति की हरेक गतिविधि नियमबद्ध है। सृष्टि कर्म भी लयबद्ध है, राग निबद्ध है। देवशक्तियां भी इस नियम के भीतर गति करती हैं। ऋग्वैदिक ऋषियों ने प्रकृति के इस संविधान को ऋत कहा। ग्रीष्म, वर्षा, शिशिर, हेमंत, पतझड़ और बसंत इसी ऋत के ऋतु-रूप हैं। लेकिन बसंत परिपूर्ण प्राकृतिक तरूणाई है। बसंत ऋतुओं के राजा हैं। अल्हड़ मस्त प्रकृति उनके स्वागत में अपना घूंघट उतार देती है। प्रकृति के रूप यौवन की चरम मस्ती ही होली है। होली बसंतोत्सवो का चरम है। होली जम्बूद्वीप भरतखण्ड का मस्त मस्त उल्लास है। माथे पर चंदन रंगे गाल में गुलाल रोली, गीत, नृत्य में झूमती भारतीय जनगण की टोली, हंसी और ठिठोली का साझा नाम है होली। तब काम और राम एक रस हो जाते हैं। राधा और कान्हा का रास, गरीब और अमीर की गलमिलौवल। माता धरती और आकाश पिता प्रीतियुति करते हैं। वाक्देवी के सातों सुर सरगम हो जाते हैं। रूप अरूप मिल जाते हैं। सात रंगों से सराबोर होली राष्ट्रीय आनंद है। वात्स्यायन के कामसूत्र (1.4.42) में यह एक बसंतोल्लास क्रीड़ा पर्व है। तब दीदी तेरा देवर दीवाना नहीं रहता, बूढ़े बाबा भी देवर हो जाते हैं।
होली सम्पूर्ण भारतीय जन का उल्लास है। कुछ विद्वानों ने इसे मिस्र या यूनान से आयातित बताया है। होली जैसा उत्सव बेशक मिस्र में था, यूनान में भी था, होना भी चाहिए। ऐसे क्षेत्रों से भारत के व्यापारिक सम्बंध थे। सत्यकेतु विद्यालंकार ने ‘वैदिक युग’ (पृष्ठ 232) में बताया कि वर्तमान ईराक और तुर्की राज्य क्षेत्रों से प्राप्त भग्नावशेषों व प्राचीन सभ्यताओं से ज्ञात होता है कि उनका भारत के साथ घनिष्ठ व्यापारिक सम्बंध था। ऋग्वेद (1.25.4) में पक्षियों के उड़ने वाले आकाश मार्ग और समुद्री नौका मार्ग के उल्लेख हैं। जैमिनि ने होलाका पर्व का उल्लेख (400-200 ईसा पूर्व) किया और लिखा कि होलाका सभी आर्यों का उत्सव था। आचार्य हेमाद्रि (1260-70 ई0) ने पुराण उद्धरणों से होली की प्राचीनता दर्शाई है। हजारों बरस पुरानी होली की परम्परा उत्सवधर्मा भरतभूमि में उगी। मिस्र और यूनान ने भी इसकी नकल की। भारतीय दर्शन के लेखे कला गीत, संगीत व उत्सवों का जन्म आनंद की प्यास से हुआ। आनंद का स्रोत प्रकृति है। सौन्दर्य बोध आनंद देता है। आनंद ऊर्जा उफनाती है। आनंद रस छलकता है, एक से दूसरे को सराबोर करता है तो प्रकृति के सभी अणु-परमाणु पिचकारी बन जाते हैं। रंग तरंग बन जाते हैं।
