ताजा खबर
लाल क्रान्ति का काला चेहरा कहां नेहरू कहां मनमोहन कैसे बन रही है मुंडा सरकार लालू -पासवान के खिलाफ मुलायम
पाक के हौंसले पस्त पड़े ?

 शेखर गुप्ता

पिछले महीने इंटेलीजेंस ब्यूरो की कॉन्फ्रेंस में एक अधिकारी ने पूछा था कि क्या कारण है कि 26/11 के हमले के बाद हम आतंकवादी हमलों को रोक पाने में सक्षम रहे हैं? इसका जवाब गृहमंत्री पी चिदंबरम ने कुछ खेल का पासा पलटने के अंदाज में दिया। उन्होंने बड़ी ईमानदारी से कहा, ‘संयोग, विशुद्ध संयोग।’ वे बोले कि हमें हर दिन सौभाग्यशाली होना पड़ा, जबकि आतंकवादियों को सिर्फ एक दिन।
उन्होंने आगे जोड़ा कि बेशक सरकार एक दर्जन से अधिक हमलों को रोक पाने में सक्षम रही है। जैसा कि आप उम्मीद कर सकते हैं, उन्होंने इस बारे में कोई विस्तृत जानकारी नहीं दी। जो भी है, क्या सचमुच काफी लंबा अंतराल हो गया है? विशुद्ध किस्मत और संयोग की बात हो सकती है या संभव है तैयारी और तत्परता इसके लिए जिम्मेदार हों? सुरक्षा संबंधी व राजनीतिक प्रतिष्ठानों में एक गूढ़ और उलझा हुआ सा रवैया साफ नजर आ रहा है, अत: अब इन सवालों को उठाना और इन पर बहस शुरू करना बहुत जरूरी है। राजनीतिक प्रतिष्ठानों में आत्मसंतोष और ‘अनिवार्य’ हमले की आशंकाओं की अजीब मिली-जुली खिचड़ी है।
आप एक ऐसे शत्रु के साथ व्यवहार कर रहे हैं, जो ‘रणनीतिक धर्य’ के साथ काम करने में सिद्धहस्त हो चुका है। ‘रणनीतिक धर्य’ का अर्थ है कि जो अपने शिकार पर हमला करने से पहले बहुत लंबे समय तक निशाना साधकर प्रतीक्षा करता रह सकता है। तो जब आप ऐसे शत्रु से व्यवहार कर रहे हों तो तात्कालिक शांति की स्थिति में भी इस संबंध में बहुत कठोरता से विचार करने की जरूरत है।
किस्मत और बेहतरीन तैयारी से जरूर फर्क पड़ा। पर सवाल यह पूछा जाना चाहिए कि क्या यह चुप्पी और सन्नाटा पाकिस्तानियों की वजह से है? क्या इसलिए कि उनकी सेना आईएसआई प्रतिष्ठान को इतनी जल्दी अगला हमला करना खतरनाक लग रहा है और इसलिए उन्होंने अपना शिकंजा ढीला कर दिया है? बहुत सारे तर्क हैं और इस विचार के पक्ष में कुछ प्रमाण भी हैं। सबसे पहली बात यह है कि अमेरिका और पूरे वैश्विक समुदाय की तरफ से बहुत ज्यादा और गहरा दबाव है।
कसाब को बंदी बनाने और अब हेडली मामले के खुलासे के बाद अब पाकिस्तान के लिए इंतजार करने की कोई गुंजाइश नहीं रह गई है। ऐसे माहौल में कोई भी इसके ‘मूल कारणों’ या ‘गैर सरकारी किरदारों पर नियंत्रण नहीं होने की थ्योरी को स्वीकार नहीं करता।’ अगर पिछले एक साल में हुए बदलावों और खुलासों से कोई बात सामने आई है तो वह ये कि भारत को निशाना बनाने वाले समूह उन समूहों से बुनियादी रूप से अलग हैं, जो अफगानिस्तान में अमेरिकियों से या अपने ही कबायली इलाकों में पाकिस्तानियों से लड़ रहे हैं। भारत को निशाना बनाने वालों का पूरा नेटवर्क पूरी तरह से पाकिस्तान के मुख्य इलाके, अधिकांशत: पंजाब में स्थित है और यही कारण है कि पाकिस्तानी प्रतिष्ठान यदि उन्हें हमेशा नियंत्रित नहीं भी करते, तो भी उनके साथ उनका ज्यादा गहरा ताल्लुक है, बनिस्बत उन समूहों के, जो सुदूर पश्चिम में सक्रिय हैं।
तात्पर्य यह है कि अगर पाकिस्तान भारत विरोधी जेहादियों को पूर्णत: नियंत्रित नहीं भी करता तो भी उसके पास इतनी क्षमता है कि वह उन्हें नियंत्रित कर सके। वस्तुत: जैसा कि पुलित्जर विजेता वॉशिंगटन पोस्ट के पूर्व प्रबंध संपादक और अफगानिस्तान-पाकिस्तान पर कुछ अद्भुत किताबें जैसे द घोस्ट वॉर्स एंड द बिन लादेन फैमिली लिखने वाले स्टीव कॉल ने एनडीटीवी के शो वॉक द टॉक में मुझसे कहा कि अगर आईएसआई यह सुनिश्चित करने का दृढ़ निश्चय कर ले कि लश्कर दूसरा हमला न करने पाए तो वह ऐसा कर सकती है।
हो सकता है कि पाकिस्तान अभी ऐसा करे भी। लेकिन महीने गुजरते जाने के बाद उसकी सोच क्या होगी? स्थानीय और पश्चिमी मीडिया, जो पश्चिमी राजनयिक स्रोतों से कहीं ज्यादा भरोसेमंद है, के माध्यम से आने वाली उस इलाके की खबरों में इसके प्रमाण हैं। आप उनमें से टुकड़े चुनकर पाकिस्तान की रणनीतियों की एक भरोसेमंद तस्वीर बना सकते हैं।
आसानी के लिए आप इसे दोहरे संकेतों वाली रणनीति कह सकते हैं। पाकिस्तान अपने यहां सक्रिय आतंकवादियों को तीन समूहों में देखता है और तीनों के साथ उसके व्यवहार में एक बारीक फर्क है। इनमें से दो गतिविधि पश्चिमी सीमा पर सक्रिय है : पाकिस्तानी और अफगान तालिबानों के बीच। पाकिस्तान अपने ही देश के तालिबान से लड़ना चाहता है। तालिबान उसका स्पष्ट शत्रु है। तालिबान पाकिस्तानी राज्य और वहां की सेना को धमकाते हैं। पाकिस्तान में होने वाले लगभग सभी हमले, खासकर सेना के खिलाफ, इसी समूह के द्वारा किए गए हैं। पहला बारीक फर्क इस बात में छिपा है कि पाकिस्तानी अफगान तालिबान के साथ कैसे व्यवहार करते हैं।
पाकिस्तान उन्हें सिर्फ ‘अर्ध शत्रु’ या ‘अर्ध अवसर’ के रूप में देखता है। शत्रु इसलिए क्योंकि अपने ही देश के जेहादियों के साथ उनके बहुत जटिल किस्म के रिश्ते हैं और अवसर इसलिए क्योंकि तालिबान के प्रतिरोध से एक भरोसा मिलता है कि वे अमेरिकियों को ऐसी स्थिति तक पहुंचा देंगे, जहां ओबामा एक तरह से विजय की घोषणा करके वहां से चले जाना चाहेंगे। बेशक यह आईएसआई के बेहतर काम के द्वारा ही संभव है। यह पाकिस्तान के सैन्य रणनीतिक प्रतिष्ठान का पुराना स्वप्न है कि अफगानिस्तान उनके आधिपत्य में रहे।
दूसरा बारीक फर्क ज्यादा कठोर और असंदिग्ध है। यह वह रेखा है, जो पाकिस्तानी प्रतिष्ठान एक तरफ अपने दो तालिबान समूहों के बीच और दूसरी ओर अपने भारत केंद्रित जेहादी समूहों के बीच खींचता है। अतीत में इन समूहों को आईएसआई ने पाला-पोसा और नियंत्रित किया। इन समूहों ने पाकिस्तानी सेना की एक रेजिमेंट की तरह काम किया। अब पंद्रह सालों से पाकिस्तानी सेना उन्हें रणनीतिक हथियार के रूप में देख रही है। एक ऐसी ताकत जो युद्ध की स्थिति में भारत के असंतुलन को और बढ़ा सकती है। इसलिए जहां एक ओर वे भारत पर दूसरा हमला मुल्तवी करने के प्रति सचेत हैं, वहीं उस समूह को खत्म करने के लिए अनिच्छुक भी।
यही कारण है कि इस समय की चुप्पी और सन्नाटे को हमें ज्यादा सचेत होकर और गंभीरता के साथ लेना चाहिए। यह आत्मतुष्टि में लिप्त रहने या सुस्ताने का वक्त नहीं है। हमारे यहां किसी सौभाग्य या सतर्कता की वजह से शांति नहीं है, बल्कि इसलिए है क्योंकि दूसरी ओर किसी ने अभी शांत रहने का निर्णय किया है। यह शांति कब टूट सकती है, इसका अनुमान और आकलन हमें खुद करना होगा। मेरे अनुमान के मुताबिक यह तब संभव है, जब अमेरिकियों को अफगानिस्तान में कुछ सैन्य सफलता मिले और अफगान तालिबान पाकिस्तानी सीमा की ओर पलायन करना शुरू कर दें। वहां पर अमेरिकियों का दबाव बढ़ जाए। अब हमारे पास बर्बाद करने के लिए बिल्कुल वक्त नहीं है और न ही उत्सव मनाने का कोई अवसर।
 
