आलोक तोमर
नई दिल्ली, फरवरी- राजेंद्र कुमार पचौरी जिन्हें अभी हाल तक दुनिया में पर्यावरण का मसीहा माना जाता था और उनकी अध्यक्षता वाली संस्था संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय मौसम परिवर्तन पैनल- आईपीसीसी को पाकिस्तान के भूतपूर्व राष्ट्रपति अल गोर के साथ नोबेल पुरस्कार भी मिल चुका है, दरअसल अब खलनायक बन कर उभरे हैं।
पहले तो कोपेनहेगन में ग्लेशियर पिघलने की उनकी रिपोर्ट को पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों ने खारिज कर दिया। पचौरी ने माना कि गलती हुई है लेकिन माफी नहीं मांगी। बगैर कॉपीराइट के एक वैज्ञानिक का लेख भी इस रिपोर्ट में शामिल करने का अपराध उन्होंने किया और इस पर भी वे शर्मिंदा नहीं है।
मगर आर के पचौरी की धांधली यहीं तक सिमित नहीं है। अब उनके बारे में जो प्रमाण सामने आते जा रहे हैं वे उन्हें जेल भी पहुंचा सकते हैं। प्रमाण मिले हैं कि संयुक्त राष्ट्र के पैसे से पूरी दुनिया घूमने वाले पचौरी एक एनजीओ के जरिए अपना निजी कारोबार चलाते रहे हैं और जिन कंपनियों के लिए मोटी रकम ले कर सलाहकार बने है उनमें टाटा भी है, टयोटा भी है और कम से कम पंद्रह बहु राष्ट्रीय संस्थाएं हैं जिन्होंने पचौरी के एनजीओ में करोड़ो डॉलर लगाए है। पचौरी भारत सरकार के नेशनल एनर्जी एंड रिसोर्स इंस्टीटयूट- टैरी के महानिदेशक भी है। इसका पूरा खर्चा करोड़ों रुपए में भारत सरकार ही चुकाती है।
वॉशिंगटन पोस्ट ने पचौरी से सबूतों के साथ ईस्ट एंजेलिया क्लाइमेटिक रिसर्च यूनिट के दस्तावेजों के सहारे दर्जनों सवाल पूछे हैं और पचौरी ने एक का भी जवाब देने की हिम्मत नहीं जुटाई है। उनका कहना है कि ये आरोप अनपढ़ लोगों के हैं मगर अखबार पर इतना गंभीर आरोप लगने के बाद भी मान हानि का मुकदमा करने के लिए वे राजी नहीं है। टैरी के खाते सार्वजनिक नहीं किए जाते मगर सिर्फ डच बैंक से उन्हें 85 लाख रुपए और टयोटा मोटर्स से चार करोड़ अस्सी लाख रुपए एक साल में मिले हैं।
पचौरी ने कहा है कि टाटा उद्योग समूह से सीधे उनका कोई संबंध नहीं है। सच यह है कि टैरी की स्थापना टाटा एनर्जी रिसर्च इंस्टीटयूट के तौर पर स्थापना 1974 में हुई थी और पूरा पैसा टाटा ने लगाया था। टैरी की वेबसाइट ही देख लीजिए तो वहां टाटा समूह की कंपनियों के नाम टैरी को मोटा चंदा देने वालों में दर्ज है। रतन टाटा और डॉक्टर पचौरी उस विशेषज्ञ दल के सदस्य हैं जो प्रधानमंत्री को पर्यावरण संबंधी सलाह देता है।
पचौरी को भारत सरकार उनकी अंट शंट सलाहों के लिए कितना भुगतान करती है यह सूचना के अधिकार के तहत भी नहीं बताया जा रहा। दिल्ली में पचौरी को सरकार के खर्चे पर शानदार ऑफिस और बंगला मिला हुआ है और वे बीच बीच में ऐसी ऐस वैज्ञानिक कहानियां गढ़ते रहते हैं जिनसे पैसा आता रहता है। कभी वे जमीन का तापमान बढ़ा देते हैं और कभी कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा बढ़ा देते हैं। उनके आंकड़े दुनिया के किसी दूसरी वैज्ञानिक शोध से मेल नहीं खाते।