श्रवण गर्ग
फिल्म का नाम ‘माय नेम इज खान’ नहीं बल्कि ‘माय नेम इज मुंबई’ है। करोड़ों रुपए की लागत से सैकड़ों की संख्या में हर साल बॉलीवुड में बनने वाली फिल्मों में अधिकांश बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप होती रहती हैं पर लो बजट में भी अपनी जिंदगी को फाइव स्टार बनाकर लोकल व बसों में सफर करने वाला मुंबईकर अपने महानगर को कभी फ्लॉप नहीं होने देता। फिर चाहे आफत किसी भी तरह की क्यों न आन पड़ी हो।
जब वह हंसता है तो अपने दांत नहीं दिखाता और रोता है तो आंसुओं को गालों तक नहीं पहुंचने देता। श्रंखलाबद्ध बम विस्फोट हो गए, महानगर गले-गले तक पानी में डूब गया, छब्बीस-ग्यारह भी हो गया पर हर मुसीबत के बाद मुंबईकर ऐसे खड़ा होता गया जैसे कि महानगर की खुशनुमा सुबहों में काली रातों के लिए कभी कोई गुंजाइश ही नहीं रही हो।
यह मानना मुंबईकर की ताकत और उसकी अदा को कम करके आंकने की हिमाकत कहा जाएगा कि उसने किसी शाहरुख खान या करण जौहर का साथ दिया है या कि किसी फिल्म विशेष को देखने के नशे के चलते ‘मातो श्री’ से पंगा लिया है। मुंबई को इस बार फैसला किसी फिल्म को लेकर नहीं करना था। उसे वास्तव में तो तय यह करना था कि महानगर के नागरिकों को अपने फैसले लेने का अधिकार हासिल है भी या नहीं!
कहना होगा कि शुक्रवार सुबह जब अपने-अपने घरों से बाहर निकलकर नागरिकों ने सिनेमाघरों की टिकट खिड़कियों पर अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया तो लाठियों और झंडों के सहारे अरब सागर में उठे जन-तूफान को आतंकित करने वालों को अपने हाथ पीछे खींचने पड़े। मुंबई के नागरिकों ने जवाब दे दिया कि महानगर और महाराष्ट्र पर सभी का उतना ही अधिकार है जितना कि लाखों-करोड़ों उन मराठियों का जो देश के विभिन्न प्रांतों और शहरों में शान के साथ रह रहे हैं। देश चाहे तो शाहरुख खान की इतनी हिम्मत की तो दाद दे ही सकता है कि अनचाहे तौर पर ही सही आईपीएल की टीमों में पाकिस्तानी खिलाड़ियों को भी शामिल करने को लेकर दिए अपने वक्तव्य पर वे मुंबई के नागरिकों की ओर सेफैसला आने तक कायम रहे और इस तरह उन्होंने समूचे बॉलीवुड को भी आगे की लड़ाइयों से निपटने के लिए एक कर दिया।
वैसे यह मानना जल्दबाजी करना होगा कि मुंबई का सबक उन सभी ताकतों ने ठीक से समझ लिया है जो भाषा और संप्रदायों के आधार पर देश को जमातों में बांटकर आए दिन फतवे और फरमान जारी करती रहती हैं। लड़ाई अभी लंबी चलने वाली है क्योंकि पूरे घटनाक्रम के दौरान सिद्ध यह भी हुआ है कि सत्ता की राजनीति करने वालों के बजाय फिल्मों में एक्टिंग करने वालों की बहादुरी पर ज्यादा यकीन किया जा सकता है। पर साथ ही देखना जरूरी रहेगा कि जो लड़ाई अब आगे चलने वाली है उसमें शाहरुख खान कहीं पीछे तो नहीं छूट रहे हैं।