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एमके के सामने फिर वामपंथी

 एमजे अकबर

यह कोई ऐसी बात नहीं है कि इसमें बहुत ज्यादा दिमाग लगाया जाए। दिल्ली के सत्ता के ग्राफ पर ईमानदारी के बनिस्बत भरोसा और वफादारी ज्यादा मायने रखती है। पूरी व्यवस्था चुपचाप काम करती है। यह बात राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों दोनों पर लागू होती है। हालांकि ऐसा कम ही होता है कि पांच दशक के लंबे कॅरियर में कोई नौकरशाह अपनी निर्विवाद छवि बनाकर रखे।
1961 में इंटेलीजेंस ब्यूरो (आईबी) में शामिल हुए एमके नारायणन का कॅरियर कई संकटों की श्रंखलाओं के साथ परिपक्व होते भारतीय राज्य के संग आगे बढ़ा। आईबी ज्वॉइन करने के एक साल के भीतर ही वे अपने प्रमुख बीएन मलिक के साथ इस बात की जांच कर रहे थे कि आखिर चीनी हमारी सुरक्षा में सुराख करने में कैसे सफल रहे। उन्होंने कई शीर्ष साम्यवादी नेताओं को जेल भिजवा दिया क्योंकि इन नेताओं के लिए राष्ट्रीयता से ऊपर विचारधारा थी। यह विडंबना ही है कि उन्हें उसी राज्य में राज्यपाल बनाकर भेजा जा रहा है जहां सत्ता की बागडोर साम्यवादियों के हाथों में है।
एमके को जम्मू-कश्मीर का भी राज्यपाल बनाया जा सकता था और यह शायद ज्यादा प्रासंगिक होता। एमके का अपने कॅरियर में इस राज्य से पहली बार पेशेगत वास्ता 1963 में तब पड़ा था, जब श्रीनगर में संरक्षित पैगंबर की दाढ़ी का पवित्र बाल ‘मो-ए-मुकद्दस’ गायब हो गया। मलिक ऐसे पहले आईबी प्रमुख थे, जिन्होंने आत्मकथा लिखी थी और उसके जरिए हम जान सके कि उस पवित्र बाल की दुबारा प्राप्ति आईबी की फतह थी। लेकिन हमें यह नहीं बताया गया कि यह कैसे हुआ था। एमके जानते हैं, लेकिन वे चुप रहे।
1965 में कश्मीर घाटी पर कब्जा करने के लिए पाकिस्तान द्वारा युद्ध छेड़ना आईबी के लिए बड़ी चुनौती थी। कश्मीर व पंजाब समस्या, ब्लूस्टार, इंदिरा गांधी की हत्या, पूर्वोत्तर में अशांति, राजीव गांधी की हत्या : इन सभी के साथ एमके के अनुभव को एक तरह से भारत का अव्यक्त इतिहास कहा जा सकता है। वे राजीव गांधी के बहुत करीबी थे और उन्होंने गांधी परिवार के साथ अपने संबंध बनाए रखे। ऐसे में कांग्रेस के सत्ता में लौटने पर प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) में उनकी नियुक्ति अपरिहार्य थी। लेकिन जो अपरिहार्य नहीं था, वह अचानक पीएमओ से वरिष्ठ नागरिकों के विश्राम घर राजभवन में उनका भेजा जाना था। किंतु किसी ने कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया। साल भर पहले मुंबई पर हुए आतंकी हमले के बाद उनके इस्तीफे की मांग उठी थी, लेकिन न तो सोनिया गांधी और न मनमोहन सिंह ने उस पर विचार तक किया। प्रधानमंत्री और एमके के बीच साफ सौहाद्र्रता थी, लेकिन अब अचानक यह सौहार्द्रता कैसे भंग हो गई?
गृह मंत्री पी चिदंबरम की उनके साथ पटरी नहीं बैठना एक समुचित कारण नहीं हो सकता। कोई कुछ भी कहे, यह गृह मंत्री का नहीं, प्रधानमंत्री का फैसला था। प्रधानमंत्री के पहले कार्यकाल का फोकस केवल एटमी करार था। दूसरे कार्यकाल का मुख्य एजेंडा पाकिस्तान के साथ शांति स्थापित करना है। एमके ने अपने पांच दशक हमेशा भारत विरोधी रहे शत्रु की जटिलताओं और छल-कपट से देश को बचाने में बिताए हैं। शायद प्रधानमंत्री ऐसा व्यक्ति चाहते हैं, जिसकी स्मृति ज्यादा नहीं हो। लेकिन यह एक त्रुटि है। वास्तविकता को जांचे बगैर कोई भी विजन पूरा नहीं हो सकता।
लेखक पाक्षिक पत्रिका ‘कोवर्ट’ के चेयरमैन हैं।
 
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