शेखर गुप्ता लेखक द इंडियन एक्सप्रेस के एडिटर-इन-चीफ हैं।
   
 
email ईमेल करें Print प्रिंट संस्करण Dainik Bhaskar
  • कहां नेहरू कहां मनमोहन
  • कांग्रेस चुनाव की तैयारी में
  • बरुआ जब इंदिरा से दूर हुए
  • खून बहाकर खूनी क्रांति !
  • राजनीति का ककहरा सीखते राहुल
  • लाल बंगाल अब तिरंगे की ओर
  • फतवे से आगे का सोच
  • जिन्ना को माफ नहीं कर पाते
  • चिदंबरम को भाजपा का समर्थन
  • दबदबा उसका , हुकूमत उसकी
  • अर्स से फर्श तक पहुंचे
  • पाकिस्तान की भारत नीति
  • कामरेड ,महिलाओं को हक़ दें
  • यह नया इतिहासवेत्ता कौन है
  • जिसके दूसरे हाथ में बंदूक हो
  • सांसत में समाजवादी पार्टी
  • मगर किशन जी कहां हैं?
  • पवार का राजनीतिक कद
  • और यह है पढ़ा लिखा माओवाद!
  • राजपूतों ने अमर का साथ छोड़ा
  • Post your comments
    Copyright @ 2008-09 All Right Reserved By Janadesh
    Designed and Maintened by eMag Technologies Pvt. Ltd.