प्रकृति संवेदन जगाती है। चार्ल्स डारविन ने ‘दि ओरिजिन आफ दि स्पेसिस एण्ड द रिसेंटमेंट’ में बताया, “प्राणियों को भावोत्तेजन में आनन्द आता है।” आनंद का केन्द्र मनुष्य के भीतर है, भावोत्तेजन के उपकरण प्रकृति में हैं। पृथ्वी सगंधा है, वायु गंध बांटती है। मनुष्य में मदन गंध है, पुष्पों मेें सुगंध हैं। सूर्य तेजस् है, ऊषा में सौन्दर्य है। चांद सुंदर है, अमावस्या चांद का अभाव है लेकिन तारों से भरा आकाश आनंद मगन करता है। पूर्णिमा परिपूर्ण धवल चांदनी है। मनुष्य क्या पशु, पक्षी भी प्रकृति से संवेदित होते हैं। होली में तो पूरी प्रकृति नृत्य मगन होती है। महाप्राण निराला ने इसका शब्द चित्र बनाया “वर्ण गंध धर/मधुमरन्द भर/तरू-उर की अरूणिमा तरूणतर/खुली रूप-कलियों में पर भर/स्तर-स्तर सपुरिसरा/रंग गई पग-पग धन्य धरा।” निराला के पहले कवि तुलसी के बसंत चित्रण में “सृष्टि को ब्रह्ममय देखने वाले योगी भी कण कण में स्त्री देखने लगे।” प्रकृति संवेदन जगाती है तो योग धरा रह जाता है। मुर्दे भी उठ पड़ते हैं। तुलसी लिखते हैं “सीतल जागे मनोभव मुएंहु मन वन सुभगता न परे कही/सुगंध सुमन्द मारूत मदन अनल सखा सही/विकसे सरन्हि बहु कंज गुंजत पंुंज मंजुल मधुकदा/कलहंस पिक सुक सरस रव करि गान नाचहिं अपसरा।” कालिदास संवेदनरस से सराबोर रसिक थे। वे बसंत और आम्रगंध में बौरा गये। उन्होंने कुमारसम्भव में बताया “पवन स्वभाव से ही आग भड़काऊ है, बसंत कामदेव के साथ आया। उसने नयी कोपलों के पंख लगाकर आम्र मंजरियों के वाण तैयार किये। आम्र मंजरिया खाने से नर कोकिल का सुर मीठा हुआ। उसकी कूक पर रूठी हुई स्त्रियां रूठना भूल जातीं।”
वैदिक ऋषियों का सौन्दर्यबोध अप्रतिम है। यह सौन्दर्य बोध हजारों बरस प्राचीन राष्ट्र के सामाजिक सांस्कृतिक विकास का परिणाम है। होली इसी सौन्दर्य बोधल की अभिव्यक्ति है। यही सौन्दर्य बोध होली में सतरंगी इन्द्रधनुष और सातों सुर का संगीत बन कर उभरा है। इसके उत्स पूर्व वैदिक काल में है, उत्सव ऋग्वेद में हैं। ऋग्वैदिक पूर्वज सृजनशील है। सृजनशीलता का प्रकटीकरण ही वैदिक ऋचांए/कविताएं हैं। लेकिन पूरा आनंद काव्य में भी प्रकट नहीं हो पाया इसीलिए ऋक् के साथ सामगान है। गीत के साथ संगीत भी है। लेकिन भाषा और संगीत की भी सीमा है सो नृत्य हैं। रूप, रस, गंध, स्पर्श की अनुभूति से आनंद रस का अतिरेक छलकता है। ऋषि अपने खेल में देवताओं को भी साझीदार बनाते है, वे मरूतों को उत्सव ‘क्रीडन्ति’ बताते हैं। सोम को घोड़े के समान खेलने वाला बताते हैं। लेकिन सूर्य और अग्नि बड़े देवता है। सूर्य ऋतुएं विभाजित करता है, अग्नि ऋतु निर्माणकर्त्ता है। वे अग्नि से कहते (ऋ0 5.19.5) है कि वह खेलता हुआ हमारी ओर आये। अग्नि स्वयं देवता है पर बाकी देवताओं तक हवन में डाला गया हविष्य पहुंचाते हैं। सो पूर्वजों ने होली को अग्नि प्रधान बनाया और जौ-गेहू की बालियां अग्नि देव को ही सौंपी, प्रसाद रूप में स्वयं भी ग्रहण की। पूर्वजों ने होली उत्सव को सतरंगी बनाया। उन्होंने सप्त रंगों के साथ होली में सप्त वाणी सुर भी जोड़े। यहां पूर्णिमा का चांद है, रंग सुर छंद और ताल लयसंगीतं, नृत्य और थिरकन हैं ही। पृथ्वी सगंधा है, यहां सुगंध भी जोड़ी गयी। होली परिपूर्ण उन्मुक्तता है। जाति वर्ण की भरी पूरी घुलनशीलता है। परिपूर्ण राष्ट्रीय एकात्मकता है।
भविष्य पुराण के अनुसार कृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया कि राजा रघु के पास ढोण्ढा नामक राक्षसी की शिकायत हुई, यह बच्चों को तंग करती थी। उसे शिव का वरदान था, शिव वरदान के अनुसार उसे क्रीड़ायुक्त बच्चों से डरना चाहिए। ज्योतिषी ने बताया कि फाल्गुन पूर्णिमा को लोग-बच्चे हंसे, ताली बजाएं तीन बार अग्नि के चक्कर लगाएं, पूजा करें। अश्लील गीत गाये। ऐसा ही किया गया, वह मर गयी। प्रहलाद की कथा दूसरी है। हिन्दुस्थान के उत्तर पूर्व में दैत्यों दानवों का क्षेत्र पूर्व ईरान, एशियाई, रूस का दक्षिणी पश्चिमी हिस्सा और गिलगिट तब इलावर्त था। बेबीलोनिया की प्राचीन गुफाओं के भित्ति चित्रों में विष्णु हिरण्याक्ष से युद्धरत हैं। हिरण्याक्ष हिरण्या कश्यप का भाई था। प्रहलाद हिरण्याकश्यप का पुत्र था। वह पिता की दैत्य परम्परा का विरोधी था। उसे आग में झोंका गया, वह बच गया। प्रहलाद भारतीय सत्याग्रही चेतना का प्रतिनिधि था। लोकमन आनंद मगन होकर कथा गढ़ता है, लेकिन कथाओं के सांस्कृतिक स्रोत सत्य होते हैं।
होली भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रभाव की उल्लासधर्मा अभिव्यक्ति है। सम्प्रति सांस्कृतिक राष्ट्रभाव पर अंतरराष्ट्रीय बाजार भाव का हमला है। संस्कृति उत्सवों की प्रेरक नहीं रही। बाजार अपने उत्सव गढ़ता है। फादर्स डे, मदर्स डे और प्रेमिका डे - वेलेन्टाइन डे हैं। होली भी अब महज ‘हाली डे’ है। बाजार त्योहारी छूट लाता है, इलेक्ट्रानिक मीडिया बाजार प्रायोजित होली प्रोग्राम देता है। गोरी का यार माल उड़ाता है, बलम तरसें तो तरसें लेकिन बीते कई बरस से सामान्य घर परिवारों में रंग नहीं बरसे। पहले गलमिलौवल थी, मन में रंग थे, पिचकारी में भी रंग थे। गाल अब गुलाल से लाल नहीं होते, गाल लाल करने की महंगी दुकानें हैं। होली पूरे बरस भर की ऊर्जा देती थी। परिपूर्ण भौतिक उत्सव थी, परिपूर्ण आध्यात्मिक आराधना भी थी। यहां प्रेम था, तो भक्ति भी थी, गीत, नृत्य थे तो पूजा भी थी। यह सारा मानसिक कलुष बाहर फेंक देने की उन्मुक्त मुहूर्त थी, होली संपूर्ण मानव समाज को अंगांगी भाव से अंगीकृत करने का नेह निमंत्रण है। एक मुट्ठी गुलाल आपके गाल।